क्‍या जन और प्रतिनिधि के बीच सिर्फ पैसे का रिश्‍ता है?

खबर आई है कि मध्‍यप्रदेश विधानसभा के सिर्फ पांच दिन चले शीतकालीन सत्र के दौरान कार्यवाही में शामिल न होने पर 60 विधायक ‘नो वर्क, नो पे’ के दायरे में आ गए हैं।

चाहे विधानसभा हो या संसद, यह बात जन प्रतिनिधियों में अब रूटीन सी हो गई है कि सदन में जाओ या न जाओ क्‍या फर्क पड़ता है। जनता की आवाज को मुखर करने वाली ये संस्‍थाएं इस मायने में निरर्थक सी होती जा रही हैं। अव्‍वल तो प्रतिनिधि सदन में आने से ही कतराते हैं और यदि आ भी जाएं तो सदन सार्थक कामकाज करने के बजाय शोरगुल, नारेबाजी, हंगामे आदि में ही डूबा रहता है। हाल ही में संपन्‍न संसद के शीतकालीन सत्र में यह नजारा पूरा देश देख चुका है। विडंबना देखिए कि वहां एक दूसरे को बोलने न देने के सारे जतन करने वाले सांसदों ने आरोप यह लगाया कि उन्‍हें सदन में बालने नहीं दिया जा रहा। ऐसा आरोप लगाने वालों में कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी भी थे तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी।

मध्‍यप्रदेश विधानसभा में जो स्थिति पैदा हुई है वह भी नई नहीं है। अव्‍वल तो शीतकालीन सत्र ही सिर्फ पांच दिन के लिए बुलाया गया था। पूरे विधायक उसमें भी नहीं पहुंचे। जब भी संसद या विधानसभाओं में हंगामे के कारण कार्यवाही बाधित होती है या फिर सांसद या विधायक सदन से गायब रहते हैं तो बात उठती है कि जब वे अपना काम ही नहीं कर रहे तो उन्‍हें वेतन और भत्‍ता किस बात का दिया जाए। सारी बहस जन प्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं और इन सदनों की एक मिनिट की कार्यवाही पर खर्च होने वाली राशि के गणित पर केंद्रित हो जाती है।

लेकिन क्‍या जन प्रतिनिधि और जनता के रिश्‍तों की डोर सिर्फ पैसे, वेतन, भत्‍ते या सुविधाओं से ही बंधी है। क्‍या इसके अलावा उनका कोई रिश्‍ता नहीं है? सदन में न आने वाले या हंगामा करने वाले जन प्रतिनिधियों के आप भले ही सारे वेतन, भत्‍ते या सुविधाएं छीन लीजिए, लेकिन इससे उस जनता का क्‍या भला होने वाला है जिसने उन्‍हें चुनकर, अपना प्रतिनिधि बनाकर सदन में भेजा है। सदन में न जाने वाले और वहां हंगामा करने वाले प्रतिनिधियों को ज्‍यादा बड़ा गुनाह यह है कि वे जनता के नुमाइंदे होकर जनता की आवाज को उसी मंच पर कुचल रहे हैं जो लोकतंत्र में जनता की आवाज मुखर करने की सर्वोच्‍च संस्‍थाएं हैं।

विधानसभा अध्‍यक्षों व उपाध्‍यक्षों के गोवा सम्‍मेलन में यह तय हुआ था कि छोटे सदनों में साल भर में कम से कम 40 और बड़े राज्‍यों के सदनों में न्‍यूनतम 70 बैठकें होनी चाहिए। लेकिन मध्‍यप्रदेश में वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान जनवरी 2014 से जुलाई 2016 तक तीन सालों में सिर्फ 82 बैठकें ही हुई हैं। यानी एक साल में औसतन 30 से भी कम।

ससंद और विधानसभा में बैठकों के लगातार कम होने और सदन में सांसदों एवं विधायकों की उपस्थ्‍िाति को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्‍स (एडीआर) की मध्‍यप्रदेश इकाई ने हाल ही में जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ‘’संविधान के अनुच्‍छेद 190(4) के अनुसार कोई सदस्‍य यदि साल भर में 60 दिन सदन में उपस्थित नहीं होता तो सदन उसकी सदस्‍यता समाप्‍त कर उसका स्‍थान रिक्‍त घोषित कर देगा।‘’ लेकिन मध्‍यप्रदेश में तो साल भर में 60 बैठकें ही नहीं हो रहीं। यानी पूरा सदन ही संविधान की इस व्‍यवस्‍था के विरुद्ध चल रहा है।

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