खदानों की नीलामी प्रक्रिया पारदर्शी हो

भोपाल, जनवरी 2015/ खनिज साधनों की नीलामी प्रक्रिया पारदर्शी हो, अनिश्चितता और कानूनी अड़चनें समाप्त हों। राज्यों को अधिक अधिकार मिलें, ताकि तुरंत निर्णय लिये जा सकें। खनिज साधन मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने नई दिल्ली में खान एवं खनिज (विकास एवं विनिमय) अध्यादेश 2015 के संबंध में केन्द्रीय इस्पात एवं खान मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में आहूत राज्यों के खनन मंत्रियों के सम्मेलन में यह बात कही। केन्द्रीय खनन राज्य मंत्री विष्णुदेव साय भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

खनिज साधन मंत्री ने कहा कि खनन संबंधी कानून सख्त हो, राज्य तथा जिला प्रशासन-स्तर पर खनन संबंधी संभावनाओं को तलाशने तथा खनन अधोसंरचना विस्तार के अधिकार हो। खदानों की लीज अवधि 50 बरस हो, लेस गवर्मेंट और मोर गवर्नेंस के साथ अध्यादेश की धारा 6 में प्रॉस्पेक्टिव लायसेंस (पीएल) तथा माइनिंग लायसेंस फीस (एमएल) के लिये खनिजवार एवं क्षेत्रवार (राज्यवार) अलग-अलग सीमाएँ निर्धारित की गई हैं। ऐसे में विवाद की स्थिति न बने तथा सभी खनिज एवं सभी राज्यों के लिये पीएल धारण के लिये 100 वर्ग किलोमीटर एवं एमएल धारण के लिये 50 वर्ग किलोमीटर होना चाहिये। इसी प्रकार धारा 12 ए (6) में खनिज रियायत के ट्रांसफर के प्रावधान केवल ऐसी खनिज रियायतों के लिये किया गया है, जो ऑक्शन के माध्यम से स्वीकृत किये जायेंगे। ऐसी स्थिति में किसी खनि आधारित उद्योग, जिसके पक्ष में खनि रियायत पूर्व से स्वीकृत है, का ट्रांसफर नहीं हो पायेगा। यदि उद्योग बिक जाता है एवं खनिज रियायत ट्रांसफर नहीं होते हैं तो खनि रियायतें अनधिकृत रूप से संचालित होगी।

श्री शुक्ल ने बदलाव (स्वेपिंग) का प्रावधान करने का भी अनुरोध करते हुए कहा कि यदि दो उद्योगों को समान खनिज की खनि रियायतें स्वीकृत हैं परन्तु ऐसी खनि रियायतें दोनों ही उद्योगों के लिये परस्पर दूर-दूर स्थित है, जिनसे खनिज का परिवहन करना आर्थिक रूप से अधिक खर्चीला अथवा लाभप्रद न होगा। इन समान खनिज के खनि रियायतों को आपस में बदलाव (स्वेप) का प्रावधान किया जाना चाहिये ताकि उद्योगों को लाभकारी बनाया जा सके।

श्री शुक्ल ने अध्यादेश की धारा 17 ‘ए’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसके द्वारा केन्द्र शासन के उपक्रमों के लिये पीएल/एमएल के लिये क्षेत्र आरक्षण का प्रावधान भी किया गया है। किन्तु अनुभव रहा है कि उपक्रमों द्वारा काफी लम्बे समय तक कार्य ही नहीं किया जाता। इस समस्या के निदान के लिये क्षेत्र आरक्षण की अधिसूचना में ही कार्य प्रारंभ करने एवं पूर्ण करने की समय-सीमा भी निर्धारित कर दी जाना चाहिये।

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