चेले को फिट होने लगे बाबा जी के मुखौटे

रमेश रंजन त्रिपाठी

‘देख सरला, ये अपने बाबाजी तो नहीं लग रहे।’ दक्षा ने भक्तों के दर्शन के लिए रखे गए बाबा जी की पार्थिव देह की और आँखों से इशारा किया। सरला ने ध्यान से देखा तो उसे भी भ्रम हो गया- ‘तेरी बात ठीक लग रही है। चल उनके शिष्य से शिकायत करते हैं।’
दोनों सहेलियों ने चेले को अपनी शंका बताई- ‘यह चेहरा बाबा जी का नहीं लग रहा। हमने सालों उनकी पूजा की है। उनकी सूरत को भी नहीं पहचानेंगे क्या ? सच्ची बात बताओ वरना हम पुलिस में शिकायत कर देंगे।’
चेला समझ गया कि दोनों महिलाएँ आसानी से नहीं मानेंगी। वह फुसफुसाते हुए बोला- ‘आप मेरे साथ आइए। मैं सब समझाता हूँ।’ चेले ने दोनों सहेलियों को बाबा जी के निजी कक्ष में ले जाकर एक अटेची थमा दी- ‘इसे खोलिए।’
दोनों औरतों को कुछ समझ में नहीं आया लेकिन उन्होंने अटेची खोल दी। उनको बड़ा अजीब लगा क्योंकि अटेची में कुछ मास्क रखे थे। ‘क्या हरकत है यह ?’ सरला बोली।
‘इसमें कुछ मुखौटे रखे हुए हैं जिनका उपयोग बाबा जी किया करते थे।’ चेला बोला- ‘आप जिस सूरत से परिचित हैं उसका मास्क भी है इसमें।’
‘क्या मतलब है आपका ?’ दीक्षा चिढ़ गई- ‘क्या बाबा जी नकली सूरत के साथ भक्तों को दर्शन देते थे ?’
‘मतलब निकालने का काम आप करें। मैं तो अपने विचार बता रहा हूँ।’ शिष्य के स्वर में रूखापन था- ‘मैं उन्हें सोने के पहले चेहरा साफ करते देखा करता था। धीरे धीरे वे बाहर वाली सूरत के साथ ही बिस्तर पर जाने लगे थे। सो जाने के बाद उनके मुखड़े से कई मुखौटे गिरते देखे हैं मैंने। इन दिनों वे बिना मास्क के अपने कक्ष से बाहर ही नहीं आते थे।’
दोनों सहेलियाँ मुँह बाए सुन रही थीं। चेले ने उनके विस्मित भाव को देखा तो उपदेश देने के मोड में आ गया- ‘देखिए, यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। सभी ऐसा करते हैं। आप भी बेटी, बहन, पत्नी, माँ, भाभी, चाची, सहेली न जाने कितने रूप हर दिन धारण करती हैं। और, बाबा जी के सामने उनकी भक्त भी तो बन जाती थीं !’
अपने ऊपर हो रहे प्रहार से विचलित सरला ने बात बदलने की कोशिश की- ‘इस कमरे को देखकर लगता है कि बाबा जी के साथ कोई और भी रहता था। कौन थे वे लोग ?’
‘एक तो आभा थी जो भक्तों को दर्शन देते समय उनके साथ रहती थी।’ चेला बताने लगा- ‘आभा को सब देखते थे लेकिन कभी शिकायत नहीं की। दूसरा था एक हब्शी जो अकेले में उनके सिर और शरीर की मालिश किया करता था।’
‘इस शीशी में क्या है ?’ सरला अटेची का सामान खंगाल रही थी।
‘यह तो शहद है।’ शिष्य चहका- ‘प्रवचन देने से पहले बाबा जी इससे अपने गले की मालिश किया करते थे। आपको अटेची में सींग, नाखून, दहाड़ने का टेप, हिलती दुम, बकरी की आवाज और न जाने क्या क्या मिल जाएगा !’
‘उस तरफ तिजोरीनुमा कमरे में क्या है ?’ दक्षा के पूछने पर चेला बात को टालते हुए बोला- ‘कुछ खास नहीं। वहाँ लक्ष्मी रहती है। बाबा जी सबसे अधिक उसी का ध्यान रखते थे।’
‘बाबा जी का सबसे प्रिय मुखौटा कौन सा था ?’ सरला फिर मास्क वाली बात पर लौट आई।
‘साधु वाला।’ अनुयायी के चेहरे पर पहली बार मुस्कान की क्षीण रेखा उभरी- ‘उन्हें सबसे ज्यादा इज्जत, दौलत, शोहरत इसी रूप में मिलती थी न ! उन्होंने इसी मास्क के सहारे सब कुछ पाया था इसलिए इसे बहुत सम्हाल कर रखते थे।’
‘जब इस चेहरे ने उन्हें सबकुछ दिया था तो उन्हें दूसरे मुखौटों की क्या जरूरत थी ?’ दक्षा की शंका स्वाभाविक थी।
‘बाबा जी अपने नितांत निजी क्षणों के क्रियाकलाप साधु बनकर नहीं कर सकते थे न !’ चेला फिर अन्यमनस्क होने की कोशिश कर रहा था- ‘स्वाँग भी आत्मा को कभी न कभी कचोटता तो है !’
‘बाबा जी तो सीधे परमात्मा से जुड़े थे, वे अपने भक्तों को भगवत्कृपा दिलाने, सारी तकलीफें दूर करने का दावा करते थे। क्या यह सब स्वाँग था ?’ सरला की आँखें आश्चर्य से फैल गईं थी- ‘क्या सभी साधु ऐसे ही…?’
‘नहीं नहीं। दूसरों की उनके भक्त जानें।मैं तो अपने बाबा जी की बात कर रहा हूँ।’ शिष्य ने लंबी साँस भरी- ‘ज्यादा तो नहीं पर इतना जानता हूँ कि हमारे बाबा जी ने पर्सनालिटी परिवर्तन की सिद्धि प्राप्त कर ली थी। वे परिस्थितियों के मुताबिक अपने रूप को अनायास बदल लेते थे। वे हँसते हँसते क्रोधित हो सकते थे, रोते रोते गाना शुरू कर सकते थे। उनकी करुणा कभी भी वीभत्स मोड में आ सकती थी।’
‘हाँ, तुम ठीक कह रहे हो।’ दक्षा बोली- ‘मैंने भी अपने सिर पर उनके हाथों के स्पर्श की तरंगों में फ्रीक्वेंसी के बदलाव को महसूस किया है। इस विद्रूपता को मैं अपने मन का मैल मानती थी।’
‘हो भी सकता है।’ चेले का स्वर उदासीन था- ‘अब तो आपको तसल्ली हो गई कि पार्थिव देह बाबा जी की ही है ?’
‘हाँ ! इसीलिए हम उनके मुखौटों का कलेक्शन सबको दिखाएँगे !’ दक्षा ने अटेची उठानी चाही तो चेले ने रोक दिया- ‘किसके किसके संदूक खोलेंगी देवी जी ! स्वयं से शुरुआत करें और ऐसे व्यक्ति को ढूँढ कर ले आएँ जिसके पास एक भी मास्क न हो। मैं उसे बाबा जी की अटेची सौंप दूँगा।’
पता नहीं दोनों सहेलियाँ लौटकर अटेची लेने आईं या नहीं ? लेकिन सुनने में आया है कि बाबा जी के मुखौटे चेले को भी फिट होने लगे हैं।

(सुबह सवेरे से साभार)

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