पापा की ईमानदारी से ‘नफरत’ !

मयंक मिश्रा

रोज की तरह विवान अपने दोस्तों के साथ खेलकर शाम को छह बजे घर पहुंच गया था। कुछ देर बाद उसके पिता भी घर आ गए। विवान अपने कमरे में होमवर्क करने लगा। तभी डोरबेल बजी। मां ने आवाज लगाई, ‘ विवान जरा देख तो कौन आया है?’ विवान ने दरवाजा खोला तो देखा दो आदमी खड़े हैं। उसने पूछा, ‘ जी, कहिए, आपको किससे मिलना है?’

उनमें से एक ने कहा- ‘बेटा क्या सुभाष वर्मा यहीं रहते हैं? ‘ विवान ने सिर हिलाते हुए मां को आवाज दी- ‘मां पापा से मिलने कोई आया है।’  सुभाष वर्मा ने दरवाजा खोला व दोनों को अंदर बुला लिया। विवान की मां आशा किचन में चली गई। कुछ देर बाद अचानक सुभाष के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनकर विवान व आशा ड्राइंग रूम में आ गए। सुभाष जोर जोर से बोल रहे थे, ‘मैं बिकाऊ नहीं हूं। आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरे घर तक आने की। आप नहीं जानते मुझे। चंद रुपयों से खरीद कर आप मुझसे गलत काम नहीं करवा सकते। तुरंत बाहर निकल जाइये।’ सुभाष बहुत गुस्से में थे। दोनों व्यक्तियों ने उन्हेंआ शांत कराने की कोशिश की, लेकिन, सुभाष का गुस्सा बढ़ता देख वे बाहर निकल गए।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। सुभाष के पास अकसर कई ठेकेदार रिश्वत देने के लिए आते थे। सुभाष पब्लिक वर्क्स  डिपार्टमेंट (पीडब्लूडी) में वरिष्ठ अधिकारी थे और ठेकेदार उन्हें रिश्वत देकर किसी तरह से सरकारी कामों का ठेका मिलने की जुगत भिड़ाते थे। लेकिन, सुभाष में ईमानदारी ऐसी कूट कूट कर भरी थी कि उन्होंने कभी किसी से एक रुपया भी नहीं लिया। रिश्वत लेकर आने वालों को वे इसी तरह डांट कर भगा देते थे। वरिष्ठ अधिकारी होने के बाद भी वे सादगी से जीते थे। साइकिल से ही आफिस आते जाते। ऐसा नहीं था कि कार या स्कूटर खरीदने की हैसियत नहीं थी। लेकिन उन्हें सादगी पसंद थी। वे चाहते थे कि उनकी पत्नी व बेटा भी उनकी तरह ही सादगी से जीवन व्यतीत करें।

विवान आठ साल का हो चुका था, लेकिन अपने पापा से बहुत ज्यादा बातचीत नहीं करता था। जब तक पापा घर नहीं आ जाते, वह काफी चहकता व शरारतें करता था। लेकिन, पापा के आने के बाद गंभीर हो जाता। सुभाष ने कई बार विवान के करीब जाने, उससे बातचीत करने की कोशिश की। लेकिन, पता नहीं क्यों, विवान पापा से न तो मन की बात साझा करता न ही उनसे कभी कुछ कहता। जो कुछ कहना होता वह अपनी मां से कह देता था।

विवान जब भी अपने पापा को उनके घर पैसे लेकर आने वालों को डांटते हुए देखता, उसे पापा पर बहुत गुस्सा आता। लेकिन, चाह कर भी अपना गुस्सा व्यक्त नहीं कर पाता था। शायद यही वजह थी कि वह अंदर ही अंदर पापा को नापसंद करता था और उनसे दूरी बनाकर रखता था। उसे लगता था कि अगर उसके पापा ये पैसे ले लेते तो वह भी कार व घर से लेकर कई सारी चीजें खरीद लेते। उसे यह नहीं मालूम था कि लोग उसके पापा के पास पैसे क्यों लेकर आते हैं? उसे रिश्वमत का मतलब भी मालूम नहीं था। न ही यह पता था कि ईमानदारी क्या होती है। लेकिन, उसे हर बार यही लगता कि उसके पापा ने पैसे न लेकर ठीक नहीं किया। क्योंकि उसने जब भी मां से पूछा था कि पापा कार क्यों नहीं खरीदते हैं, तो यही जवाब मिलता था कि कार खरीदने के लिए बहुत सारे पैसे चाहिए जो कि हमारे पास नहीं हैं।

विवान के दोस्तों के पास कार थी। अकसर उसके दोस्त अपने पापा की कार में स्कूल आते। विवान को तो दोस्तों को यह बताने में भी शर्म आती थी कि उसके पापा साइकिल पर ऑफिस जाते हैं। उसके सभी दोस्तों के घरों में सुख सुविधा की हर चीज थी। लेकिन, विवान जब अपना घर देखता तो उसे लगता कि उसके घर में कुछ भी नहीं है। इसी कारण वह दोस्तों को घर भी नहीं बुलाता था। उसकी उम्र यह समझने के लिए बहुत कम थी कि लोग उसके पापा को पैसे देने क्यों आते हैं और वह उन्हें क्यों डांटते हैं? उसे तो बस यही लगता था कि अगर पापा पैसे ले लेते तो उनके घर भी उसके दोस्तों के घरों की तरह कार, एसी जैसी चीजें आ जातीं।

विवान जैसे जैसे बड़ा हो रहा था वैसे वैसे उसकी पापा के प्रति नफरत भी बढ़ती जा रही थी। बड़ा होने पर उसे यह तो समझ आ गया कि उसके पापा रिश्वत नहीं लेते हैं। लेकिन, वह अपने पापा की ईमानदारी से नफरत करता था। उससे लगता था आज के समय में ईमानदार होना सिर्फ ढकोसला है। उसने जब कॉलेज में दाखिला लिया तो उसके सभी दोस्त बाइक पर आते थे। लेकिन, उसे लोकल बस से कालेज जाना पड़ता था। उसने कई बार मां के जरिए से पापा से बाइक दिलाने की मांग भी की। लेकिन, सुभाष नहीं माने। उन्होंने साफ कह दिया कि कालेज में और भी बहुत से छात्र छात्राएं रोज लोकल बस से आते जाते हैं, तो विवान को क्या दिक्कत है?

इसके बाद से विवान ने पापा से बातचीत ही बंद कर दी। उसने ठान लिया था कि वह खुद जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होगा। उसने ग्रेजुएशन के बाद ही नौकरी की तलाश शुरू कर दी। मां ने कई बार समझाया कि वह पहले पढ़ाई पूरी कर ले। पापा भी यही चाहते थे। लेकिन विवान की तो जिद थी कि वह पैसे कमाकर अपने लिए बाइक खरीदेगा। कुछ दिनों बाद ही उसे कॉल सेंटर में 12 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी मिल गई। वहां पूरी रात काम करना पड़ता था। छह महीने नौकरी कर उसने लगभग 35 हजार रुपये बचा लिए। उसे लगा कि वह थोड़ी बहुत डाउनपेमेंट कर किश्तों में बाइक ले लेगा। लेकिन, उसे किश्तों में बाइक देने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ क्योंकि उसका वेतन इतना नहीं था जिससे कि उसे लोन मिल पाता।

विवान ने तय किया कि वह और पैसे बचाकर अगले छह महीने में बाइक खरीद लेगा। लेकिन, पूरी रात कॉल सेंटर में काम करने के कारण वह अकसर बीमार रहने लगा। इस कारण उसे बार बार छुट्टी लेनी पड़ती। जब छुटिटयां बढ़ती गई तो कंपनी ने उसे निकाल दिया। नौकरी जाने के बाद जो पैसे उसने बाइक के लिए बचाए थे वह भी खर्च होते गए। विवान को लग गया कि वह बाइक नहीं खरीद पाएगा। उसने तय किया कि वह पढ़ाई पूरी करने के बाद ही नौकरी करेगा। उसने पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिला लिया।

विवान के पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान ही सुभाष रिटायर हो गए। कुछ महीनों बाद सुभाष को दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी मौत हो गई। अब विवान पर घर की पूरी जिम्मेदारी आ गई। उसे पिता को खोने का जरा भी गम नहीं था। उसे हमेशा यही लगता रहा कि पापा ने उसके लिए कुछ नहीं किया। अपने उसूलों के कारण उन्होंने पिता का फर्ज पूरा नहीं किया। उच्च अधिकारी होने के बाद भी पिता ने उसे हमेशा सुख सुविधा से वंचित रखा।

लगभग दो महीने बाद वह अपनी मां के साथ उन सभी बैंकों में खाते बंद करवाने गया जहां जहां सुभाष के खाते थे। उसे लग रहा था कि खातों में ज्यादा पैसे नहीं होंगे। पापा ने हर जगह मां को ही नॉमिनी बनाया होगा। लेकिन, पहले ही बैंक में उसे बताया गया कि पिता ने उसे ही नॉमिनी बनाया है और उसके नाम से दस लाख रुपये की एफडी भी करवाई है। तीन बैंक खातों में से सिर्फ एक में ही उसकी मां नॉमिनी थीं। विवान तब और हैरान हो गया जब उसे पता चला कि उसके पापा के हर खाते में 8 लाख से अधिक जमा हैं। यह सुभाष की ईमानदारी की कमाई थी जो उन्होंने बचाई थी व रिटायरमेंट के बाद मिला पैसा था। नॉमिनी होने के कारण विवान को सुभाष के लाखों रुपये मिल गए। लेकिन, उसने ठान लिया कि वह पापा के पैसों को हाथ नहीं लगाएगा।

पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद विवान ने नौकरी तलाशी, कई जगह इंटरव्यू दिए। नौकरी खोजते खोजते थक गया। एक दिन प्राइवेट कंपनी से इंटरव्यू कॉल आया। वह बहुत बेमन से इंटरव्यू देने गया। एमडी के कक्ष में उसका बायोडाटा पहले से ही टेबल पर रखा था। पहला ही सवाल हुआ- ‘क्या तुम उन्‍हीं सुभाष वर्मा जी के बेटे हो जो पीडब्यूडी में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर थे?’ विवान ने ‘हां’ में सिर हिला दिया। उसे लग गया कि कंपनी के एमडी भी कभी उसके पिता की डांट के शिकार हुए होंगे। इसलिए उनके बारे में पूछ रहे हैं। कुछ देर खामोश रहने के बाद वे बोले, ‘बहुत दुख हुआ यह जानकर कि उनका निधन हो गया है। भगवान अच्छे लोगों को अपने पास जल्दी बुला लेता है। मिस्टर विवान आप धन्य हैं कि आप ऐसे व्यक्ति के बेटे हैं जिसने ईमानदारी की मिसाल पेश की थी। मेरे भाई की कंस्ट्रक्शन कंपनी है। उसके साथ मैं कई बार उनके पास गया था। आज के समय में जब हर आदमी छोटे से छोटा काम बिना पैसे लिए नहीं करता है, उन्होंने कभी भी एक रुपया नहीं लिया। ईमानदारी से सब काम किए। ऐसे लोग मिलते ही कहां हैं आजकल। मैं तो उनका बहुत बड़ा फैन हूं। हर जगह उनकी मिसाल देता हूं। मुझे यकीन है आप में भी उनके जैसे संस्कार होंगे। हम आपको अपनी कंपनी से जोड़कर गर्व महसूस कर रहे हैं। कांग्रेट्स मिस्टर विवान। यू मे ज्वाइन फ्राम नेक्सट वीक।’ विवान यह सुनकर अवाक् रह गया। उसने धन्यवाद किया। लेकिन नौकरी मिलने के बाद भी वह खुश नहीं था। उसके कानों में एमडी के वे शब्द ही गूंज रहे थे जो उन्होंने उसके पिता के बारे में कहे थे।

घर पहुंचा तो मां ने पूछा,  ‘बेटा इंटरव्यू कैसा हुआ?’ काफी देर तक विवान ने जवाब नहीं दिया। मां ने फिर पूछा, ‘ तू बोलता क्यों नहीं विवान। कोई उम्मीद है कि नहीं?’ विवान गुमसुम सा बैठा रहा और फिर अचानक फूट फूट कर रोने लगा। मां के गले लग कर बोला, ‘मां मैंने हमेशा पापा को गलत समझा। मुझे यही लगता रहा कि पापा ने मेरे लिए कुछ नहीं किया। जब वे लोगों से पैसे नहीं लेते थे तो मुझे उन पर गु्स्सा आता था। पर आज मुझे पता चला कि पापा ने ईमानदारी की मिसाल पेश की थी। मैंने उनकी ईमानदारी से हमेशा नफरत की। सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए। आज वे नहीं हैं लेकिन लोग उन्हें अभी भी याद करते हैं। मां प्लीज पापा को एक बार वापस बुला दो। मैं उनसे माफी मांगना चाहता हूं। जब वह मेरे पास थे, मैंने कभी उनके महत्व को नहीं समझा। हमेशा उनसे दूर दूर रहा। मुझे आज अपने आप से नफरत हो रही है।‘’

मां ने उसे समझाया और कहा ‘बेटा तेरे पापा आज जहां भी हैं वे तुझे देख रहे हैं। वे आज बेहद खुश होंगे। वे हमेशा यही चाहते थे कि तू भी जिंदगी में ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए सादगी से जीवन बिताए। जीतेजी तुझे समझा नहीं सके, आज तुझे खुद ही समझ आ गया कि ईमानदारी से कमाए हुए पैसों का क्या महत्व होता है। बेटा तू परेशान मत हो। तेरे पापा की ईमानदारी की कमाई की एक एक ईंट से यह घर बना है और घर के हर कोने में बसी उनकी यादें तुझे हमेशा जीवन में उनके रास्ते पर चलने की सीख देती रहेंगी।’

मां विवान को समझा कर किचन में चली गईं। और विवान काफी देर तक यही सोचता रहा कि अगर उसे पहले ही पापा की ईमानदारी का महत्व समझ आ जाता तो उसे आज इस तरह से पछताना नहीं पड़ता।

 

 

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