एशियाई शेरों के स्वागत के लिए तैयार है कूनो पालपुर

भोपाल, अप्रैल 2013/ मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो पालपुर अभयारण्य एशियाई शेरों का ‘दूसरा घर’ बनने की तैयारियाँ पहले ही पूरी कर चुका है। विलुप्ति की कगार पर पहुँच चुके एशियाई सिंहों को बसाने के लिए भारतीय वन्य जीव संस्थान ने वर्ष 1993-94 में पूरे देश में सर्वेक्षण के उपरान्त कूनो पालपुर का चयन किया था। एशियाई सिंहों के पुनर्वास के लिए यहाँ 1996-97 में कार्य प्रारंभ किया गया। आज यहाँ इन सिंहों के लिए भरपूर भोजन, भरपूर जगह, भरपूर पानी और सभी तरह से अनुकूल वातावरण उपलब्ध है।

पालपुर गाँव और कुनो नदी के समीप वर्ष 1981 से स्थापित कूनो पालपुर वन मंडल 1245 वर्ग किलोमीटर में फैला है। इसमें से 344.686 वर्ग किलोमीटर अभयारण्य का क्षेत्र है। वर्ष 2002 में इसके बाहर 900 वर्ग किलोमीटर का बफर क्षेत्र भी शामिल किया गया। सिंहों को सबसे पहले 4000 हेक्टेयर क्षेत्र में रखा जायेगा। यहाँ रहने के आदी होने के बाद उन्हें 34 हजार हेक्टेयर के बड़े क्षेत्र में शिफ्ट कर दिया जायेगा।

24 गाँव विस्थापित

एशियाई सिंहों के पुनर्वास के लिए यहाँ के 24 गाँव को वर्ष 1997 से 2003 के मध्य विस्थापित कर अभयारण्य के बाहर बसाया गया है। इन गाँव के 1545 परिवार को बसाने के लिए एक लाख रुपये प्रति परिवार की दर से 15 करोड़ 45 लाख रुपये की राशि खर्च की गई। इसके अलावा पुनर्वासित ग्रामीणों की अचल संपत्ति के आंकलन के बाद उन्हें मुआवजे के तौर पर 4 करोड़ 71 लाख रुपये की राशि भी वितरित कर दी गई है। अभी गिर जंगल में बहुत छोटे क्षेत्र में एशियाई शेर रह रहे हैं। ऐसे में यदि महामारी फैलती या जंगल में आग लगती है तो एशियाई प्रजाति के ये बचे-खुचे सिंह भी समाप्त हो जायेंगें। इसी को मद्देनजर रखते हुए उच्चतम न्यायालय ने कूनो पालपुर में कुछ शेर भेजने का निर्देश गुजरात सरकार को दिया है। गिर वन में वर्तमान में 411 शेर है।

कूनो पालपुर अभयारण्य में रहवास सुधार और प्रे-बेस विकास के भी कार्य किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय वन्य जीव संस्थान देहरादून ने पूरे देश में सर्वेक्षण के बाद पालपुर को एशियाई सिंहों की रिहाईश के लिए सबसे बेहतरीन स्थान माना है। यहाँ करीब ढाई सौ प्रजाति के पशु-पक्षी पाए जाते हैं जिनमें प्रमुख रूप से बाघ, तेन्दुआ, चीतल, सांभर, चौसिंघा, जंगली सुअर, नीलगाय, चिंकारा, सियार, भालू, भेड़िया लंगूर-बंदर और मोर शामिल हैं। विस्थापन के दौरान गाँव वालों ने अपने अनुपयोगी पशु भी यहाँ छोड़ दिए थे जिनकी संख्या आज कई गुना बढ़ कर साढ़े चार हजार हो गई है और ये भी जंगली जानवरों की तरह ही रहने लगे हैं।

कूनो पालपुर अभयारण्य और श्योपुर जिले के जंगल एशियाई सिंह के रहवास के लिए अनुकूल हैं क्योंकि यहाँ बहुत पहले शेर पाये जाते थे। मध्य भारत का अंतिम सिंह वर्ष 1873 में कूनों के जंगल में गोली का शिकार हुआ था।

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