धर्म में कल्याण के सिवा कुछ और नहीं

भोपाल, अक्टूबर 2015/ मानव-कल्याण के लिये धर्म पर अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद के दूसरे दिन विभिन्न सत्र में विद्वतजन के बीच धर्म, आध्यात्म तथा मानव-कल्याण के विविध विषय पर गहन विचार विमर्श हुआ। शुरूआत मुख्य सत्र से हुई, जिसकी अध्यक्षता डोबकॉक यूनिवर्सिटी दक्षिण कोरिया के प्रो. सुन क्यून किम ने की। मार्थोमा सभा केरल के प्रमुख श्री जोसफ मार्थोमा मेट्रोपोलिटन, विष्णुमोहन फाउंडेशन के श्री हरिप्रसाद स्वामी, होलिस्टिक साइंस रिसर्च सेंटर के डॉ. शैलेष मेहता एवं टेम्पल ऑफ अंडरस्टेंडिंग ऑफ इंडिया के डॉ. ए.के. मर्चेंट मौजूद थे।

श्री मार्थोमा ने कहा कि मानवता का कल्याण मनुष्य का स्वप्न होता है। बिना कर्म के कोई भी उपदेश व्यर्थ है। श्री मार्थोमा ने महात्मा गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को मौजूदा दौर में भी प्रासंगिक बताया। श्री हरिप्रसाद स्वामी ने धर्म के परिप्रेक्ष्य में वैराग्य की महत्ता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में बदलाव से ही समाज में बदलाव आएगा। यह भी कहा कि हमें अपने धर्म पर अहंकार नहीं होना चाहिए। डॉ. शैलेष मेहता ने उपयुक्त समझ और ज्ञान को धर्म का मर्म जानने के लिए जरूरी बताया। उन्होंने नकारात्मक और सकारात्मक व्यवहार से शरीर पर होने वाले प्रभाव की चर्चा की। डॉ. मर्चेंट ने ज्ञान एवं धर्म के पारस्परिक संबंधों को उजागर किया। उन्होंने बेहतर जीवन के लिये आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में अंगीकार करना जरूरी बताया।

सम्मेलन के दूसरे मुख्य सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. कुटुंब शास्त्री ने की। अमेरिका से होलिस्टिक साइंस चेरिटिबल रिसर्च फाउंडेशन के डॉ. राधाकृष्णन ने कहा कि विज्ञान को भी सिद्धान्त से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्रकृति अपने आप में पूर्ण हैं, लेकिन दृष्टि दोष होने से हम उस पूर्णता का अहसास नहीं कर पाते। प्रसन्ना ट्रस्ट बैंगलुरू के स्वामी सुखबोधानंद ने कहा कि हमारे जीवन की तरह हमारा धर्म भी यत्रंवत हो गया है और क्रिया की बजाय प्रतिक्रिया पर हमारा ध्यान केंद्रित हो गया है। उन्होंने कहा कि हमें देखने की दृष्टि विकसित करना होगी। उन्होंने गीता के परिप्रेक्ष्य में जीवन को परिस्थिति, मनःस्थिति और आत्म-स्थिति का समन्वय बताते हुए जीवन में सरलता को ही धर्म का उद्देश्य कहा। जापान के प्रो. शॉन हीनो ने मानव-कल्याण के लिए सभी धर्मों के आदर्श मूल्यों को स्वीकार कर उन पर अमल करने पर बल दिया। प्रो. शास्त्री ने कहा कि धर्म सदा से है। धर्म न तो पैदा हुआ है और न ही मरता है। सनातन धर्म यानि सदा से चला आ रहा धर्म। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में अलग-अलग उपासना पद्धतियों का जिक्र है, लेकिन रिलीजन नहीं है, सिर्फ धर्म है। प्रो. शास्त्री के मुताबिक धर्म में सिर्फ कल्याण के सिवा कुछ और नहीं हो सकता।

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