गुरुवार को यदि ‘बुधवार, शुभवार’ का संदेश आए तो…

यूं तो वाट्सएप पर रोज हजारों की संख्‍या में संदेश आते हैं और ज्‍यादातर संदेशों की हम अनदेखी कर देते हैं। ऐसा इसलिए क्‍योंकि संदेशों की दुनिया उपग्रहों की तरह है जो अपने परिक्रमा पथ पर घूमते घूमते एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप पर और एक मित्र से दूसरे मित्र तक टल्‍ले खाते रहते हैं। एक ही संदेश कई कई बार पढ़कर जो झुंझलाहट होती है उसका अहसास उसका भुक्‍तभोगी ही जान सकता है।

शायद इसीलिए, जुनूनी लोगों को छोड़ दें तो, ज्‍यादातर लोग अब वाट्सएप जैसे ग्रुप पर होने के बावजूद थोड़ी थोड़ी देर में होने वाली टन्‍न टन्‍न पर ध्‍यान ही नहीं देते। वाट्सएप ने इस झुनझुने की झुनझुनाहट से निजात पाने के लिए एक बहुत अच्‍छा फीचर दे दिया है और उसका उपयोग करते हुए मेरे जैसे कई गैर लती वाट्सएपियों ने ज्‍यादातर ग्रुप और संदेशवीरों को मूक कर दिया है।

लेकिन दो दिन पहले इसी चक्‍कर में एक ऐसा संदेश देख कर भी अनदेखा हो गया जिस पर ध्‍यान जाना चाहिए था। उस पर ध्‍यान उस समय गया, जब उसे भेजने वाले मेरे एक पुराने सहयोगी ने उसकी पूरी कथा सुनाई। दरअसल नवदुनिया में मेरे साथ काम कर चुके इटारसी के संवाददाता भारतभूषण गांधी ने गुरुवार के दिन एक संदेश भेजा था, जिसमें लिखा था-‘’बुधवार शुभवार’’। जैसाकि बाकी लोगों ने किया होगा, मैंने भी संदेश देखा और उसे यह सोचते हुए अनदेखा कर दिया कि गांधी जी को दिन याद नहीं रहा होगा, लिहाजा इस संदेश का जवाब क्‍या देना…

लेकिन देर रात भारतभूषण जी ने उस संदेश के पीछे की कहानी का खुलासा करते हुए एक और संदेश भेजा। वैसे तो वह संदेश काफी लंबा है, मैं संपादित रूप में सिर्फ उसका लब्‍बोलुआब आपको बताना चाहूंगा। उन्‍होंने कहा-

‘’कल गुरुवार था, मैंने हर दिन की तरह अपने निकटतम लोगों एवं वाट्सएप ग्रुपों में सुप्रभात का सन्देश पोस्ट किया। इस संदेश में अलग बात ये थी की मैंने गुरुवार की सुबह के सन्देश में लिखा ‘बुधवार, शुभवार’…

उन्‍होंने आगे पूछा कि क्‍या आप नहीं जानना चाहेंगे कि इस संदेश के जवाब मुझे क्‍या मिले? फिर खुद ही जवाब देते हुए बताया कि करीब 5-6 सौ मित्रों की सूची में से ज्‍यादातर लोगों ने कोई जवाब ही नहीं दिया। संदेश देखा/पढ़ा और आगे बढ़ गए। कुछ लोगों ने मेरे संदेश के जवाब में बिना देखे अपने कुछ सन्देशों की कॉपी मुझे पोस्ट कर दी। कुछ ने बिना देखे जवाब में धन्‍यवाद लिख दिया। गिने चुने लोगों ने ही मुझे याद दिलाया कि आज बुधवार नहीं गुरुवार है गाँधी जी।

‘’धन्‍यवाद लिखने वाले दो लोग वे थे जिनसे मैं हाल ही में मिला था और चूंकि मैं उन्‍हें याद था इसलिए उन्‍होंने बिना मेरे संदेश में और कुछ देखे, मुझे जवाब दे दिया…। जिन लोगों ने मेरा ध्‍यान गलत दिन का उल्‍लेख करने की ओर दिलाया वे दरअसल मेरे शुभचिंतक थे, जो चाहते थे कि मैं आगे से ऐसी गलती न करूं। लेकिन ज्‍यादातर लोगों को न तो संदेश के मजमून से कोई मतलब था और न ही उसमें हुई गलती से…’’

भारतभूषण जी ने अपने संदेश में और भी बहुत सारी बातें और भावनाएं व्‍यक्‍त की हैं, लेकिन संचार का विद्यार्थी होने के नाते मैं इस पूरे प्रसंग में अपने पाठकों का ध्‍यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि संचार के जिन संसाधनों को हम दीवानावार इस्‍तेमाल करते हैं, उनके प्रति हमारा लगाव कितना सतही है। हम अपने आसपास रोज ऐसे दर्जनों लोग देखते हैं जो वाट्सएप या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया माध्‍यमों पर पिले रहते हैं। जरा सी टन्‍न की आवाज हुई नहीं कि हम ताबड़तोड़ अपने मोबाइल के सारे वाट्सएप ग्रुपों को खंगाल डालते हैं…

लेकिन क्‍या सचमुच ये संदेश या उन्‍हें भेजने वाले लोग हमारे जीवन में कोई अहमियत रखते हैं? असलियत तो यह है कि इन माध्‍यमों ने हमारे अवचेतन को भी गुलाम बना लिया है और जरा सी आवाज भर होने पर हम एक मशीन की तरह हरकत में आते हैं। आनन फानन में हमारी आंखें मोबाइल स्‍क्रीन पर गड़ जाती हैं… कहने को हम भले ही संदेश देख रहे होते हैं, लेकिन वे संदेश हमारी आंखों के सामने होते हैं सिर्फ और सिर्फ काले धब्‍बों की तरह। या तो हम यंत्रवत उन्‍हें स्‍क्रोल करते हुए आगे बढ़ जाते हैं या फिर बिना देखे, पढ़े या समझे इमोजीस में से कोई चेहरा चुनकर या कोई और इमेज चुनकर हम जवाब भेजने के दायित्‍व से मुक्‍त होने का संतोष पा लेते हैं।

दरअसल संदेशों को देखने और उन पर सर्वाधिक अटेंशन देने का ढोंग सा रचते हुए, जिस काम में हम अपना ढेर सारा समय खपाते हैं, वो काम वास्‍तव में हम कर ही नहीं रहे होते… इसीलिए हम मृत्‍यु के संदेशों को भी लाइक कर देते हैं और उठावने के वाट्सएप संदेश पर सेम टू यू या मेरी शुभकामनाएं स्‍वीकारें जैसा कोई संदेश भेज डालते हैं…

सवाल ये, कि ऐसी दीवानगी, ऐसी अफरातफरी आखिर किसलिए?

और गुजारिश ये कि गुरुवार के दिन यदि शुभ बुधवार का संदेश आ जाए, तो भेजने वाले को उसकी गलती का अहसास दिला दीजिए… गलतियां तो गलतियां हैं, किसी से भी हो सकती हैं…

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