नव उदारवादी ‘झटका उपचार’ का नया दौर

सरकार की नई आर्थिक नीतियों को विश्‍लेषक आनंद प्रधान  ऐसे झटका उपचार का नया दौर बता रहे है जिसमें राजनीतिक या आर्थिक संकट को अवसर की तरह इस्‍तेमाल किया जाता है। प्रस्‍तुत है उनका यह विचारोत्‍तेजक लेख हस्‍तक्षेप डॉट कॉम से साभार…

यू.पी.ए सरकार ने एक झटके में ताबड़तोड़ डीजल-रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी से लेकर अर्थव्यवस्था के संवेदनशील क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोलने और सार्वजानिक क्षेत्र की कई कंपनियों के विनिवेश जैसे कई बड़े और विवादास्पद फैसलों का एलान करके संकट में फंसी अर्थव्यवस्था पर ‘झटका उपचार’ (शॉक थेरेपी) को आजमाने की कोशिश की है.

चौंकने की जरूरत नहीं है. यह बाकायदा ‘झटका उपचार’ ही है और यह भारत में कोई पहली बार नहीं आजमाया जा रहा है. याद रहे, १९९१ में नरसिम्हा राव सरकार और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने इसी अंदाज़ में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी. यही नहीं, भारत के अलावा और भी कई देशों में इस ‘झटका उपचार’ यानी शॉक थेरेपी को आजमाया जा चुका है.
असल में, ‘झटका उपचार’ (शॉक थेरेपी) नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में ७० से लेकर ९० के दशक तक मुक्त बाजार और व्यापार आधारित बाजारोन्मुख आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का सबसे कुख्यात तरीका रहा है. अमेरिकी नव उदारवादी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन को इसका प्रमुख सिद्धांतकार और रचनाकार माना जाता है.
फ्रीडमैन के नेतृत्व में ही सबसे पहले ७० के दशक के मध्य में लातिनी अमेरिकी देश चिली में तानाशाह जनरल पिनोशे की सरकार ने ‘झटका उपचार’ के तहत अर्थव्यवस्था के बड़े पैमाने पर निजीकरण, खुले व्यापार, विदेशी पूंजी को न्यौता, सामाजिक कल्याण की योजनाओं को समेटने या उनके बजट में भारी कटौती जैसे कदम एक झटके में उठाये थे और लोगों को संभलने का मौका भी नहीं दिया था.
उल्लेखनीय है कि उससे पहले अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सी.आई.ए ने चिली में वामपंथी राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को जनरल पिनोशे की अगुवाई में सैनिक तख्तापलट के जरिये हटाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी. यह चिली के लोगों के लिए पहला शॉक था और यह किसी से छुपा नहीं है कि उसके बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक खासकर वामपंथी नेताओं-कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई और उनका उत्पीडन किया गया.
उसके बाद अर्थव्यवस्था के त्वरित ‘सम्पूर्ण रूपांतरण’ की नव उदारवादी परियोजना के तहत मिल्टन फ्रीडमैन और उनके शिकागो स्कूल के अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था को ‘झटका उपचार’ दिया गया जिसका मुख्य जोर निजीकरण, मुक्त बाजार, खुले व्यापार, विदेशी पूंजी और सामाजिक कल्याण की योजनाओं को समेटने पर था.
यह सब एक झटके और ताबड़तोड़ अंदाज़ में किया गया और इसके पीछे फ्रीडमैन का तर्क यह था कि अर्थव्यवस्था में अचानक, अत्यधिक तेजी और बड़े पैमाने पर किये गए बदलावों से आमलोगों में जो मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया होगी उससे उन्हें उन बदलावों के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद मिलेगी. फ्रीडमैन ने इसे बाकायदा ‘झटका उपचार’ (शॉक ट्रीटमेंट) का नाम दिया.
इसके बाद लातिन अमेरिका के अन्य देशों जैसे ब्राजील, अर्जेंटीना और उरुग्वे आदि में भी ७० के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका समर्थित सैनिक या तानाशाह सरकारों ने मिल्टन फ्रीडमैन और उनके शिकागो स्कूल के अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में ‘झटका उपचार’ के साथ नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को जोर-जबरदस्ती लागू किया. जल्दी ही लातिन अमेरिका इन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की सबसे बड़ी प्रयोगस्थली बन गया.
इसी दौर में खुद अमेरिका में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन में प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने इन नव उदारवादी सुधारों को जोरशोर से आगे बढ़ाया. इन सुधारों का सबसे अधिक जोर निजीकरण खासकर सार्वजनिक सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने, सामाजिक कल्याण की योजनाओं में कटौती, अमीरों और कार्पोरेट्स के लिए टैक्सों में कटौती, विनियमन (डी-रेगुलेशन), मुक्त बाजार और व्यापार और ट्रेड यूनियनों को खत्म करना था. कहने की जरूरत नहीं है कि इन सुधारों के सिद्धांतकार मिल्टन फ्रीडमैन थे जिनकी किताब ‘पूंजीवाद और आज़ादी’ (कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम) इन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की बाइबिल बन गई थी.
दरअसल, फ्रीडमैन की मुक्त बाजार वैचारिकी का सार यह था कि सरकारों को कंपनियों के मुनाफे की राह में आनेवाले हर कानून और नियमों को खत्म कर देना चाहिए. सरकारों को कारोबार और उत्पादन से हट जाना चाहिए और हर उस सरकारी उपक्रम को निजी कंपनियों को सौंप देना चाहिए जिन्हें वे मुनाफे के साथ चला सकते हैं.
सरकारों को सामाजिक कल्याण के उपायों को या तो बंद कर देना चाहिए या उनके बजट में भारी कटौती करनी चाहिए. शिक्षा और स्वास्थ्य समेत सभी सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण कर देना चाहिए. यही नहीं, सरकारों की भूमिका सीमित होनी चाहिए और उन्हें बाजार में हस्तक्षेप करने से परहेज करना चाहिए. उन्हें टैक्सों में कटौती करनी चाहिए. कीमतें और मजदूरी/वेतन बाजार के भरोसे छोड़ देनी चाहिए.
इसी दौर में लातिन अमेरिकी देशों में नव उदारवादी सुधारों के ‘झटका उपचार’ की कथित ‘सफलताओं’ से उत्साहित अमरीका ने विश्व बैंक-मुद्रा कोष को आगे करके ‘वाशिंगटन सहमति’ के नाम पर एशिया और अफ्रीका के आर्थिक संकट में फंसे देशों में भी कर्ज के बदले इन नव उदारवादी सुधारों को शर्त की तरह थोपना शुरू किया.
यही समय था जब सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप में समाजवादी प्रोजेक्ट अपने ही अंतर्विरोधों के कारण ढह रहा था और ‘पूंजीवाद और पूंजीवादी उदार लोकतंत्रों का कोई विकल्प नहीं है’ की घोषणा के साथ ‘इतिहास के अंत’ एलान किया जा रहा था. इसी दौरान रूस में राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में रूस में समाजवादी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की मुहिम में एक बार फिर ‘झटका उपचार’ का खुलकर इस्तेमाल किया गया और उसके प्रमुख रचनाकार अमेरिकी अर्थशास्त्री जैफ्री साक्स थे जो बोलीविया में यह प्रयोग कर चुके थे.
रूस में साक्स के नेतृत्व में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और संसाधनों का ताबड़तोड़ और झटके के साथ निजीकरण शुरू हुआ. सरकारी कंपनियों और संसाधनों को औने-पौने दामों में अमीरों और अभिजनों को बेच दिया गया जिसका नतीजा हुआ कि रूस में मुट्ठी भर अत्यधिक अमीर अभिजनों का एक ऐसा प्रभावशाली और ताकतवर समूह उभर आया जो आज रूस पर राज कर रहा है.
इसके साथ ही सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों को खत्म किया गया, सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण किया गया और मुक्त बाजार की नीतियों को आगे बढ़ाया गया. नतीजे में, रूसी जनता के बड़े हिस्से को बहुत तकलीफदेह परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और गरीबी-बेरोजगारी और गैर बराबरी तेजी से बढ़ी.
इधर भारत में १९९१ में भुगतान संतुलन के संकट से निपटने के नामपर कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने अर्थव्यवस्था को ‘झटका उपचार’ देने के लिए विश्व बैंक-मुद्रा कोष की मदद से देशी डाक्टर खोज निकाला. यह किसी से छुपा नहीं है कि कांग्रेस के राजनेता न होने के बावजूद और बिना चुनाव जीते भी डा. मनमोहन सिंह को १९९१ में वित्त मंत्री बनाया गया और उन्होंने झटके के साथ वाशिंगटन सहमति के तहत ढांचागत समायोजन कार्यक्रम को लागू करना शुरू कर दिया.
इसके तहत निजीकरण, विनियमन, सब्सिडी कटौती, रूपये का अवमूल्यन, विदेशी निवेश, मुक्त बाजार और खुला व्यापार की नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाया गया. इसके बाद पिछले दो दशकों में क्या हुआ, यह इतिहास सबको पता है.
इस दौरान केन्द्र या राज्यों में आनेवाली सभी रंगों और झंडों की सरकारों ने आँख मूंदकर और पहले से ज्यादा उत्साह से यह तर्क देते हुए नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया है कि इनका कोई विकल्प नहीं है.
यही कारण है कि ताजा आर्थिक सुधारों के बारे में कैबिनेट के फैसलों की जानकारी दे रहे केन्द्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा से जब पत्रकारों ने पूछा कि विपक्ष के कड़े विरोध को देखते हुए आप विदेशी कंपनियों और निवेशकों को कैसे आश्वस्त करेंगे कि सरकार बदलने की स्थिति में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की नीति को पलटा नहीं जाएगा, उन्होंने पलटकर सवाल दागा कि पिछले बीस वर्षों में आर्थिक सुधारों से संबंधित कौन सा फैसला पलटा गया है?

यह एक ऐसा तथ्य है जिसे नकारना मुश्किल है और जो यह बताता है कि देश में अर्थनीति, राजनीति से बहुत पहले स्वतंत्र हो चुकी है….
आर्थिक सुधारों की निरंतरता और स्थायित्व ने लोकतंत्र को बेमानी बना दिया है
‘झटका उपचार’ का सबसे अधिक झटका गरीबों, किसानों, कमजोर वर्गों, श्रमिकों और निम्न मध्यवर्ग को झेलना पड़ता है
यही कारण है कि आर्थिक सुधारों की चैम्पियन नरसिम्हा राव सरकार को लोगों ने १९९५ के आम चुनावों में नकार दिया लेकिन उसके बाद सत्ता में आई संयुक्त मोर्चा सरकार ने न सिर्फ उन्हीं नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया बल्कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कारपोरेट और अमीरों को खुश करनेवाला ‘ड्रीम बजट’ पेश किया था.
लेकिन ‘ड्रीम बजट’ के बावजूद संयुक्त मोर्चा को आम लोगों ने चुनावों में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसके बाद आई भाजपा के नेतृत्ववाली एन.डी.ए सरकार ने और जोरशोर से नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया. वाजपेयी सरकार ने पहली बार विनिवेश मंत्रालय और उसके लिए मंत्री नियुक्त किया और सरकारी कंपनियों को धड़ल्ले से बेचा गया.
इस दौरान नीति-निर्माण में कार्पोरेट्स की सीधी और बढ़ती भूमिका का प्रमाण था- प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद जिसमें देश के सभी बड़े उद्योगपति मौजूद थे और वे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों को आगे बढ़ाने लिए रोडमैप बनाते और लागू करते दिखे.
इन आर्थिक सुधारों के समर्थकों और गुलाबी कारपोरेट मीडिया ने एन.डी.ए सरकार के कार्यकाल में “इंडिया शाइनिंग” के दावे करते हुए इन सुधारों की कामयाबियों का खूब राग अलापा लेकिन आम चुनावों में लोगों ने उसे जोरदार झटका दिया और सत्ता से बाहर कर दिया. इसके बावजूद ‘भारतीय जनतंत्र’ का कमाल देखिये कि इस राजनीतिक परिवर्तन का अर्थनीति पर कोई असर नहीं पड़ा.
अर्थनीति, राजनीति से स्वतंत्र बनी रही और यू.पी.ए की नई सरकार भी इन्हीं नव उदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने में जुटी रही जिसके खिलाफ लोगों ने जनादेश दिया था. यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियों के समर्थन पर टिके होने का भी कोई खास असर नहीं पड़ा.
उल्टे इन नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की सैद्धांतिक-राजनीतिक विरोधी माकपा पर यू.पी.ए खासकर कांग्रेस के साथ का ऐसा असर हुआ कि पश्चिम बंगाल में उसने उन्हीं नीतियों को जोरशोर से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया और आखिकार उसकी राजनीतिक कीमत चुकाई. कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों और गठबंधनों में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को लेकर कमोबेश एक आम सहमति बन चुकी है.
सच पूछिए तो इसने लोकतंत्र को बेमानी बना दिया है क्योंकि विभिन्न सरकारों और उनकी आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के खिलाफ लगातार जनादेश के बावजूद आर्थिक नीतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.
यहाँ तक कि पिछले कुछ महीनों में यूरोप में गंभीर आर्थिक संकट में फंसे देशों- ग्रीस, इटली और स्पेन आदि में लोगों के खुले विरोध के बावजूद जिस तरह से नव उदारवादी आर्थिक सुधारों को उनके गले में उतारा जा रहा है, उससे साफ़ हो गया है कि पूंजीवादी उदार लोकतंत्रों की असलियत क्या है. असल में, नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में सबसे अधिक जोर अर्थनीति को राजनीति के नियंत्रण से बाहर रखने पर दिया जाता है.
यही कारण है कि अधिकांश देशों में सरकारें चाहे जिस रंग की हों लेकिन आर्थिक नीतियों को बनाने और सुधारों को आगे बढ़ाने का जिम्मा राजनेताओं के बजाय विश्व बैंक-मुद्रा कोष के पूर्व अधिकारियों/अर्थशास्त्रियों और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़े खासकर मिल्टन फ्रीडमैन के शिष्यों के हाथ में हैं.
यह सिर्फ संयोग नहीं है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया तक विश्व बैंक-मुद्रा कोष के साथ काम कर चुके हैं और नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के सबसे बड़े पैरोकारों में हैं. जाहिर है कि वे ‘झटका उपचार’ की ‘खूबियों’ से भली-भांति परिचित हैं.
यह सही है कि सरकार पर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी देशी-विदेशी का जबरदस्त दबाव था. लेकिन यू.पी.ए सरकार ने खूब सोच-समझकर एक झटके में ताबड़तोड़ ये फैसले किये हैं. इससे उसे न सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा बदलने का मौका मिल गया है बल्कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करने के साथ फिर से उसका समर्थन और विश्वास जीतने का मौका मिल गया है.
यही नहीं, ताबड़तोड़ अंदाज़ में एक साथ कई फैसलों के कारण लोगों के लिए उनके गहरे निहितार्थों को समझना और उसपर प्रतिक्रिया देना भी मुश्किल हो रहा है. लोगों को डराया भी जा रहा है कि ये फैसले नहीं होते तो देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस सकता था. योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया के बयान पर गौर कीजिए कि अगर ये फैसले नहीं होते तो अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग गिरा देती और उससे देश के बड़े आर्थिक संकट में फंसने का खतरा पैदा हो जाता.
नव उदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में ‘झटका उपचार’ रणनीति की यह एक और खास बात है कि वह आमतौर पर आर्थिक या राजनीतिक संकट को अवसर की तरह इस्तेमाल करती है. भले ही वह संकट खुद उन नीतियों के कारण आया हो लेकिन उस संकट से निपटने के नामपर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की और बड़ी और कड़वी खुराक को अनिवार्य बताकर लोगों के गले में उतारने में इसका कोई जवाब नहीं है.
एक बात और साफ़ है कि बिना किसी अपवाद के ‘झटका उपचार’ का सबसे अधिक झटका गरीबों, किसानों, कमजोर वर्गों, श्रमिकों और निम्न मध्यवर्ग को झेलना पड़ता है जबकि उसका सबसे अधिक फायदा बड़ी पूंजी, कार्पोरेट्स और अमीरों को होता है. चिली से लेकर रूस तक के उदाहरण इसकी गवाही देते हैं. यू.पी.ए सरकार के ताजा फैसले भी इसके अपवाद नहीं हैं.

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