बिल का आना और बिल का लटक जाना… क्‍या है अफसाना!

समझ में ही नहीं आया कि राजस्‍थान सरकार को आखिर क्‍या सूझी कि वह एक आत्‍मघाती बिल लेकर आई। भ्रष्‍टाचार को सरेआम संरक्षण देने वाले जिस बिल के बारे में राजनीति का कोई नौसिखिया भी बता सकता था कि यह कदम अपने पैर पर कुल्‍हाड़ी मारने जैसा होगा उसे इतनी अनुभवी राजनेता वसुंधरा राजे ने लाने का जोखिम आखिर क्‍यों उठाया होगा?

चौतरफा आलोचना के बाद वसुंधरा राजे सरकार ने अपने कदम पीछे खींचते हुए दंड विधियां (राजस्‍थान संशोधन) अध्‍यादेश 2017 को विधानसभा की सिलेक्‍ट कमेटी के विचारार्थ भेजने का फैसला किया है। लेकिन इससे पहले तक तो सरकार पूरी तैयारी में थी कि इस बिल को विधानसभा में पास करा लिया जाए। उसने इसी इरादे से बिल विधानसभा में प्रस्‍तुत भी कर दिया था यह बात अलग है कि भारी विरोध के चलते उसे पारित नहीं किया गया।

बिल में प्रावधान था कि बिना सरकार की अनुमति के अदालतें भी मंत्रियों, विधायकों तथा सरकारी अधिकारियों के खिलाफ किसी शिकायत की सुनवाई नहीं कर सकेंगी। कानून के मुताबिक मंजूरी लिए बिना, किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कुछ भी प्रकाशित करने पर मीडिया को भी अपराधी मानने और पत्रकारों को दो साल तक की कैद की सजा सुनाने की भी ‘व्‍यवस्‍था‘ थी।

जाहिर था कि इस बिल का विरोध होगा और वैसा ही हुआ भी। प्रस्तावित कानून की न सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा विपक्षी कांग्रेसियों ने बल्कि सत्तासीन भाजपा के नेताओं ने भी आलोचना की थी। भाजपा के बागी नेता और विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने तो इसे पार्टी सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए यहां तक कह दिया था कि हमने इमरजेंसी का विरोध इसलिए नहीं किया था, कि भाजपा की सरकार आकर इस तरह का कानून बनाए।

यानी मुख्‍यमंत्री से लेकर उनकी सलाहकार मंडली तक को यह बात अच्‍छी तरह मालूम थी कि इस पर बवाल मचेगा। इसके बावजूद पहले इस आशय का अध्‍यादेश पारित करवाया गया और बाद में इसे विधेयक के रूप में विधानसभा से मंजूरी दिलाने की भी कोशिश की गई। बिल के प्रति सरकार के इस भारी ‘‍कमिटमेंट’ से यह सवाल और भी ज्‍यादा गहरा हो जाता है कि आखिर सरकार ने जानते बूझते इस छत्‍ते में हाथ क्‍यों डाला?

मामले को टटोलने की कोशिश के दौरान मुझे जयपुर में ही मेरे पुराने सहयोगी रहे पत्रकार प्रवीण जाखड़ ने एक वाट्सएप संदेश भेजा जो इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्‍प कहानी बताता है। उस कहानी के अनुसार यह पूरा मामला जयपुर में सरकारी अफसरों और प्रभावशाली लोगों के बीच हुई बेशकीमती जमीन की बंदरबांट से जुड़ा है।

संदेश कहता है कि खो नागोरियन इलाके में पर्यावरणीय महत्‍व की 200 बीघा जमीन को जयपुर विकास प्राधिकरण यानी जेडीए ने आवासीय जमीन में बदल दिया था। इसके खिलाफ राजस्‍थान हाईकोर्ट में एक याचिका लगी। कोर्ट ने 2005 में आदेश दिया कि भविष्य में पर्यावरणीय महत्‍व की जमीन का भू-उपयोग नहीं बदला जाए। लेकिन इस आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए जेडीए ने 2006 में कथित रूप से 1200 हेक्‍टेयर से अधिक क्षेत्रफल की इकोलॉजिकल जमीन को आवासीय एवं मिश्रित भू उपयोग वाली जमीन में तब्‍दील कर दिया।

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद यह खेल इसलिए खेला गया क्योंकि इसमें से ज्‍यादातर जमीन राज्‍य के आईएएस और आईपीएस अफसरों ने खरीद रखी थी। खेल सिर्फ जमीन के उपयोग परिवर्तन तक ही नहीं रुका। लाभान्वित होने वाले अफसरों ने जेडीए से इस जमीन के आसपास की जमीनें भी सड़कें बनाने के लिए अधिग्रहीत करवा दीं ताकि उनके मालिकाना हक वाली जमीन के सामने 160 फ़ीट चौड़ी सड़कें बन जाएं।

21 जनवरी 2017 को जोधपुर हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान संबंधी एक याचिका के सिलसिले में सरकार से उस 1200 हेक्‍टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली जमीन का रिकार्ड भी मंगवाया जिसका भू-उपयोग बदल दिया गया था। लेकिन जेडीए ने कोर्ट को गुमराह करते हुए आधा अधूरा रिकार्ड पेश कर दिया।

याचिकाकर्ता ने जब इस पर सख्‍त ऐतराज जताया और हाईकोर्ट ने फटकार लगाई तब जाकर जेडीए ने बाकी रिकार्ड पेश किया। उसमें यह पोल खुली कि मुख्य नगर नियोजक ने ईकोलॉजिकल जमीन का भू-उपयोग बदलने से इंकार किया था, लेकिन वरिष्‍ठ आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के दबाव और मिलीभगत के चलते भू-उपयोग बदलवा लिया गया और इस तरह कौडि़यों की जमीन करोड़ों रुपए की हो गई।

आरोप यह भी है कि अफसरों की इस कारगुजारी में राजनेताओं ने भी मौके का फायदा उठाया। हाईकोर्ट पहुंचे याचिकाकर्ताओं ने जब ये तमाम कागजात पेश किए तो कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि वह इस मामले में क्‍या कार्रवाई करने जा रही है। इस बीच याचिकाकर्ताओं ने सरकार के खिलाफ 2 जून 2017 को अवमानना याचिका भी लगा दी। इससे सरकार एवं अफसरों को लग गया कि उन पर कार्रवाई होना तय है। बस इसीके चलते सरकार यह अध्‍यादेश लेकर आई ताकि दोषी अफसरों को बचाया जा सके।

यानी सारा मामला ‘खाऊंगा और खाने दूंगा’ का है। पर प्रधानमंत्री तो कहते हैं कि उनकी सरकार ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के सिद्धांत पर चल रही है। अब लोग बिचारे किस पर भरोसा करें। एक तरफ प्रधानमंत्री का ऐलान है और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री की ही पार्टी के शासन वाली एक सरकार की जीती जागती हरकत। किसे सही मानें, लफ्जों को या ‘जमीनी’ हकीकत को…

सवाल तो यह भी है कि बिल को सिलेक्‍ट कमेटी के ‘बिल’ में घुसा देने से क्‍या मसला हल हो गया है? क्‍या मान लिया जाए कि जो कुछ भी हुआ है वह इस नए पैंतरे से अनकिया या ‘अनडू’ हो जाएगा? क्‍या भाजपा संगठन या उसकी मार्गदर्शक संस्‍था राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ में कोई है जो राजस्‍थान की मुख्‍यमंत्री से यह सवाल पूछे कि आखिर पार्टी और विचार के नाम पर बट्टा लगाने वाली यह हरकत उन्‍होंने क्‍यों की? क्‍या इसकी कोई सजा नहीं बनती?

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here