‘अंगूठा छाप’ को उच्च शिक्षा मंत्री बना दें तो भी क्या बिगड़ेगा?

अजय बोकिल

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री सिर्फ आठवीं पास हैं। यह खुलासा भी खुद ‍उच्च शिक्षा मंत्री जी.टी. देवगौडा ने ही किया है। लेकिन इस खुलासे में खुशी के बजाए मलाल इस बात का है कि आठवीं पास होने के बाद भी उन्हें उच्च शिक्षा जैसा मंत्रालय ‘पकड़ा’ दिया गया। मंत्रीजी को उम्मीद थी कि शायद उनकी असल शैक्षणिक योग्यता उजागर हो जाने के बाद मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी उन्हें किसी दूसरे (मलाईदार) विभाग का मंत्री बना देंगे।

लेकिन कुमारस्वामी ने भी इस गुड लैंथ बॉल पर यह कहकर छक्का जड़ा कि बाबू मैं कौन-सा ज्यादा-पढ़ा लिखा हूं। फिर भी मुख्यमंत्री हूं। मतलब कि मैं ग्रेजुएट होने के बाद भी सीएम बना बैठा हूं तो तुम्हें आठवीं पास होकर हायर एजुकेशन मिनिस्टर बनने में काहे की शरम? इस ‘मंत्री स्तरीय मंत्रणा’ का लुब्बो-लुआब यह है कि अब शिक्षा या उच्च शिक्षा मंत्री बनने के लिए औपचारिक शैक्षणिक योग्यता का कोई अर्थ नहीं है जैसे कि मोबाइल ऑपरेट करने के लिए अंग्रेजी में एम.ए. होना कतई जरूरी नहीं है। आपको अक्षर ज्ञान है, यही क्या कम है। आपके पास डिग्री के बजाए ‘डेयर’ होना चाहिए। वरना‍ विभाग का क्या है, सारे विभाग वैसे ही चलते हैं, जैसे वो खुद चलना चाहते हैं।

आजकल जिन मंत्रालयों को लेकर ज्यादा विवाद होता रहा है, उनमें एक उच्च शिक्षा विभाग है। विवाद भी ‘उच्च शिक्षा’ को लेकर नहीं बल्कि उस विभाग के मंत्री की उच्च शिक्षा को लेकर होता रहा है। इस तरह का पहला बड़ा बवाल तब मचा, जब एनडीए-2 सरकार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्रीय मानव संसा‍धन जैसा भारी भरकम विभाग स्मृति ईरानी को सौंपा। स्मृति की अपनी शैक्षणिक योग्यता क्या है, यह आज भी रहस्य है। इसका कारण उनके द्वारा दिए गए एफीडेविट हैं।

एक में उन्होंने कहा कि वे बी.कॉम. हैं। लेकिन लोकसभा व राज्यसभा चुनाव के एफीडेविट में स्मृति ने बताया कि वे वास्तव में बी.कॉम. फर्स्ट ईयर ही पास हैं। यानी ग्रेजुएट नहीं है। फिर भी माना गया कि वे पोस्ट डॉक्‍टरल रिसर्च करने वाले से भी ‘डील’ कर सकती हैं। लेकिन उन्होंने जिस तरह विभाग को चलाया, उससे उनकी समझ पर भी लोगों को शक होने लगा और प्रधानमंत्री को उन्हें दूसरे विभाग में भेजना पड़ा।

वैसे खुद पीएम की दिल्ली विश्वविद्यालय की एम.ए. की डिग्री को लेकर संदेह के बादल अभी भी नहीं छंटे हैं। जब इस पर आरटीआई लगी तो केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर मोदी की डिग्रियां दिखाईं। माना गया कि अब विवाद खत्म। लेकिन शक की दरार फिर चौड़ी तब हुई, जब पीएम की डिग्री को लेकर मामले की सुनवाई कर रहे दिल्ली हाईकोर्ट में दिल्ली विवि ने पिछले दिनों जवाब दिया कि वह 1978 की डिग्रियों की जानकारी कोर्ट से ‘शेयर’ नहीं कर सकती।

यूं भी मंत्री बनने के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है। अलबत्ता चुनाव लड़ने के लिए जरूर है। इसके पीछे हमारे पूर्वजों की सोच शायद यह रही होगी कि भविष्य में पढ़े-लिखों और बेपढ़े-लिखों के बीच फर्क नगण्य होगा। इसलिए मंत्री बनाने के लिए एजुकेशनल क्वालिफिकेशन का मापदंड रखना बेमानी है। जैसे कि अच्छा खवैया होने के लिए अच्छा बावर्ची होना कतई जरूरी नहीं है। वैसे भी शिक्षा और शैक्षणिक क्षेत्र का जो हाल है, उसमें डिग्री इत्यादि का कोई अर्थ नहीं है। फर्जी डिग्री रखना और फिर उसे छिपाने के लिए सौ झूठ बोलने से अच्छा है कि ऐसे लफड़े में पड़ा ही क्यों जाए? इस हिसाब से देवगौडा में बेसिक ईमानदारी तो है।

कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री अथवा मंत्री बनने के लिए नेतृत्व क्षमता, चतुराई, दबंगई और राजनीतिक विजन की जरूरत होती है। कोरी डिग्रियां यहां किस काम की? विभाग चलाने के लिए मंत्री भी सम्बन्धित विषय में निष्णात हो, यह कतई आवश्यक नहीं है। डिग्रियों का अकादमिक महत्व हो सकता है, वे नौकरियां दिलवा सकती हैं, लेकिन किसी को नेता नहीं बना सकतीं। ऐसे में आठवीं पास देवेगौडा को कर्नाटक का उच्च शिक्षा मंत्री बना दिया तो क्या गलत किया? मंत्री को पढ़ाना थोड़े ही है, उसे केवल विभाग को पढ़ना और गढ़ना है। यह काम कोई भी समझदार व्यक्ति कर सकता है।

देवगौड़ा की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यता बेहिचक उजागर कर दी। देवगौडा चार दशकों से राजनीति में हैं और कर्नाटक के दिग्गज सहकारी नेताओं में गिने जाते हैं। राजनीतिक अवसरों की भी उन्हें खूब पहचान है। इसीलिए वो 2007 में बीजेपी में चले गए थे। बीजेपी की हवा बिगड़ते ही 2013 में जेडीएस में आ गए। हालांकि उनमें यह इन्फीरियारिटी कॉम्प्लेक्स हो सकता है कि जब वे खुद आठवीं ही पास हैं तो एम.ए., पीएच.डी. वालों से किस हैसियत से बात करें। यह बात दूसरी है कि जमीनी स्तर पर कम पढ़े-लिखे लोग ही कथित ‘ज्ञानियों’ से ज्यादा अच्छी तरह ‘निपट’ पाते हैं। क्योंकि उनके मन पर ‘ज्ञान’ का कोई बोझ नहीं होता।

इस लिहाज से देवगौड़ा भी विभाग को ‘ठीक’ से चला सकते हैं। कहा यह भी जाता है कि खुद को कम पढ़ा-लिखा बताने के पीछे भी ‍सियासी दांव है, क्‍योंकि वे ‘बेहतर’ विभाग चाहते थे। चूंकि देवगौड़ा पूर्व मुख्यंमत्री सिद्धारमैया को चुनाव में हराकर आए हैं, इसलिए उनकी नजर वित्त विभाग पर थी। जिसमें पैसा होता है। इस हिसाब से ‘उच्च शिक्षा’ में ‘उच्च’ के अलावा क्या रखा है? लेकिन देवगौडा की ‘पीड़ा’ पर सीएम कुमारस्वामी ने जालिम लोशन यह कहकर लगाया कि मैं सिर्फ ग्रेजुएट होकर भी सीएम हूं, तो तुम उच्च शिक्षा मंत्री बनकर नाखुश क्यों हो?

इसका दूसरा एंगल यह है कि देश में उच्च शिक्षा विभाग अब हालात की देग में पकने वाली ऐसी खिचड़ी है, जहां मंत्री का रोल केवल उसे ‘चलाते’ रहना है। हर ‘गुंजाइश’ का दोहन करना है। वैसे यह काम एक रसोइया भी कर सकता है। इस हिसाब से आठवीं पास भी कम नहीं है। साथ ही हायर एजुकेशन को लेकर मंत्रियों का क्वालिफिकेशनर रफ्ता-रफ्ता जिस ‘लोअर’ लेवल पर जा रहा है, उससे लगता है कि कल को अंगूठा छाप होना भी उच्च शिक्षा संभालने के लिए पर्याप्त होगा। क्योंकि सियासत का ढाई आखर भी अकादमिक ज्ञान की बारहखड़ी पर भारी जो है।

(सुबह सवेरे से साभार)

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