निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला

सुरेन्द्र पॉल

अंततः देश की सर्वोच्च अदालत ने निजता (प्रायवेसी) के अधिकार को मौलिक अधिकार मान ही लिया। माननीय उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने सर्वसम्मति से 24 अगस्‍त को सुनाये गये फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। यह ऐतिहासिक निर्णय सभी भारतीयों के जीवन को प्रभावित करेगा। इससे केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि निजी कंपनियों के मनमाने रवैये पर कुछ हद तक अंकुश लगेगा। निजता के अंतर्गत किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित वे तथ्य या घटनाएं आती हैं, जिसे कोई नागरिक व्यक्तिगत या अन्य किसी भी कारण से सार्वजनिक नहीं करना चाहता।

फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. खेहर की अध्यक्षता वाली संवैधानिक बेंच ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और संविधान के पूरे भाग तीन के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही खंडपीठ ने 1950 के एम.पी. शर्मा केस और 1960 के खड़ग सिंह केस में सुनाए गये फैसलों को भी खारिज कर दिया।

हालांकि निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग एक लंबे समय से उठती रही है लेकिन हाल ही में आधार कार्ड को सरकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य करने की शर्त जोड़े जाने के बाद निजता के अधिकार को लेकर देश भर में काफी बहस छिड़ी और यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस मामले को मैग्सेसे सम्मान प्राप्त एवं जानीमानी बाल अधिकार कार्यकर्ता सुश्री शांता सिन्हा, कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी और कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके उठाया था।

याचिकाकर्ताओं ने आधार कार्ड योजना की अनिवार्यता की शर्त को चुनौती देते हुए इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन करार दिया था और सुप्रीम कोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग की थी। इस पर केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि गोपनीयता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार ने नागरिकों द्वारा सरकार की विभिन्न समाज कल्याण योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब कोई भी नागरिक सरकार को अपने बॉयोमीट्रिक्स और व्यक्तिगत विवरण देता है और बदले में इसे व्यावसायिक संगठनों द्वारा प्रयोग (या दुरुपयोग) किया जाता है, तो यह निजता का उल्लंघन है।

आधार कार्ड द्वारा निजता के अधिकार के उल्लंघन के मामले की सुनवाई उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय खंडपीठ साल 2015 से कर रही है। इसमें आधार को कानूनी तौर पर लागू करने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार के वकीलों ने कोर्ट में निजता के अधिकार की मौलिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। इस पर उक्त खंडपीठ ने जस्टिस जे.एस. खेहर की अध्यक्षता में ‘निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं, इसे तय करने के लिए नौ सदस्यीय खंडपीठ का गठन किया था जिसने यह फैसला सुनाया है। यह मामला केवल इस बात तक ही सीमित था कि क्या निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।

आधार कार्ड की अनिवार्यता के विरुद्ध दाखिल याचिका में आधार कार्ड की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि सरकार द्वारा सभी नागरिकों का निजी डाटा लिया जाना आम आदमी के निजता के अधिकार में हस्तक्षेप है। पूरी आधार योजना ही संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद-21 (जीवन व स्वतंत्रता अधिकार) के अंतर्गत दिये गये मौलिक अधिकारों का हनन है। तब सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को नौ जजों की संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया था और कहा था कि पहले यह तय होगा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं, इसके बाद आधार मामले की अलग से सुनवाई होगी।

अब, जबकि सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आ गया है, तो देखना यह होगा कि आधार मामले की जांच कर रही पांच सदस्यीय खंडपीठ क्या फैसला करती है। आधार कार्ड बनाते समय ली जाने वाली जानकारियां निजता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं या नहीं। हालांकि निजता के अधिकार के मौलिक अधिकार घोषित कर देने के बाद भी सरकार अन्य अधिकारों की तरह उस पर तर्कपूर्ण रोक लगा सकती है।

अब तक क्या थी स्थितिः

जहां तक निजता के संवैधानिक निर्धारण का प्रश्न है, इस फैसले के आने तक भारतीय संविधान का कोई भी अनुच्छेद स्पष्ट रूप से इसे मौलिक अथवा अन्य संवैधानिक अधिकार के रूप में निर्धारित ही नहीं करता था। इसे संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार की धारा 21 के तहत ही संरक्षित माना जा सकता था। भारत में निजता के अधिकार का प्रथम मामला था 1950 का एम.पी. शर्मा केस, लेकिन 1960 में ‘खड़ग सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ मामला काफी चर्चा में रहा। खड़ग सिंह को डकैती के आरोप में जेल में बंद कर उसके खिलाफ केस चलाया गया था लेकिन उसके विरुद्ध पर्याप्त सबूत न होने के कारण उसे बाद में छोड़ देना पड़ा था।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने ‘पुलिस रेगुलेशन एक्ट’ की धारा 228 के चैप्टर 20 के अंतर्गत खड़ग सिंह के पुराने ‘रिकॉर्ड’ के आधार पर उसकी निगरानी करने का निर्णय लिया। इसके तहत खड़ग सिंह के घर पर रोज रात को एक चौकीदार आवाज लगाकर उसके घर के अन्दर होने की पुष्टि किया करता था। इस मामले में खड़ग सिंह ने अपनी निजता के भंग होने को लेकर उच्चतम न्यायालय में उसके अधिकार की सुरक्षा के लिए गुहार लगाई। फलस्वरूप उस समय उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से निर्धारित किया कि हमारा संविधान निजता के अधिकार को मान्यता नहीं देता, परन्तु अल्पमत में न्यायमूर्ति सुब्बाराव ने ‘निजता के अधिकार’ को व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अधिकार का अभिन्न अंग माना।

इस प्रकार पहली बार ‘निजता’ को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन जीने का अधिकार) के अंतर्गत रखने की बात हुई। साथ ही ‘निजता’ को आधार बनाकर पुलिस रेगुलेशन एक्ट से चैप्टर 20 को हटा दिया गया। 1975 में ‘गोविन्द बनाम मध्यप्रदेश सरकार’ के मामले में ‘खड़ग सिंह केस’ के फैसले को आधार मानकर उच्चतम न्यायालय ने इसे व्यक्ति का मूलभूत अधिकार तो माना लेकिन इसे अलग से मौलिक अधिकार न मानते हुए अनुच्छेद 21 के साथ ही रखा गया।

मौजूदा फैसले ने निजता को लेकर आए पुराने सभी फैसलों को भी पलट दिया है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में किसी की निजता को भंग करना एक अपराध तो माना गया है लेकिन स्पष्ट रूप से निजता को लेकर कोई विशेष प्रावधान नहीं है। फोन टैपिंग के लिए बना बहुत पुराना ‘टेलीग्राफ एक्ट 1885’ भी तब तक भारत सरकार को किसी भी टेलीफोन को टैप करने कि स्वतन्त्रता देता रहा जब तक ‘हुकुमचंद बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी नहीं किए। जिसमें न्यायालय ने यह स्पष्ट कहा कि आप किसी भी फोन को तभी टैप कर सकते हैं जब उपयोगकर्ता के कारण ‘भारतवर्ष की एकता और संप्रभुता’ खतरे में हो।

उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न मामलों में यह तय किया है कि एक व्यक्ति को अपनी निजता, परिवार, विवाह, वंशवृद्धि, मातृत्व, पोषण एवं शिक्षा आदि को सुरक्षित और गोपनीय रखने का अधिकार है तथा कोई भी उस व्यक्ति की सहमति के बिना उसके जीवन से संबंधित किसी भी तथ्य का प्रकाशन या व्यापार नहीं कर सकता।

अब भारत में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किये जाने से हर नागरिक के व्यक्तिगत जीवन को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जा सकेगा। हर व्यक्ति की निजता की एक मौलिक अधिकार के रूप में रक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि हर उस व्यक्ति की होनी चाहिए जो स्वयं की निजता के सम्मान की अपेक्षा रखता हो।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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