नोटबंदी के कुंए से निकलेंगे तो डिजिटल की खाई में जा गिरेंगे

नोटबंदी को लेकर ढेर सारे दृष्टिकोणों के साथ इतनी सारी खबरें आ रही हैं कि समझ ही नहीं आता किस पर ध्‍यान दें और किस पर नहीं, किसे सही मानें और किसे गलत, किस पर भरोसा करें और किसे खारिज करें… जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं और जितने दिमाग उतने ही तर्क वितर्क…

इसी हो हल्‍ले के बीच 12 दिसंबर को आर्थिक जगत के चर्चित अखबार इकॉनामिक टाइम्‍स ने एक खबर जारी की। और कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है कि इस पर ध्‍यान देने की जरूरत है। खबर सरकार की कैशलेस मुहिम और डिजिटल ट्रांजैक्‍शन से जुड़ी है। आपको याद होगा तीन दिन पहले वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने नोटबंदी से जूझ रहे लोगों को डिजिटल ट्रांजैक्‍शन की ओर प्रेरित करने के लिहाज से, डेबिट और क्रेडिट कार्ड के जरिए अथवा ऑनलाइन ट्रांजैक्‍शन पर कई तरह की रियायतें देने का ऐलान किया था। इनमें पेट्रोल डीजल की खरीद से लेकर रेलवे टिकट बुकिंग और साधारण एवं जीवन बीमा पॉलिसियों तक पर छूट दिए जाने का जिक्र था। सरकार के इस ऐलान को आर्थिक जगत ने सकारात्‍मक कदम माना था।

लेकिन इकॉनामिक टाइम्‍स की खबर जेटली साहब के ऐलान और लोगों को डिजिटल ट्रांजैक्‍शन की ओर आकर्षित करने के सरकारी प्रयासों की हवा निकालती दिखाई देती है। खबर के मुताबिक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सरकार की इस घोषणा को लेकर नाखुशी जाहिर की है।

दरअसल सरकार चाहती है कि डिजिटल लेनदेन पर छूट की घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए बैंक, मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को या तो पूरी तरह से खत्म कर दें या फिर 31 मार्च 2017 तक इसमें बड़ी कटौती का ऐलान करें। लेकिन नोटबंदी से दबाव में आए रिजर्व बैंक ने केन्द्र सरकार को दो टूक जवाब दे दिया है कि महज लोकलुभावन घोषणाओं को आधार बनाकर देश में बैंकों पर फैसले नहीं थोपे जा सकते। सरकार के साथ ऐसी ही एक उच्‍चस्‍तरीय बैठक में रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर. गांधी ने साफ तौर पर कहा कि इस तरह का कोई भी फैसला किए जाने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसके कारण बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई कौन करेगा?

आपत्तियों को देखते हुए उस बैठक में एक सुझाव यह भी आया था कि क्‍या इस तरह की छूट छोटे शहरों के व्‍यापारियों को दी जा सकती है? चूंकि छोटे शहरों में डेबिट/क्रेडिट कार्ड की संख्‍या कम है, इसलिए वहां इस तरह की छूट देने से बैंकों को अपेक्षाकृत कम नुकसान होगा। लेकिन इस विचार पर भी सहमति इसलिए नहीं बनी क्‍योंकि ऐसा करने में तकनीकी और व्‍यावहारिक दोनों तरह की दिक्‍कतें थीं।

बताया जाता है कि देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) और सबसे बड़े प्राइवेट बैंक आईसीआईसीआई ने भी सरकार के इस प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराई है। लिहाजा बैंकों के हितों को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक ने सरकार को कहा है कि ऐसा कोई भी फैसला बैंकों की आर्थिक सेहत को ध्यान में रखते हुए ही उठाया जाए। तो आप यह मानकर चलिए कि डिजिटल ट्रांजैक्‍शन पर रियायतों का जो गुब्‍बारा फुलाया जा रहा है उसकी हवा ज्‍यादा दिन तक टिकने वाली नहीं है।  

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इस समय में देश में कुल 74 करोड़ डेबिट कार्ड हैं और 2.7 करोड़ क्रेडिट कार्ड। प्रति माह प्वाइंट ऑफ सेल मशीन (पीओएस) के जरिए दोनों तरह के कार्ड से करीब 51100 करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन होता है। इन सभी ट्रांजैक्शन पर बैंक अलग-अलग दरों से चार्ज लगाते हैं। ब्याज से होने वाली आय के बाद इन चार्जेस से होने वाली आय उनकी कमाई का बेहद अहम हिस्सा है। बैंकों ने यह भी कह दिया है कि यदि उनकी यह कमाई प्रभावित हुई तो वे कैशलेस व्यवस्था को अंजाम देने के लिए अगले तीन महीनों में 10 लाख पाइंट ऑफ सेल टर्मिनल लगाने का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाएंगे।

यानी सरकार के लिए एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई के हालात हैं। और उपभोक्‍ताओं के लिए तो यह पूरा मामला ही ब्‍लैक होल जैसा है। हमने इसी कॉलम में पहले भी लिखा है कि आने वाले समय में डिजिटल ट्रांजैक्‍शन के बहाने, प्रत्‍येक नागरिक की जेब से टैक्‍स या विभिन्‍न चार्जेस के रूप में कुछ न कुछ राशि जरूर जाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि नोटबंदी के दलदल से निकलेंगे तो डिजिटल ट्रांजैक्‍शन के कुएं में जा गिरेंगे।

डिजिटल ट्रांजैक्‍शन के नुकसान यदि समझना हों तो सोशल मीडिया पर चल रहे तरह तरह के संदेशों को ध्‍यान से पढ़ना होगा। ऐसा ही एक संदेश इसका गणित समझाते हुए कहता है-

– डेबिट कार्ड से होने वाले हर ट्रांजैक्‍शन पर चार्ज 0.5 से 1 प्रतिशत

– क्रेडिट कार्ड से होने वाले प्रत्‍येक ट्रांजैक्‍शन पर चार्ज 1.5 से 2.5 प्रतिशत

– पेटीएम, फ्रीचार्ज/ जियो मनी या ऐसे ही ई-वॉलेट पर ट्रांजैक्‍शन चार्ज 2.5 से 3.5 प्रतिशत

रिजर्व बैंक के अनुसार साल भर में ऐसा ट्रांजैक्‍शन करीब 75 लाख करोड़ रुपए का होता है। अब यदि तमाम तरह के चार्जेस का औसत 2 प्रतिशत भी मानें तो उसकी कुल राशि डेढ़ लाख करोड़ रुपए सालाना होती है।

क्‍या यह सवाल पूछने की जरूरत है कि य‍ह राशि किसकी जेब से जाएगी? 

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