दुर्लभ खगोलीय घटना का दूरगामी असर

उज्जैन।  शुक्र ग्रह के पारगमन की घटना ने पूरे विश्‍व पर दूरगामी असर डाला है। इस तरह की खगोलीय घटनाएं आठ साल के जोड़े में 105 वर्ष छह माह या 121 वर्ष छह माह के बाद होती है।

जब किसी बड़े पिण्ड के सामने से कोई छोटा पिण्ड गुजरता है तो इस घटना को पारगमन कहते हैं। पृथ्वी और सूर्य के बीच बुध तथा शुक्र ग्रह है। अतः इन्हें सूर्य के आगे एक छोटे बिन्दु के रूप में पारगमन करते देखा जा सकता है। पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर 365.25 दिनों में लगाती है। वहीं शुक्र ग्रह यह चक्कर 224.7 दिन में पूरा करता है। शुक्र 584 दिनों में पृथ्वी को ओव्हरटेक करता है, परन्तु शुक्र का कक्ष पृथ्वी के कक्षीय समतल की ओर 3.4 डिग्री झुका होने के कारण प्रत्येक 584 दिनों में पारगमन नहीं होता है। पारगमन तभी होता है जब पृथ्वी तथा शुक्र नोडस पर होते हैं।

सर्वप्रथम शुक्र पारगमन 4 दिसम्बर 1639 को इंग्लेण्ड के जेरेमियाह होरोक्स द्वारा देखा गया। शुक्र का व्यास 12103.6 किलो मीटर है। यह 243 दिनों में अपनी धुरी पर घड़ी की सुई की दिशा में एक चक्कर पूर्ण करता है। शुक्र सूर्य से 10 करोड़ 75 लाख तथा पृथ्वी से चार करोड़ 11 लाख 20 हजार किलो मीटर दूर है। शुक्र में 96.5 प्रतिशत कार्बन डाइ ऑक्साईड है। इसकी सतह का तापमान 460 डिग्री है। शुक्र बादलों से ढंका होने के कारण अत्यधिक चमकदार है तथा प्रातः या सायं के समय सूर्य के पास दिखता है।

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