राज्यपाल जी, गिल्ली डंडे को सचमुच संजीवनी की दरकार है !

अजय बोकिल

कुछ मामलों में जड़ों की ओर लौटना सुखकर होता है। कम से कम गिल्ली डंडा जैसे निहायत अनौपचारिक और देसी खेल के बारे में ऐसा कहा ही जा सकता है। मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल इस जमीनी हकीकत को शायद बहुत अच्छी तरह समझती हैं। इसीलिए उन्होंने राजभवन में जो क्रांतिकारी बदलाव शुरू किए हैं, उनमें से एक है- गिल्ली डंडा

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक राज्यपाल इन दिनों राजभवन में बच्चों संग गिल्ली डंडा खेल रही हैं। यह खुलासा खुद उन्होंने ही किया। वे जब भोपाल के सरकारी सरोजिनी नायडू स्कल में निरीक्षण के लिए पहुंचीं तो यह भी बताया कि उन्होंने दस जोड़ी गिल्ली-डंडे मंगवाए हैं। साथ में खुला निमंत्रण भी कि जिस किसी को यह खेल खेलना है तो वह राजभवन आ सकता है। राज्यपाल ने बेहद गंभीरता और कसक के साथ से कहा कि हमारे पुराने खेल हमसे छिनते जा रहे हैं। जबकि इन खेलों पर कोई खास पैसा भी खर्च नहीं होता। ऐसे खेलों को हमे जिंदा रखना चाहिए।

आनंदी बेन गुजरात की मुख्य मंत्री रही हैं। लंबे समय तक राजनीति की है। इसके पूर्व शिक्षिका भी रही हैं। उन्होंने हिंदुस्तान को करीब से देखा है। महसूस‍ किया है। क्योंकि गिल्ली डंडे को वही समझ सकता है, जिसके पैर देश की माटी में सने हों। आज टीवी और सोशल मीडिया की दीवानी पीढ़ी को शायद गिल्ली डंडे के जलवे का पता भी नहीं होगा। हालांकि गांवों और शहरों की गरीब बस्तियों में यह खेल आज भी खेला जाता है।

यह सबसे सस्ते देसी खेलों में से है। खेलने के लिए भी न्यूनतम दो लोग चाहिए। और सामान भी क्या, केवल एक लंबा मजबूत डंडा और छोटी दोनो ओर से नुकीली लकड़ी की गिल्ली। इसके साथ टोल (शॉट) मारने का दम और चौकन्नी नजरें। खेल का उद्देश्य डंडे से गिल्ली को मारना है। गिल्ली को ज़मीन पर रखकर डंडे से किनारों पर मारते हैं जिससे गिल्ली हवा में उछलती है। गिल्ली को हवा में ही ज़मीन पर गिरने से पहले फिर डंडे से मारते हैं।

जो खिलाड़ी सबसे ज्यादा दूर तक गिल्ली को पहुँचाता है वह विजयी होता है। यदि गिल्ली हवा में कैच हो जाती है तो गिल्ली को मारने वाला खिलाड़ी हार जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो सामने खड़ा खिलाड़ी गिल्ली को डन्डे पर मारता है जो कि जमीन के गड्ढे पर रखा होता है। यदि गिल्ली डंडे पर लग जाती है तो खिलाड़ी हार जाता है, अन्यथा पहला खिलाडी फिर गिल्ली को डंडे से मारता है, जिससे गिल्ली हवा में उछलती है।

खिलाड़ी को गिल्ली को इस प्रकार मारना होता है कि उसका डंडे वाला हाथ उसके एक पैर के नीचे रहे। इसे हुच्चको कहते है। इस खेल में अधिकतम खिलाडि़यों का कोई बंधन नहीं है। गिल्ली डंडे के कोई निश्चित नियम नहीं है। यह अंचल के हिसाब से बदलते रहते हैं। इस मायने में यह खेल काफी लोकतांत्रिक है।

गिल्ली डंडा आज से तीन दशक पहले तक बच्चों और युवाओं के मनोरंजन का एक प्रमुख साधन हुआ करता था। दरकार होती थी, एक मैदान की। शहरों में मैदान खत्म होते गए और टीवी युग के साथ गिल्ली डंडे का जमाना भी लद गया। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि इसमें किसी तरह की शो मैन शिप नहीं थी। शुद्ध मनोरंजन था। बदलते जमाने ने उसे इसलिए छोड़ दिया कि इससे बाजारवाद को कोई ताकत नहीं मिलती थी।

हमारे पारंपरिक खेलों में कबड्डी को तो किसी तरह जिंदा रहने के लिए ऑक्‍सीजन मिल गई, लेकिन गिल्ली डंडा अभी भी इसकी राह देख रहा है। कुछ स्थानों पर इसकी प्रतियोगिताएं होती हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह देसी गंवार लोगों का ही खेल मान लिया गया है।

वास्तव में गिल्ली डंडा केवल भारत का ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया का लोकप्रिय खेल रहा है। माना जाता है कि यह ढाई हजार साल से खेला जा रहा है। नेपाली में इसे ‘डंडी बियो’ तो बांगला देश में इसे ‘डांगुली खेला’ कहते हैं। सिंधी में ‘इट्टी डकार’ तो मराठी में ‘विटी दांडू’ कहते हैं। माना जाता है कि गिल्ली डंडा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘घट्टिका’ से हुई है। इस खेल में बड़ी लकड़ी से छोटी लकड़ी को मारा जाता है।

गिल्ली डंडे की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने ‘गिल्ली डंडा’ कहानी लिखी, जिसके माध्यम से जाति विषमता को उन्होंने उजागर किया है। मराठी में ‘विटी दांडू’ नाम से फिल्म भी बनी है।

गहराई से देखें तो गिल्ली डंडा आधु‍निक क्रिकेट का पूर्वज और आदिम रूप है। यह क्रिकेट के ताम झाम और शोबाजी से बहुत दूर है। इसकी आत्मा भारत में बसती है। यह सीधे मिट्टी से जुड़ा खेल है। क्योंकि गिल्ली को उचकाने के लिए जो खांचा बनाया जाता है, वह भी जमीन में ही खोद कर बनाना पड़ता है। इसमें कोई ड्रेस कोड नहीं होता और न ही नियम कायदों का जंजाल है। गिल्ली डंडा में केवल हार जीत होती है। ड्रा होने जैसे चोचले इसमें नहीं होते।

राज्यपाल इस खेल को फिर से लोकप्रिय बनाने की कोशिश कर रही हैं तो इसकी सराहना की जानी चाहिए। अच्छा होगा कि राज्य में संभागीय या राज्य स्तर पर इसकी प्रतियोगिता आयोजित की जाए। इसके लिए जरूरी नियम और व्यवस्थाएं की जा सकती हैं, जो बहुत महंगी नहीं होंगी। बुनियादी जरूरत पश्चिमी सोच का गुलाम बनकर अपनी हर चीज को हिकारत के भाव से देखने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाने की है। क्योंकि गिल्ली डंडा केवल खेल नहीं है, वह हमारी सदियों की विरासत है।

वो विरासत जहां खेल सिर्फ शुद्ध मन से खेला जाने वाला खेल है। वह ‘कमाने’ का जरिया नहीं है। वह जीवन से जुड़ा है। जहां लालच की गिल्ली को विवेक का डंडा काबू में रखता है।

(सुबह सवेरे से साभार)

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