आध्यात्मिक चेतना से जुड़े बगैर आर्थिक समृद्धि अर्थहीन

भोपाल, अप्रैल 2015/ युग दृष्टा योगी सदगुरु जग्गी वासुदेव जी महाराज ने कहा है कि आध्यात्मिक चेतना से जुड़े बगैर आर्थिक समृद्धि अर्थहीन है। सिंहस्थ महाकुंभ 2016 आध्यात्मिक जीवन के आयामों के प्रति चेतना जाग्रत करने का मार्ग तय करेगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति के मन में शांति न हो तो विश्व शांति संभव नहीं हो सकती। शांति कोई आयातित वस्तु नहीं है, यह मानवीय मन-मस्तिष्क में स्वाभाविक रूप से वास करती है। मनुष्य अपने प्रयासों से स्वयं को शांति के प्रति जाग्रत करता है।

सदगुरू वासुदेव ने सिंहस्थ महाकुंभ के पूर्व परिसंवाद सहित पहले संपन्न और बाद में आयोजित किये जाने वाले वैचारिक अनुष्ठानों की सराहना की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के कल्पनाशील नेतृत्व में सिंहस्थ को स्नान पर्व के अलावा वैचारिक स्वरूप देने के यह उपक्रम अपना उद्देश्य पूरा करेंगे।

सदगुरू वासुदेव मध्यप्रदेश विधान सभा में सिंहस्थ महाकुम्भ 2016 तक चलने वाले वैचारिक महाकुम्भ की श्रंखला में’ मूल्य आधारित जीवन’ विषय पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। परिसंवाद की अध्यक्षता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की।

सदगुरु महाराज ने मुख्यमंत्री द्वारा आर्थिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नति लाने के प्रयासों की सराहना करते हुए प्रदेश में कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति का भी उल्लेख किया। सिंहस्थ 2016 में सभी नागरिकों की भागीदारी का आग्रह करते हुए कहा कि सिंहस्थ एक अनुष्ठानिक घटना मात्र नहीं है यह आध्यात्मिक विज्ञान की स्थिति है।

सदगुरू ने कहा कि अब से 25 साल बाद भारत सर्वाधिक मूल्यवान देश के रूप में पहचाना जायेगा। सिर्फ भारत ही दुनिया में उभरी आंतरिक समस्याओं का समाधान दे पायेगा। उन्होंने कहा कि अब लोगों ने अपने से ऊपर देखने के बजाय बाहर देखना शुरू कर दिया है। वे अपने बारे में सोचने में सक्षम हो गये हैं। भारत अब चेतना से संबंधित विकारों का समाधान करने में सक्षम है।

सदगुरू ने कहा कि मनुष्य के रूप में जन्म लेना ही सबसे महत्वपूर्ण घटना है और लोक- कल्याण के लिये संपूर्ण क्षमताओं को प्राप्त करना प्राथमिक उद्देश्य है। भारत की भूमि अनूठी है। भाव, राग और ताल से भारत देश बनता है। राग निश्चित है जबकि ताल का चुनाव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन कर्म का रूप है। शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और ऊर्जामय कार्य मनुष्य प्रतिदिन करता है लेकिन इनके प्रति चैतन्य नहीं हो पाता। धर्म का अर्थ है ऐसे नियम जो आंतरिक मन और प्रकृति को शासित, अनुशासित करते हैं।

सदगुरू ने श्रोताओं के गूढ़ सवालों के जबाव देते हुए कहा कि भारत में शोर है। हर व्यक्ति को हर कार्य करने की आजादी है लेकिन स्वभाव से हर व्यक्ति शांत प्रकृति का है। यही भारत की पहचान और क्षमता है। शांति एक आधारभूत आवश्यकता है। अवधारणाएँ बहुत है लेकिन उन्हें जीवंत करने के सटीक उपकरण उपलब्ध नहीं होते। यदि उपकरण हैं तो उन्हें उपयोग करने का विवेक नहीं होता। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन मूल्य पद्धति में उपकरणों का सही उपयोग बताया गया है। बुद्धि को उपयोग करने का विवेक भारतीय मूल्यों और योगिक विज्ञान में ही मिलता है।

मुख्यमंत्री ने परिसंवाद को राज्य सरकार का वैचारिक महाकुंभ की परंपरा को पुनर्जीवित करने का विनम्र प्रयास बताया। सिंहस्थ घोषणा के माध्यम से वैश्विक समस्याओं के समाधान पर चिंतन-मंथन होगा। सिंहस्थ घोषणा के रूप में सम-सामयिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जाएगा। सरकार का कार्य भौतिक विकास के साथ प्रसन्नता का सूचकांक बढ़ाने के कार्य भी करना है। अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद में देश और विदेश के 2500 से अधिक शोध-पत्र प्राप्त किए गए हैं। सौ से अधिक विद्वानों के व्याख्यान होंगे। परिसंवाद के विषय की परिकल्पना पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज जीवन के सभी क्षेत्रों में अवमूल्यन हो रहा है। बिना मूल्य का जीवन अर्थपूर्ण नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की समृद्ध वैचारिक धरोहर का उल्लेख करते हुए सिंहस्थ के माध्यम से उसे विश्व में प्रसारित करने का अनुरोध किया।

वासुदेव जी महाराज और मुख्यमंत्री ने विधान सभा परिसर में महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। श्री चौहान ने शॉल, श्रीफल और स्मृति-चिन्‍ह भेंट कर सदगुरू का अभिनंदन किया। मंगल ध्वनि और वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ परिसंवाद का शुभारम्भ हुआ। परिसंवाद का आयोजन संस्कृति विभाग द्वारा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के सहयोग से किया गया है।

इस अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी, संस्‍कृति राज्य मंत्री सुरेन्द्र पटवा, मंत्रीमंडल के सदस्य और बड़ी संख्या में समाज के हर क्षेत्र के हस्ताक्षर उपस्थित थे।

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