देश अपने प्रधानमंत्री की बात पर भरोसा करे या नहीं?

ऐसा लग रहा है कि नोटबंदी को लेकर अब लोगों को बैंकों और एटीएम से नोटों के मिलने या न मिलने से उतनी परेशानी नहीं हो रही है जितनी सरकार के रोज रोज बयान बदलने, रोज एक नया आदेश/निर्देश जारी करने या अगले दिन उसे भी बदल डालने से हो रही है। ताजा मामला 500 व 1000 के नोटों को एकमुश्त जमा करवाने और ऐसी राशि जमा कराने वालों से बैंकों द्वारा पूछताछ किए जाने का है।

सरकार ने इस आशय का आदेश 19 दिसंबर को जारी किया था। इस आदेश में कहा गया था कि अब कोई व्यक्ति 30 दिसंबर तक 5,000 रुपए से ज्यादा पुराने नोट एक बार ही जमा कर सकता है। उसे यह भी बताना होगा कि अब तक यह नकदी उसने क्यों नहीं जमा की थी। जबकि इसके पहले खुद प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर को नोटबंदी को लेकर दिए गए राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था कि 30 दिसंबर तक पुराने नोट बिना किसी बाधा के बैंकों में जमा करवाए जा सकते हैं। आपसे कोई पूछताछ नहीं होगी।

रिजर्व बैंक के 19 दिसंबर के आदेश पर जब भारी विरोध हुआ तो सरकार ने 21दिसंबर को यह आदेश वापस लेते हुए कहा कि KYC (Know Your Customer) संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने वाले खाताधारक पूर्ववत 30 दिसंबर तक पुराने नोट अपने खातों में जमा करवा सकेंगे और उनसे कोई पूछताछ भी नहीं होगी।

लेकिन उन लोगों के मानसिक संत्रास की भरपाई कौन करेगा जो इन 48 घंटों के दौरान इस आदेश से उपजी उलझनों को लेकर परेशान रहे होंगे।

इन 48 घंटों के दौरान जो लोग बैंकों में अपना पैसा जमा करवाने गए उनसे बैंक वालों ने अब तक पैसा जमा न कराने को लेकर कई सवाल कर डाले। लोगों ने इन सवालों के जो लिखित और मौखिक जवाब दिए हैं वे नोटबंदी से उपजी पीड़ा और त्रास को बयान करने वाले हैं। जैसे एक व्‍यक्ति ने बैंक के फार्म में पूछे गए सवाल-यह राशि पहले क्‍यों नहीं जमा करवाई जा सकी? के जवाब में लिखा-

‘’Because Modiji has told us to deposit these notes anytime before 30th Dec. and today is 20th Dec 16, and I trusted him.’’

(क्योंकि मोदीजी ने हमसे कहा था कि ये नोट 30 दिसंबर से पहले कभी भी जमा करवाए जा सकते हैं और आज तो 20 दिसंबर 2016 ही है, मैंने उन पर भरोसा किया।)

स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव ने बैंक फॉर्म को लेकर अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा- ‘’मुझे कोई कारण समझ में नहीं आता कि मैं बैंक में देरी से डिपॉजिट करवाने लिए विशेष स्पष्टीकरण क्यों दूं। आमतौर पर मैं कतार खत्‍म होने का इंतजार करना पसंद करता हूं। प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और आरबीआई ने मुझे आश्‍वासन दिया था कि बैंकों की ओर भागने की जरूरत नहीं है, डिपॉजिट के लिए मेरे पास 30दिसंबर तक का समय रहेगा। मैंने उनका भरोसा किया।‘’

एक शिक्षक ने बैंक वालों को सीधा सा जवाब दिया कि ‘’मुझे लगा आखिरी दिनों में करवाऊंगा… क्योंकि बैंकों में काफी भीड़ थी। मैं भीड़ में खड़ा नहीं हो सकता। लेकिन रोज आ रहे नियम मुझे परेशान कर रहे हैं। इसलिए आज मैं सारे पैसों को जमा करवाने आ गया।‘’

ऐसे ही एक घरेलू महिला ने लिखा कि ‘’बेटे की शादी का इंतजार कर रही थी। मुझे पता था कि शादी में लोग पुराने नोट दे जाएंगे। सो इकट्ठे अब हुए हैं… मैं ले आई। अब जमा करिए…’’

एक छोटे दुकानदार का कहना था कि प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री जी ने ही मना किया था कि जल्दबाजी की जरूरत नहीं है। एक दिहाड़ी मजदूर ने लिखा कि ‘’मुझे नहीं पता… सरकार से पूछो… कभी कुछ कहते हैं, कभी कुछ कहते हैं। सुबह से लाइन में लगे हैं। काम पर भी जाना है।‘’

दरअसल नोटबंदी की असली मुश्किल या संकट नोट का नहीं बल्कि विश्‍वास का है। सरकार को लोगों पर भरोसा नहीं है और लगातार बदलते बयानों के कारण अब लोग सरकार पर भरोसा नहीं कर रहे। इतनी बड़ी राजनीतिक पार्टी और उसकी सरकार की बुद्धि में यह मोटी सी बात क्‍यों नहीं आ रही कि लोग कालेधन या भ्रष्‍टाचार को रोकने की पहल का विरोध नहीं कर रहे, न ही वे इस दिशा में उठाए जाने वाले कदमों से परेशान हैं। वे परेशान हैं आपके अस्थिर चित्‍त होने से… आपके द्वारा समुचित इंतजाम न किए जाने से। पहले आप तो ठीक से तय कर लें कि आपको करना क्‍या है, इस स्थिति से आप कैसे निपटना चाहते हैं।

जिस रात प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए देशवासियों से 50 दिन मांगते हुए सहयोग की अपील की थी उस रात के बाद से सरकार के प्रति विश्‍वास लगातार घटता जा रहा है। और यह विश्‍वास किसी अन्‍यथा कारण से नहीं बल्कि खुद सरकार के हर पल बदलते रवैये के कारण है। आखिर सरकार या रिजर्व बैंक खुद प्रधानमंत्री के देशवासियों को दिए गए आश्‍वासन या भरोसे के विपरीत जाकर कोई आदेश कैसे निकाल सकते हैं? इस सरकार का कोई धनीधोरी है भी या नहीं…

जिस व्‍यक्ति ने बैंक वालों से यह कहा कि उसने प्रधानमंत्री की बात पर भरोसा किया,वह किसी एक व्‍यक्ति का नहीं बल्कि इस देश के लाखों लोगों का कथन है। उसका मर्म समझिए। आप ने इस देश की मुद्रा का वजन तो खतम कर दिया, कम से कम अपनी बात का वजन तो बना रहने दीजिए…

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