पद्मावती के विरोध में खिलजी का महिमामंडन न करें

‘पद्मावती’ के रिलीज के खिलाफ हर तरह के उत्पात की धमकी देने वाली करणी सेना की जितनी भी लानत-मलामत की जाए कम है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सदियों से करोड़ों लोगों के जेहन में बसी नायिका पद्मावती के किस्सों की अश्‍लील व्याख्या होने लगे। खिलजी को देश का हितसाधक सुल्तान घोषित किया जाने लगे। सोशल मीडिया पर मुद्दे को पद्मावती VS खिलजी बनते देखकर ताज्जुब हो रहा है। करणी सेना की गुंडागर्दी का विरोध करते-करते खिलजी, गोरी, गजनी या बाबर का महिमामंडन नहीं किया जा सकता है। उन्हें हमारे देश का इकबाल बुलंद करने वाले सुल्तानों और बादशाहों के तौर पर देखना इतिहास को अपने कौमी चश्मे से देखने की तरह है।

खिलजी, गोरी, गजनी, बाबर। ये सब आक्रांता थे। हमारे इतिहास में हमारी सरहदें लांघकर दाखिल हुए थे। इनमें चंगेज और तैमूर लंग के वंशज भी थे और इस देश की बहुसंख्यक आबादी को नतमस्तक करने के इरादे से आए तमाम मुस्लिम आक्रांता भी। कोई लूटकर चला गया। कोई शासक बनकर रह गया। कोई सुल्तान का गुलाम बनकर आया और तख्तोताज पर बैठकर हुक्मरान बन गया। अपने धर्म का विस्तार करता रहा। दूसरों पर अत्याचार करता रहा। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे आक्रांताओं के कारनामों से। समझदारी इसी में है कि करणी सेना पर चोट करते-करते पद्मावती के मिथकों की अश्लील व्याख्या न करें। मिथक हमारी परंपराओं का हिस्सा हैं।

राम की कहानियां हों या कृष्ण की, इनके गढ़ने में भी मिथकों की भूमिका है। जिनके ये अराध्य हैं, उन्हें हक है अपने अराध्य के मान-सम्मान की हिफाजत करने का। अगर कोई समाज सैकड़ों साल से किसी पद्मावती को नायिका मानता है तो उसे मानने का हक है। वैसे ही जैसे किसी फिल्मकार को पद्मावती के मिथकों, किस्सों और इतिहास में उसकी लिखित-अलिखित कहानियों पर फिल्म बनाने का।

सवाल यहां सिर्फ करणी सेना के विरोध, बवाल और उत्पात का है। उन्हें कोई हक नहीं कि सेंसर बोर्ड और सरकार के रहते यूं दीपिक पादुकोण की नाक काटने और संजय लीला भंसाली के सिर काटने की धमकी दें। देश भर में हंगामें करें। ऐसे जैसे उनके सामने किसी की कोई औकात न हो। मेरा साफ मानना है कि सेंसर बोर्ड फिल्म देखे और अपना फैसला करे। जिसे उस फैसले का विरोध करना हो, वो कानूनी तरीकों का इस्तेमाल करे, न कि देश भर में तांडव करने की धमकी दे।

ये तो हुआ एक पक्ष, अब दूसरे पक्ष की बात। कई दिनों से कुछ लोग सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को हिन्दू पद्मावती VS मुस्लिम खिलजी का रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों तरफ ऐसे लोग हैं। एक पक्ष पद्मावती के प्रसंग की अश्लील व्याख्या की हदें पार कर रहा है तो दूसरा पक्ष मुस्लिम बादशाहों और सुल्तानों की बहन-बेटियों से हिन्दू राजाओं-राजकुमारों के अश्लील किस्सों पर फिल्म बनाने की मांग कर रहा है। तलवारें दोनों तरफ से खिचीं हैं। एक ने खिलजी को अपना लिया है तो दूसरे ने पद्मावती को।

दोनों के लिए मैं तो यही कहूंगा कि आक्रांतों को महान साबित करने का खेल शुरु न करें। इतिहास का बदला हम वर्तमान से न लें। बाबर का बदला जुम्मन से न लें। मुगलों के दौर में देश में कुछ अच्छे काम भी हुए, ये भी इतिहास का हिस्सा हैं, वैसे ही जैसे सैकड़ों मंदिरों को तोड़ा गया। लाखों हिन्दुओं को मारा गया, इस तथ्य से इंकार करना आंखें बंद करके अपनी मर्जी का बाइसकोप देखने की तरह है। उन पचड़ों में पड़ने की बजाय मुद्दों पर बात हो।

साठ साल पहले रामधारी सिंह ने दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय में जो लिखा वो याद आ रहा है-“ हिन्दुओं की कठिनाई यह है कि इस्लाम का अत्याचार उन्हें भुलाए नहीं भूलता और मुसलमान यह सोचकर पस्त हैं कि जिस देश पर उनकी कभी हुकूमत चलती थी, उसी देश में उन्हें अल्पसंख्यक बनकर जीना पड़ रहा है। ऐसे तरीके तो प्रत्येक शासन पद्धति में पाए जा सकते हैं, जिससे अल्पसंख्यकों की हर जायज शिकायत दूर की जा सके किन्तु यह तभी संभव है जब अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय एक-दूसरे का विश्वास करें।“

उन्होंने ही आगे लिखा है- ‘’जब तक हम इतिहास के दग्ध अंश को नहीं भूलते, हम मुसलमानों को सहज दृष्टि से देखने में असमर्थ रहेंगे। गजनवी, गोरी, औरंगजेब और जिन्ना के भूत जब तक जीते रहेंगे, हिन्दुओं का हृदय साफ नहीं होगा। गजनवी, गोरी, औरंगजेब और जिन्ना ही नहीं, अकबर, दाराशिकोह, बहादुरशाह, अजमल खां, अनसारी और आजाद भी मुसलमान ही थे।”

कहने का आशय ये है कि पूरे विवाद को पद्मावती और खिलजी के पक्ष या विपक्ष में ध्रुवीकरण की तरफ मोड़ने से उस ताने-बाने का और नुकसान ही होगा, जिसमें पहले ही सैकड़ों छेद मौजूद हैं। विवाद फिल्मकार की स्वतंत्रता और करणी सेना की लंपटता तक रहे तो ठीक है, इससे आगे जाएंगे तो हासिल कुछ नहीं होगा, खाई ही खाई मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में कलाकारों-फिल्मकारों की हिमायत करते हुए कह दिया है कि उनकी आजादी पर रोक नहीं होनी चाहिए। केजरीवाल पर बनी फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए दायर याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक लाइन भी खींच दी है। लाठी-डंडे के जोर पर कई दिनों से सिलसिलेवार धमकियां दे रहे सड़कछाप शोहदों के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश एक चेतावनी की तरह आया है। हमें देश के कानून पर भरोसा करने की जरुरत है, न कि करणी सेना की तरह सोशल मीडिया को जंग का मैदान बनाने की।

(वरिष्‍ठ पत्रकार अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से साभार)  

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