क्या ‘निफा’ के जरिए चमगादड़ सचमुच पिशाच बन रहे हैं?

अजय बोकिल

हमारे मिथकों और पुराणों में चमगादड़ों (बैट) को पिशाच योनि से आईडेंटीफाई किया जाता रहा है, भले ही चमगादड़ों की एक खास प्रजाति ‘वैम्पायर बैट’ ही खून पीकर जिंदा रहने वाली हो। चमगादड़ हमारे बीच एक काल्पनिक पात्र बैटमैन’ के रूप में हैरतअंगेज कारनामों का प्रतीक भी है। चमगादड़ हम स्तनधारियों में अकेला ऐसा प्राणी है, जो उड़ सकता है। इसके बावजूद इसका रिश्ता ज्यादातर अंधेरे, भयानकता और एक अवांछित प्राणी के रूप में ही रहा है।

इसी (काफी हद तक काल्पनिक) खौफ को बढ़ाने वाली एक खबर केरल के कोजीकोड जिले से आई कि निफा (निपाह) नामक एक नए वायरस ने दस जानें ले ली हैं। और छह की हालत नाजुक है। मरने वालों में एक वो नर्स भी है, जो निफा पीडि़तों की तीमारदारी कर रही थी। इस अल्पज्ञात बीमारी के 25 मरीज विशेष निगरानी में हैं।

यह मामला सामने आने के बाद केन्द्र सरकार ने विशेषज्ञों की टीम केरल भेज दी है। केरल सरकार भी कई एहतियाती कदम उठा रही है। बताया जाता है कि यह वायरस चमगादड़ों के ‍जरिए तेजी से फैल रहा है। इसका न तो कोई टीका है और न ही शर्तिया इलाज। कुछ सावधानियां ही आपको इस जानलेवा वायरस के अटैक से बचा सकती हैं।

इक्कीसवीं सदी में हम जिंदा रहने के लिए जिन विषाणुओं से जूझ रहे हैं, उनमे ‘निफा’ शायद नवीनतम है। इसे एनआईवी भी कहते हैं। यह पैरामिक्सोवाइरीडी परिवार का सदस्य है। इसे पहली बार 1999 में अमेरिका में पहचाना गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इस वायरस के बारे में जानकारी अभी सीमित है। कारण इस इस वायरस के बारे में पता ही पिछली सदी के आखिरी सालों में लगा। जब मलेशिया के सुंगई निपाह गांव में सुअरों के माध्यम से यह वायरस फैला।

भारत में इसके शुरुआती मामले 2001 और बाद में 2007 में पश्चिम बंगाल मे रिपोर्ट हुए। इन 71 मामलों में से 50 की मौत हो गई। लेकिन तब बाकी देश में इसको लेकर कोई खास हलचल नहीं हुई, क्योंकि राजनीति, खुदगरजी, एक दूसरे की टांग खींचने में रस लेने वाले इस देश में अचानक हुई मौतें भी चिंता का कारण नहीं बनती।

यही निफा वायरस अब केरल से भारत में फिर एंटर हुआ है। अमूमन दूसरे प्राणियों से फैलने वाले वायरस के बारे में हमे थोड़ी बहुत जानकारी रहती है, लेकिन उड़ते प्राणियों (चमगादड़ों को ‘उड़न लोमड़ी’ भी कहा जाता है) से हमारे शरीर में पहुंचकर मौत का पैगाम देने वाले निफा जैसे वायरस ने लोगों की नींद उड़ा दी है। क्योंकि यह वायरस शाकाहारी चमगादड़ (फ्रूट बैट्स) के मार्फत फैलता है।

फ्रूट बैट्स पेड़ों पर लगे फल, सब्जी और फूलों के पराग खाकर जिंदा रहते हैं। उनके जूठे फल खाने पर निफा वायरस मनुष्य के रक्त में मिल जाता है और कुछ ही समय में उसकी जान ले लेता है। बताया जाता है कि निफा पीडि़त को अगर तुरंत उपचार ‍न मिले तो 48 घंटे में कोमा में जा सकता है। इसका इलाज केवल इंटेसिव सर्पोटिंग केयर से ही संभव है। डॉक्‍टरों का कहना है कि निफा से बचने का एक तरीका यही है कि जमीन पर पड़े फल इत्यादि न खाए जाएं। निफा वायरस का संक्रमण मनुष्य से मनुष्य में भी तेजी से फैलता है।

यूं दुनिया में चमगादड़ को संरक्षित प्राणियों की श्रेणी में रखा गया है। ये अमूमन अंधेरी गुफाओं, पेड़ों पर या डरावनी जगहों पर ही चैन से रहते हैं। इसकी आवाज और गंध डराती लगती है। चमगादड़ के प्रति भयमिश्रित कौतुहल इसके उलटे लटकने और रात में ही सक्रिय होने के कारण ज्यादा रहा है।

चमगादड़ उल्टा इसलिए लटकते हैं, क्योंकि इनकी आगे वाली भुजाएं पंखों में तब्दील हो गई हैं। हालांकि चमगादड़ अंधे नहीं होते, लेकिन उनकी दृष्टि बहुत कमजोर होती है। वे पराध्वनि तरंगों को आसानी से सुन और भेज सकते हैं। उनकी विष्ठा को उर्वरक माना जाता है। चीन में चमगादड़ वैभव और सौभाग्य का प्रतीक है। फेंग शुई में भी चमगादड़ को शुभ माना गया है।

इसके बावजूद चमगादड़ को वो दुलार कभी नहीं मिला, जो दूसरे स्तनधारी प्राणियों को मिलता रहा है। चमगादड़ों ने भी इसका कभी बुरा माना हो, ऐसा नहीं लगता। भारत सहित दुनिया के कई देशों में चमगादड़ों को बचाने के वैज्ञानिक प्रयास किए जा रहे हैं। संयोग से विश्व में सबसे ज्यादा चमगादड़ अमेरिका में हैं। वहां फ्लोरिडा विवि में एक कृत्रिम आवास में चार लाख से ज्यादा चमगादड़ रहते हैं। कुछ देशों में चमगादड़ खाए भी जाते हैं, लेकिन कई जगह इन्हें इनके विशिष्ट पंखों के लिए मारा जाता है।

फिर भी चमगादड़ को ज्यादातर सभ्यताओं में बहुत अच्छी और दोस्त निगाहों से नहीं देखा गया। चमगादड़ों की रहस्यमय जिंदगी ने उन्हें हमें हमारी अघोरी दुनिया में ही जगह दी। वे किसी देवता तो क्या राक्षस का वाहन भी शायद ही बने हों। हालांकि यह शायद पहली बार है, जब रात के सन्नाटे को चीरती चमगादड़ों की डरावनी आवाज के अलावा भी मनुष्य चमगादड़ों से इतना बुरी तरह चमका है।

वे एक ऐसे रोग के जानलेवा वाहक बनकर सामने आए हैं, जिसके विषाणु चमगादड़ों के शरीर में ही पलते हैं। हालांकि रैबीज जैसी जानलेवा बीमारी के विषाणु भी मनुष्य के ‘वफादार’ दोस्त कुत्ते के शरीर में पलते हैं, इसके बाद भी कुत्ते को कभी डरावनी श्रेणी में नहीं रखा गया। पर चमगादड़ इतनी किस्मत वाले नहीं रहे।

गरुड पुराण में तो कहा गया है कि पर पुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली स्त्री का अगला जन्म चमगादड़ योनि में होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह अभिशाप सारे चमगादड़ों को पता चल गया हो और वे मनुष्य से इसका बदला ‘निफा’ वायरस के रूप में लेने निकल पड़े हों। लेकिन मनुष्य और प्राणियों में बुनियादी फर्क यह है कि प्राणियों को पता नहीं होता कि वे किसी रोग के वाहक भी हैं, जबकि मनुष्य रोग भी अपने स्वार्थों और सुविधा के हिसाब से फैलाने में माहिर होता है।

‘निफा’ हमारे वजूद के लिए नया खतरा है। इससे बचने का तरीका फिलहाल तो रोकथाम और सावधानियां ही हैं। हो सकता है कि हम कल को इस चमगादड़ी रोग से निपटने का नुस्खा भी ढूंढ लें। बहरहाल मन को मथने वाला सवाल एक ही है कि क्या ‘निफा’ के जरिए चमगादड़ सचमुच पिशाच बन गए हैं?

( ‘सुबह सवेरे’ से साभार)

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