मालवा वालों का नया नारा होगा- बिना नोट, जीवन भोट…

सोमवार को हमने यह कहते हुए अपनी बात खत्‍म की थी कि अगली कड़ी में पढि़ए नोटबंदी से जुड़ी कुछ और यादें… सो उस दिन बात जहां छोड़ी थी, आज वहीं से उसे आगे बढ़ाते हैं, कुछ मालवी टच के साथ…

जिन लोगों को इंदौर का सराफा और वहां की मशहूर चाट याद है, वे चाहे कहीं भी रहें, ठंड के दिनों में उनकी जीभ ‘गराडू’ के लिए जरूर लपलपाती है। गराडू एक खास किस्‍म का कंद है जो मालवा में ठंड के दिनों में तलकर खाया जाता है। जैसे बारिश के दिनों में इंदौर में आपने भुट्टे का ‘कीस’ नहीं खाया तो मानव जीवन व्‍यर्थ गंवाया… उसी तरह ठंड के दिनों में यदि आपने दर्जन दो दर्जन गराडू की प्‍लेटें पेट में नहीं उतारीं तो क्‍या ठंड बीती…

यही बात नोट के साथ है। यदि जेब में दो चार दस करारे नोट न रखें हों तो लगता है अपना अस्तित्‍व ही नहीं है। नोटबंदी के जरिए एक तरह से सरकार लोगों से उनके होने का अहसास ही छीन लेना चाहती है। ठीक वैसे ही जैसे बिना गराडू के ठंड।

कितनी कितनी यादें जुड़ी हैं नोटों से… आपको याद होगा घर के बड़े-बूढ़े कहीं भी जाते थे, तो अपने खीसे में कुछ नोट जरूर रखते। महिलाएं कमर में लटकी पोटली में अपना यह गुप्‍त धन छिपाकर रखती थीं। पोते-पोतियों या नाती-नातिनों को देने के लिए। और बच्‍चे भी इन बड़े बूढ़ों के आने जाने या उनसे मिलने का इंतजार ज्‍यादातर इसी बात के लिए करते थे कि अब जरूर कुछ मिलेगा। बड़ों के पैर छूते वक्‍त पैर पर कम और दादी, नानी, बुआ या मौसी की कमर में लटकी पोटली पर ज्‍यादा ध्‍यान रहता। इधर बच्‍चे ने पैर छुए नहीं कि उधर पोटली में से दुनिया की सबसे छोटी घड़ी (तह) करके रखे गए नोट निकल आते।

पता नहीं अब ये परंपराएं कैसे निभेंगी। इन परंपराओं का हमारे समाज में कितना महत्‍व है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि नोटबंदी के बाद अपना धंधा चमकने से बौराए घूम रहे पेटीएम वालों ने अपने एक विज्ञापन का आधार इसी थीम को बनाया है। उस विज्ञापन में मां अपने बेटे से कहती है कि- सुन बुआ यदि पैसे दे तो मत लेना… मां की बात सुनकर बच्‍चे के मुंह का स्‍वाद कसैला हो जाता है। बाद में बुआ चुपचाप बच्‍चे के मोबाइल पर जैसे ही पांच सौ रुपए ट्रांसफर करती है उसके चेहरे की चमक देखने लायक होती है।

लेकिन जरा सोचिए… देश में कितनी बुआओं, मौसियों, दादियों और नानियों के पास पेटीएम की सुविधा होगी, पेटीएम तो छोडि़ए उन्‍होंने जिंदगी में कभी मोबाइल तक को नहीं छुआ होगा। यदि नोट ही बंद हो गए तो वे भावी पीढ़ी पर अपना प्‍यार कैसे लुटा पाएंगी।

आज भी लोग किसी को पचास या सौ रुपए का इनाम देने में जिस रुतबे का अहसास महसूस करते हैं वह अहसास ये डिजिटल या कैशलेस ट्रांजैक्‍शन सात जनम नहीं दे सकता। याद कीजिए वो जमाना जब अस्‍पताल के प्रसूतिगृह में घर की महिला को ले जाते वक्‍त लोग जेब में नोटों की गड्डी डालना नहीं भूलते थे। उन्‍हें पता था कि ‘कुछ भी’ हो, दाई या नर्स से लेकर वार्ड ब्‍वॉय तक को ‘खुश’ करना ही पड़ेगा। यह बात अलग है कि लड़की हुई तो बख्‍शीश दो या पांच रुपए की होती और लड़का हुआ तो दस, पचास या सौ तक…

मुझे याद है बचपन में कभी कभार पांच या अधिकतम दस पैसे का जेब खर्च मिलने के बाद जब पहली बार एक रूपये के नोट को छूने का मौका मिला था तो उसका अहसास ही अलग था। नौकरी लगने के बाद जेब में पड़े दो चार सौ के नोट अलग ही आश्‍वस्ति देते हुए लगते थे। किसी भी संकट से जूझ लेने की आश्‍वस्ति। अब वो आश्‍वस्ति प्‍लास्टिक के टुकड़े में मिलने से तो रही। कैसा होगा वो जमाना जब इस आश्‍वस्ति के बिना जीना पड़ेगा। यह तो वैसी ही बात हुई जैसे बिना सेंव या ऊसल के कोई पोहे खाने को दे दे।

क्‍या आप बिना सेंव या ऊसल के पोहे खा सकेंगे, या बिना कांदा या केरी के सेंव परमल का मजा ले सकेंगे… और यदि ऐसा हो तो क्‍या आपके मुंह से यह नहीं निकलेगा कि साली जिंदगी ही भोट है…

इसीलिए मैंने कहा कि नोटबंदी के विरोध में मालवा वालों का नया नारा होगा- बिना नोट,जीवन भोट…

(मालवी बोली में भोट का अर्थ है बरबाद/निरर्थक/बेकार)

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