मर्द को भी दर्द होता है…

आशुतोष नाडकर

परदे पर अमितावच्चन (अमिताभ बच्चन) को गुंडों की पिटाई करते देखना मुझे हमेशा से बहुत भाता था.. शायद मैं 12 साल का था जब मनमोहन देसाई की ‘मर्द’ फिल्म में प्रभु अमिताभ बच्चन के श्रीमुख से ये सुना कि “मर्द को दर्द नहीं होता”.. इसे अमिताभ की अदाकारी का कमाल कहें या फिर मेरी बाल सुलभ मूर्खता,  मैंने भी मान लिया की मर्द को दर्द नहीं होता.. स्कूल में जब मास्साब खड़ी स्केल से मेरी पिटाई करते था तो मैं इसी डायलॉग को मंत्र मानकर दर्द की अनदेखी करता रहा.. मास्साब ने इसे उनकी ‘मारक क्षमता’ पर चुनौती मान लिया.. अब मैं अदना सा छात्र मास्टर के संकल्प के आगे क्या खाक ठहर पाता.. उनकी स्केल ने मेरे कूल्हे का रंग लाल कर दिया और मैं ‘टें’ बोल गया.. यानी मेरे मुँह से चीख निकल ही गई.. मास्टर की पिटाई और परीक्षा में फेल होने से ज्यादा मुझे दुख इस बात का था कि मर्द को दर्द आखिर क्यों हुआ..?

फिर मैंने सोचा कि मैं अभी बच्चा हूँ.. शायद वयस्क मर्द होने पर शायद इस दर्द से पार पा लूँ.. लेकिन जोडों के दर्द से जूझते दादाजी को देखकर मेरी ये गलतफहमी भी दूर हो गई.. हाँ पिताजी को कभी किसी दर्द की शिकायत करते नहीं सुना था, सो मैं ये मानने लगा था कि इंदर राज आनंद (फिल्म के डायलॉग राइटर) की ये सूक्ति जवां मर्दों पर लागू होती होंगी.. पर पिताजी के अपेन्डिक्स पेन ने एक दिन घर में ऐसा कोहराम मचाया कि इंदर राज आनंद का झूठ मेरे सामने बेनकाब हो गया..

तो जनाब ये बात तो साफ हो गई कि मर्द को भी दर्द होता है.. तो फिर सवाल ये है कि आनंद साहब ने ये संवाद लिखा किस आधार पर.. और लिखा तो लिखा ये संवाद इतना पॉपुलर कैसे हुआ..?क्या इस डायलॉग पर तालियाँ पीटने और सिक्के उछालने वालों को दर्द नहीं होता.. मुझे लगता है कि दर्द तो जरूर होता है, लेकिन हमारी समाजिक व्यवस्था ये अपेक्षा करती है कि मर्द को दर्द नहीं होना चाहिए.. और इसी प्रवृत्ति ने इस डायलॉग को जन्म दिया..

मर्द चाहे 5 साल का बच्चा ही क्यों न हो उससे दर्द न होने की अपेक्षा बचपन से की जाती है.. जब में चौथी क्लास में एक बार सितोलिया खेलते हुए अपनी कोहनियाँ और घुटने छिलवा बैठा.. रोते हुए घर पहुँचा तो चाचा ने डाँटते हुए कहा- “क्या लडकियों की तरह टेसुए बहा रहा है..?” अब चचा का ये कथन कितना महिला विरोधी है ये तो नारीवादी जानें लेकिन चचा के ताने ने मेरे जैसे बच्चे की मर्दानगी को भी झकझोर कर कुछ देर के लिये तो जगा ही दिया था.. घुटने छिलने का दर्द तो मैं जैसे-तैसे झेल गया लेकिन जैसे-जैसे बडा होता गया ये सवाल बार-बार सामने आने लगा कि क्या रोने का हक केवल जनाना है..? रोने से मर्दानगी कम हो जाती है..?  भई महिला और पुरुष दोनों ही ऊपरवाले के बनाये हाड-माँस के पुतले हैं .. तो फिर चोट लगने पर मर्द को रोने का हक क्यों न हो..?फिल्म में  इमोशनल सीन पर औरतें चाहें रो-रोकर कई रुमाल गीले कर डालें.. मर्द के लिये आँखे भर आना भी शर्मनाक क्यों है.?. मानो आँसू गिरने का तात्लुक सीधे पौरुष क्षमता में कमी से हो.. और ज्यादा आंसू बह गए तो मर्द को सीधे डॉ. शाहनी की शरण लेनी पडेगी.. (जारी)

कल पढि़ए इस ‘आत्‍मकथन’ का दूसरा भाग…

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