रजनीकांत की ‘आध्यात्मिक राजनीति’  के व्यावहारिक पेंच

अजय बोकिल

इसे हरफनमौला अभिनेता रजनीकांत का फिल्मी डायलॉग या एक्शन न मानकर, नवो‍दित राजनेता रजनीकांत के चौंकाने वाले सियासी जुमले के रूप में पढ़ा जाए कि वे देश में ‘आध्यात्मिक राजनीति’ करना चाहते हैं। वैसे ‘आध्यात्मिक राजनीति’ न तो नया शब्द है और न ही भारत में रजनीकांत इसे पहली बार आजमाने जा रहे हैं, लेकिन व्यवहार में ये दोनों शब्द जीवन के दो ध्रुव हैं और वर्तमान में भारतीय राजनीति जिस गर्त को छू रही है, उसमें वास्तव में ऐसा कोई प्रयोग दुस्साहस ही कहा जाएगा। इसी के साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि क्या राजनीति में आध्यात्मिकता संभव है?

कहा यह भी जा रहा है कि रजनीकांत के रूप में राष्ट्रवादी शक्तियां हिंदुत्व का तमिल संस्करण ‘आध्यात्मिक राजनीति’ के रूप में लांच करना चाहती हैं। अगर प्रयोग सफल रहा तो इसे दूसरे राज्यों में भी आजमाया जाएगा। चूंकि रजनीकांत एक बेहद लोकप्रिय अभिनेता हैं, इसलिए उनकी बातों और कार्यशैली का असर जनता पर होगा ही। प्रख्यात संगीतकार गायक ए.आर.रहमान ने तो इस नए राजनतिक प्रयोग के पहले ही रजनीकांत की तारीफ कर डाली है। उन्होंने कहा कि ‘आध्यात्मिक राजनीति’ की वकालत करने से तात्पर्य ‘केवल अच्छा’ ही है। क्योंकि तमिल सुपरस्टार रजनीकांत ने बीते साल के अंतिम दिन राजनीति में पदार्पण की घोषणा करते हुए अपने प्रशंसकों से ‘जाति एवं पंथ से परे आध्यात्मिक राजनीति’ करने का वादा किया था।

रजनीकांत का असली नाम शिवाजीराव गायकवाड है। उनकी मातृभाषा मराठी है, लेकिन उनका परिवार काफी पहले बंगलुरू में बस गया था। सो वे कन्नड और तमिल भी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। अभिनेता बनने से पहले उन्होंने आजीविका के लिए काफी पापड़ बेले। वे अभिनय में अपने खास मैनरिज्म के लिए जाने जाते हैं। दस साल पहले उन्होंने एक फिल्म में अभिनय के लिए 26 करोड़ रुपए मेहनताना लेकर पूरी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया था।

रजनीकांत जिस ढंग के किरदार करते रहे हैं, उसमें तर्क की गुंजाइश न के बराबर है। वह शुद्ध रूप से हैरतअंगेज मनोरंजन है। रजनीकांत के जीवन का ‘आध्यात्मिक पक्ष’ इतना है कि उनके एक आध्यात्मिक गुरू भी हैं, जैसे कि अमूमन हर बड़े व्यक्ति के होते हैं। उनका नाम है परमहंस योगानंद। योगानंदजी ने क्रिया योग पर एक किताब लिखी है। बताया जाता है कि रजनीकांत उन्हीं की प्रेरणा से राजनीति में अध्यात्म की पुडि़या लेकर आए हैं।

इसके पहले राजनीति में अध्यात्म के प्रयोग महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में किए थे। उन्होंने राजनीति को आध्यात्मिक मूल्यों पर संचालित करने की कोशिश की थी। इसके बाद राजनीति की गंगा में बहुत सारा पानी, पैसा और नैतिकता बह चुकी है। ऐसे में रजनीकांत किस तरह की ‘आध्यात्मिक राजनीति’ करेंगे, इसे समझना जरूरी है। इसलिए भी कि आजकल आध्यात्मिक बाबा भी सीधे राजनीति करने लगे हैं, ऐसे में रजनीकांत के लिए कितनी गुंजाइश है।

राजनीति में प्रवेश की घोषणा के मंगलाचरण में रजनीकांत ने अपनी आध्यात्मिक राजनीति की व्याख्याक इन शब्दों में की-‘ईमानदार और पंथनिरपेक्ष (या धर्मनिरपेक्ष) राजनीति।‘ और स्पष्ट करें तो ऐसी राजनीति, जो सम्प्रदाय अथवा जातीय आग्रहों से परे हो। मोटे तौर पर राजनीति और अध्यात्म परस्पर विरोधी तत्व हैं। क्योंकि राजनीति का महल राजनीतिक स्वार्थ, सत्ताकांक्षा और समाज पर राज करने की भावना तथा उसके लिए किए जाने वाले उपक्रमों पर खड़ा होता है। जबकि आध्यात्मिकता जीवन को नैतिक मूल्यों पर संचालित करने की आग्रही होती है। मूलत: वह मनुष्य के अंर्तमन अथवा आत्मा से जुड़ी है। उसे मानव समाज पर उसी पवित्र और निरपेक्ष भाव से लागू करना बेहद कठिन कार्य है।

अमेरिकी लेखिका और शिक्षा शास्त्री कोरिन्ने मैकग्‍लालिन ने आध्यात्मिक राजनीति के कुछ मूलभूत तत्व बताए हैं। इसके अनुसार आध्यात्मिक राजनीति ईमानदारी व निष्ठा, अहंकार के त्याग, निष्पक्षता और न्याय में विश्वास, अहिंसा, सहजबुद्धि और आंतरिक दिशानिर्देश में यकीन तथा सर्वोच्च शक्ति, ईश्वर या ब्रह्म में विश्वास पर आधारित होनी चाहिए। अगर भारत के संदर्भ में बात करें तो इनमें शायद ही कोई तत्व राजनीति को प्रेरित करता हो।

अब रजनीकांत जिस तमिलनाडु राज्य में राजनीति करने जा रहे हैं, वह गहरी धार्मिक आस्था और अनास्था की राजनीति में पगा प्रदेश है। और तमिल अस्मिता के कट्टर आग्रहों में लिपटा है। रजनीकांत के ऐलान पर अपनी प्रतिक्रिया में डीएमके नेता एमके स्टालिन के कहा कि ‘तमिलनाडु द्रविड आंदोलन का पालना है। और यह आंदोलन बुद्धिवाद और नास्तिकता की बुनियाद पर ही पनपा है।‘ अर्थात इसमें विशिष्ट धार्मिक आस्थाओं और प्रतीकवाद की कोई खास जगह नहीं है।

ऐसे में सवाल यह है कि रजनीकांत का आध्यात्मिक राजनीतिवाद आखिर है क्या? अगर वे सम्प्रदायवाद और जातिवाद से सौ टका दूर रहेंगे और केवल धर्मनिरपेक्षता की बातें करेंगे तो उनके साथ आएगा कौन? यूं भी धर्मनिरपेक्षता एक अमूर्त शब्द है। सुविधानुसार उसकी कुछ भी व्याख्या की जा सकती है। उधर रजनीकांत भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भी सखा हैं। हो सकता है कि वे धर्मप्रेरित राजनीति को आध्यात्मिक राजनीति की चाशनी में घोल कर पेश करें। क्योंकि ‘अध्यात्म’ शब्द में भी ईश्वर में आस्था तो अंतर्निहित है ही, यह ईश्वर किसी का, किसी भी रूप में और किसी भी पूजा पद्धति से प्रसन्न होने वाला हो सकता है।

जाहिर है कि यह अध्यात्म बहुसंख्यक समाज का ही होगा। यहां दिक्कत यह है कि राजनीति के लक्ष्य और प्रणालियां आध्यात्मिक उद्देश्यों से मेल नहीं खाते। अध्यात्म ‘येन-केन-प्रकारेण’ की वृत्ति को सिरे से खारिज करता है। उल्टे वह धैर्य और शुचिता में भरोसा रखता है। लेकिन सत्ता के विकेट पर इतनी स्लो बॉलिंग किसी काम की नहीं होती। यानी रजनीकांत  जो कह रहे हैं, वह उनके फिल्मी एक्शन जितना विस्मयकारी भले हो, जमीनी सचाई से कोसों दूर है।

सतह के नीचे जो हलचल महसूस हो रही है, उसके मुताबिक रजनीकांत उसी राजनीतिक मिशन के ‘ राजनीतिक बाबा’ हैं, जिन्हें परोक्ष रूप से भगवा क्रांति को आगे बढ़ाना है। चूंकि तमिलनाडु रूपी खेत को अच्छे हलवाहे की जरूरत है तो ये कमी रजनीकांत पूरी कर सकते हैं। क्योंकि वे सांस्कृतिक रूप से तमिल हैं और सामाजिक रूप से गैर तमिल भी हैं। वे अभिनेता तो हैं ही, नेता भी हैं। वे एक्शन और ड्रामे में विवेक को उलझाना जानते हैं। अब वे सियासत में अप्लाई करने जा रहे हैं। देखना यह है कि उनकी इस कला पर तमिल जनता कितनी झूमती है, झूमती है भी या नहीं?

( ‘सुबह सवेरे’ से साभार)

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