धर्म और धम्‍म आधारित सुशासन देंगे: मुख्‍यमंत्री

भोपाल। अन्तर्राष्ट्रीय धर्म-धम्म सम्मेलन आज यहाँ भारत स्थित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रारम्भ हुआ। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि जिसमें सबका कल्याण हो, वही धर्म है। धर्म और धम्म दोनों में यह अवधारणा है। श्री चौहान ने कहा कि वे धर्म और धम्म के आदर्शों के अनुसार प्रदेश में सुशासन चलाना चाहते हैं।

इस दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में 19 राष्ट्र के 235 प्रतिनिधि भाग ले रहे है। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता सेन्ट्रल तिब्बतन विश्व विद्यालय के कुलपति श्री गेशे संपातन ने की। उच्च शिक्षा, संस्कृति एवं जनसम्पर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा, बाबा साहब के पौत्र डॉ. प्रकाश अम्बेडकर, प्रो. आनंद गुर्गे, महाबोधि सोसायटी श्रीलंका के चेयरमेन श्री बानगला उपतिस्सा नायक थेरो भी उद्घाटन सत्र में मंचासीन थे। विश्व के विभिन्न देशों से आये विद्वान इस अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में अपने शोध-पत्र, दर्शन तथा विचार प्रस्तुत करेंगे। उद्घाटन सत्र के अतिथियों सहित विश्व के विभिन्न राष्ट्र से आये प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री श्री चौहान की, साँची में बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान विश्व विद्यालय स्थापित करने के लिए खुले दिल से सराहना की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि धर्म भारत की जड़ों, माटी, स्वभाव और संस्कार में है। धर्म ग्रंथों को आचरण में उतारना ही धर्म है। दूसरों का भला करना ही धर्म है और दूसरों को दुख पहुँचाना अधर्म है। विश्व का कल्याण हर धर्म का मूल है। धर्म बताता है कि व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति क्या कर्त्तव्य है। शरीर की तरह मन, बुद्धि और आत्मा का भी धर्म है। चेतना मनुष्य को अच्छा सोचने और मानव-कल्याण के लिये प्रेरित करती है। भगवान बुद्ध ने कहा था कि दुखों का अस्तित्व है तो निरोध के उपाय भी हैं। धर्म का पथ पवित्रता का पथ है। जिसमें हिंसा नहीं करना, असत्य नहीं बोलना, व्यभिचार नहीं करना, नशा नहीं करना शामिल है। भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरूषार्थ माने गये हैं। व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद आध्यात्मिक उन्नति की ओर ध्यान दिया जाना चाहिये। व्यक्ति और समाज के साथ प्रकृति का भी विचार किया जाना चाहिये। प्राणी-मात्र के प्रति करूणा और मैत्री का भाव धर्म सिखाता है। इसीलिये हमारे यहाँ पशु, पक्षी, पेड़-पौधों, नदी, पहाड़ की भी पूजा की गयी है। प्रकृति धर्म के लिये पर्यावरण को संभालना होगा। धर्म की व्यापक परिभाषा सबका कल्याण है। हमें केवल ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्शन नहीं बल्कि मन के सुख के बारे में सोचना चाहिये।

आरंभ में डॉ. सिद्धेश्वर भट्ट ने संगोष्ठी के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए कहा कि समाज में धर्म की जरूरत हमेशा से रही है। डॉ. प्रकाश अम्बेडकर ने कहा कि वर्तमान समय में सामाजिक धर्म के मूल्यों पर विचार किया जाये। डॉ. कपिल कपूर ने धर्म और धम्म में संवाद की जरूरत बतायी। डॉ. आनंद गुर्गे ने की-नोट एड्रेस में कहा कि भारत में सनातन, बौद्ध और जैन धर्म की महान परम्पराएँ रही हैं। प्रो. गेशे नवांग संपातन ने कहा कि बुद्ध ने कहा था कि नफरत को नफरत से नहीं बल्कि प्रेम से ही समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि साँची का बौद्ध विश्वविद्यालय प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की परम्परा को आगे बढ़ायेगा। अंत में आभार प्रदर्शन श्री वैधनाथ लाभ ने किया। संगोष्ठी का आयोजन मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग, सेंटर फार स्टडी ऑफ रिलीजन एंड सोसायटी, नई दिल्ली तथा महाबोधि सोसायटी, श्रीलंका द्वारा किया जा रहा है।

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