कुआँ पहुँचा प्यासे के पास

भोपाल, फरवरी 2015/ केवल बाँस खरीदने-बेचने में रुचि रखने वाले बाँस विक्रेताओं, खासतौर से बंसोड़ समुदाय के लोगों को बाँस की विभिन्न कलात्मक और उपयोगी उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हें आय के नये स्रोत उपलब्ध करवाने मध्यप्रदेश राज्य बाँस मिशन द्वारा नि:शुल्क प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रशिक्षण शिविर भोपाल के बाँसखेड़ी में 2 फरवरी से चल रहा है, जिसका समापन 11 फरवरी की शाम 4 बजे होगा। शिविर में 45 प्रशिक्षणार्थी भाग ले रहे हैं, जिन्हें त्रिपुरा से आये बाँस शिल्पियों द्वारा प्रशिक्षित किया जा रहा है।

मिशन संचालक, मध्यप्रदेश राज्य बाँस मिशन श्री ए.के. भट्टाचार्य ने बताया कि गत दिनों भोपाल में बाँस शिल्पियों की राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता में यह तथ्य सामने आया कि भोपाल के बंसोड़ समुदाय के लोग मात्र बाँस खरीदने और बेचने तक ही अपने को सीमित किये हुए हैं। इस समुदाय के लोगों को बाँस शिल्प से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। अभी तक इनमें से केवल कुछ लोग बाँस की टोकरी ही बना रहे थे, जबकि देश में ही नहीं विदेश में भी हस्तशिल्प का बाजार दिनों-दिन बढ़ रहा है। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण देने त्रिपुरा के कुशल बाँस शिल्पियों को आमंत्रित किया गया है। प्रशिक्षणार्थियों की सुविधा के लिये इन्हीं की बस्ती में शिविर लगाया गया है और प्रशिक्षण लेने वालों को 100 रुपये प्रतिदिन की शिष्यवृत्ति भी दी जा रही है।

प्रशिक्षणार्थी गुलाबबाई कहती हैं कि शिविर कहीं और होता तो जाना मुश्किल था। कुआँ ही प्यासे के पास आ गया है। हम तो केवल टोकरी बनाना ही जानते थे, पता नहीं था बाँस से इतनी चीजें बन सकती हैं। त्रिपुरा से आयी रेखा शर्मा मेडम और सपन तथा जीतेन्द्र सर हमें बाँस से ट्रे, पेन-स्टेण्ड, चटाई, वाल-हेंगिंग, शो-पीस, गुलदस्ता और खूबसूरत चटाई आदि बनाना सिखा रहे हैं। प्रशिक्षिका श्रीमती रेखा शर्मा ने बताया कि प्रशिक्षणार्थियों को उत्पाद बनाना सिखाने के साथ ही उन्हें ‘अच्छी फिनिशिंग’ पर ध्यान देना भी सिखाया जा रहा है। शिविर में युवा प्रशिक्षणार्थी गहन रुचि और लगन दिखा रहे हैं। गनेशीबाई, कलाबाई, पूजा, संगीता, सरोज, पूनम, माधुरी, अंजू ने कहा कि हमें शिविर में आकर बहुत अच्छा लग रहा है। हम आगे भी कौशल जारी रखेंगे। सबसे अच्छी बात है हमें कहीं जाना नहीं है, घर बैठे प्रशिक्षण मिल रहा है।

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