कहीं देखी है आपने ऐसी आर-पारदर्शी लोकशाही?

गिरीश उपाध्‍याय

‘’खुश तो बहुत होगी मध्‍यप्रदेश सरकार इन दिनों…’’

यह अमिताभ बच्‍चन की किसी फिल्‍म का डॉयलाग नहीं, जमीनी सचाई है। फिर भी यदि आप इस बात से सहमत न हों तो, चलिए इसे यूं कर लेते हैं-

‘’खुश तो बहुत होना चाहिए मध्‍यप्रदेश सरकार को इन दिनों…’’

प्रश्‍न स्‍वाभाविक है कि आखिर सरकार के खुश होने की यह पहेली क्‍या है? तो चलिए यह पहेली हल करने के लिए मैं आपको कुछ ‘क्‍लू’ दे देता हूं। क्‍लू यह है कि मध्‍यप्रदेश में धर्म कर्म के प्रति झुकाव बढ़ता हुआ लग रहा है। बाकी लोगों की तो छोडिए, यहां के अफसर भी हमारे संत कवियों की अमरवाणी पर अमल करने लगे हैं। मेरी बात को समझने के लिए बस एक ही उदाहरण काफी है। महान संत कवि तुलसीदास की सार्वकालिक रचना रामचरित मानस के पांचवें अध्‍याय सुंदरकांड में एक प्रसिद्ध दोहा है जो राजकाज चलाने वालों को बहुत बड़ी नसीहत देता है। यह दोहा है-

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

सैद्धांतिक रूप से यह राजधर्म और समाज धर्म की बहुत सुंदर नीतिगत व्‍याख्‍या है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि राजा का सचिव, बीमार व्‍यक्ति का वैद्य और शिष्‍य का गुरु किसी भय के कारण राजा, बीमार या शिष्‍य को प्रिय लगने वाली बात बोलने लगे तो उससे राज्‍य का, धर्म का और शरीर का शीघ्र ही नाश हो जाता है।

यानी राजा को, बीमार व्‍यक्ति को या शिष्‍य को खुश करने वाली बात बोलने के बजाय वही बात बोली जानी चाहिए जो उनके हित में हो। भले ही उन्‍हें वह बात अप्रिय लगे।

इतनी लंबी भूमिका के बाद आपको मध्‍यप्रदेश सरकार के खुश होने वाली, पहेली कुछ कुछ समझ में जरूर आने लगी होगी। और यदि अब भी आप न समझें हों तो चलिए मामले को और ज्‍यादा घसीटने के बजाय सीधे मुद्दे पर बात कर लें।

मध्‍यप्रदेश सरकार इसलिए खुश होगी या उसे इसलिए खुश होना चाहिए कि इन दिनों राज्‍य की अफसरशाही रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास जी की सीख पर खरा उतरने का प्रयास कर रही है। राज्‍य के सचिव बिना किसी भय के वो बात बोल रहे हैं जो प्रथम दृष्टि से कहें या अंतिम दृष्टि से, राजा को प्रिय तो कतई नहीं लग रही होगी।

चूंकि लोकतंत्र में वैसे राजा नहीं होते इसलिए आप सरकार को ही राजा मानें। लेकिन तुलसीदास ने राजा के मंत्री के लिए जिस सचिव शब्‍द का उपयोग किया है, उसकी सत्‍ता अभी तक बनी हुई है। सारी नौकरशाही आधुनिक राजा यानी सरकार की सचिव ही है। और मध्‍यप्रदेश में इस सचिव मंडली के कुछ लोग इन दिनों प्रिय नहीं बोल रहे हैं।

दो दिन पहले पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव रमेश थेटे ने मुख्‍यमंत्री को पत्र लिखकर अपने विभाग के मुखिया और अपर मुख्‍य सचिव राधेश्‍याम जुलानिया पर आरोप लगाया कि उनके दिमाग में जातिवाद का कचरा भरा है। उन्‍होंने मुझे केवल टॉयलेट बनवाने और साफ करने का काम देकर ‘स्‍वीपर’ बना दिया है। थेटे ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि उनके साथ न्‍याय नहीं हुआ तो ऐसा बवाल उठेगा कि सरकार की मुश्किल हो जाएगी।

कई सालों से सरकार और अपने सीनियर अफसरों से चिट्ठी पत्री के जरिए संवाद कर रहे थेटे का यह पत्र अभी मुख्‍यमंत्री की टेबल पर पहुंचा ही होगा कि पीछे पीछे एक और पत्र की खबर चली आई। यह पत्र वन विभाग के बहुत बड़े अफसर, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक, आजाद सिंह डबास ने मुख्‍य सचिव को लिखा है। आजाद ने भी सरकार के चहेते अफसर राधेश्‍याम जुलानिया की कार्यप्रणाली पर ही उंगली उठाई है।

डबास ने अपने पत्र में, हाल ही में पन्‍ना में दो नए बांधों के पहली बारिश में ही फूट जाने का मुद्दा उठाते हुए इस पर आश्‍चर्य जताया। उन्‍होंने इसमें भ्रष्‍टाचार की आशंका जाहिर करते हुए इसकी जांच की मांग की। जल संसाधन विभाग की समूची कार्यप्रणाली को ही संदेह के घेरे में लेते हुए डबास ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश में पिछले 10 सालों में सिंचाई का रकबा 7 लाख हेक्‍टेयर से बढ़ कर 35 लाख हेक्‍टेयर हो गया है, तो पिछली गर्मी में कृषि के लिए सिंचाई के पानी का संकट क्‍यों हुआ? जांच इसकी भी होनी चाहिए।

बाकी पत्र तो ठीक है लेकिन डबास ने उसमें एक बहुत सुंदर उक्ति कही है। यह उक्ति ऊपरी तौर पर तुलसीदासजी की नीतिगत लाइन वाली नहीं दिखती, लेकिन फॉलो उसी लाइन को करती है। डबास ने लिखा कि- ‘’यदि भ्रष्‍टाचार और अनियमितताओं पर कार्रवाई नहीं होगी तो मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मंशा ‘न खाउंगा और न खाने दूंगा’ कैसे पूरी हो पाएगी?’’

तो अब आप ही बताइए। मैंने क्‍या गलत कहा। यह तो सरकार के लिए खुशी की ही बात हुई ना कि हमारे अफसर रामराज्‍य वाले तुलसीदास जी को फॉलो करते हुए सरकार को ‘प्रिय’ लगने वाली बात नहीं बोल रहे हैं। उम्‍मीद करनी चाहिए कि सुंदरकांड के पाठ का यह सिलसिला और आगे बढ़ेगा, साथ ही तुलसीदास जी से प्रेरणा लेने वालों की संख्‍या भी।

और हां, मेरी बात भी आपको ‘प्रिय’ न लगी हो, तो मुझे भी आप तुलसी भक्‍त मान लीजिएगा।

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