‘यमराज’ से न्याय पाने भटकते यूपी के ये ‘सत्यवान’!!!

अजय बोकिल

ये कथा यूपी के उन ‘सत्यवानों’ की है, जो अपनी सधवा पत्नियों के बैंक खातों में विधवा पेंशन जमा होने से परेशान हैं और सरकारी तंत्र रूपी ‘यमराज’ के सामने अपने जिंदा होने का प्रमाण पत्र लेकर दर-दर भटक रहे हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में ऐसे 22 मामले सामने आए हैं। लेकिन इस फर्जीवाड़े ने गंभीर मोड़ तब लिया, जब सीतापुर के संदीप कुमार ने इसकी शिकायत जिला प्रोबेशन अधिकारी को की। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी के बैंक खाते में विधवा पेंशन जमा हो रही है। संदीप कुमार जिले के महमूदाबाद ब्लॉक के जाफरपुर गांव में सफाई कर्मी हैं। आठ माह पूर्व उनकी शादी जिले के परसेंडी ब्लॉक के शेरपुर सरांवा निवासी रोहन लाल की पुत्री प्रियंका से हुई थी। जब संदीप ने ससुराल में अपनी पत्नी के बैंक खाते की डिटेल्स निकलवाईं तो पता चला कि बीते 28 सितंबर को पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम) के जरिए तीन हजार रुपए भेजे गए।

पूछताछ पर पता चला कि यह राशि प्रोबेशन विभाग से विधवा पेंशन के तौर पर भेजी गई है। संदीप ने विभाग को शिकायत भी की, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और जिला कलेक्टर को कम्प्लेंट कर ‘इंसाफ’ मांगा। इस शिकायत के बाद सरकारी अधिकारियों ने विधवा पेंशन से जुड़े सभी कागजात जब्त कर लिए हैं। हालांकि शिकायत करने पर संदीप को धमकियां भी मिल रही हैं।

विधवा पेंशन भारत में सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का एक अहम हिस्सा है। सरकार ऐसी कई योजनाएं चलाती है। इन योजनाओं के तहत देश भर में करीब पौने 3 करोड़ लोगों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलती है। इनमें विधवा पेंशन भी शामिल है। यूपी सरकार भी ऐसी महिलाओं, जिनके पतियों का निधन हो चुका है, जो ‍अविवाहित हों या फिर गरीबी रेखा से नीचे हों, उन्हें प्रति माह 500 रुपए की पेंशन देती है। यह विधवा पेंशन राज्य की 17.5 लाख विधवा महिलाओं को दी जाती है। पेंशन राशि का भुगतान हर तीन माह में किया जाता है।

इस तरह की पेंशन मप्र सरकार भी देती है, जो 300 रुपए प्रतिमाह है। पेंशन घोटाले यहां भी हो चुके हैं। एक मामले में उसकी न्यायिक जांच भी हो चुकी है। राजस्थान के सवाई माधोपुर में तो उन लोगों को भी निराश्रित पेंशन मिल गई, जिन्होंने अर्जी ही नहीं लगाई थी। हालांकि पेंशन के रूप में हर माह जो राशि विधवाओं और निराश्रितों को दी जाती है, वह दैनिक मजदूरी से भी कम है, लेकिन इसे पाने के लिए भी वृद्ध और बेसहारा महिलाओं को सरकारी दफ्तरों में चप्पल घिसते देखा जाता है। ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर यह विधवा पेंशन पाकर भी उनकी बुझी आंखों में क्षण भर के लिए चमक आ जाती है।

ये पेंशन भी दलालों और घोटालेबाजों की निगाहों से नहीं बच सकी है। वैसे यूपी में विधवा पेंशन में घोटाला कोई नई बात नहीं है। पिछले साल ही विधवा पेंशन में 1 लाख से ज्यादा लाभार्थियों के आधार नंबर ही फर्जी निकले। इसके अलावा करीब 15 हजार पेंशनधारियों के बैंक खातों में बड़ी गड़बड़ का पता चला। योगी सरकार इसकी जांच डीपीओ से करा रही है। प्रारंभिक जांच में सामने आया कि जो आधार नंबर दिए गए थे, वे ही गलत हैं। साथ ही कई ऐसे लोगों को भी पेंशन देने का खुलासा हुआ, जिनका पता यमलोक होना चाहिए।

लेकिन सीतापुर में जो कुछ हुआ है, वह तो ‘सत्यवान सवित्री’ की पुराण कथा फिर से लिखने पर विवश करने वाला है। सुहाग को महिमामंडित करने वाली इस सुपरिचित कथा में सावित्री अपने मृत पति का जीवन लौटाने के लिए सीधे यमराज से भिड़ जाती है। यमराज नियति का तर्क देकर सावित्री को पति के प्राण छोड़कर तमाम प्रलोभन और सुख समृद्धि का वरदान देते हैं, लेकिन सावित्री अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अड़ी रहती है। अंत में यमराज सावित्री की साधना के आगे हार मानते हैं और पति सत्यवान को उनका जीवन सौ पुत्रों के साथ लौटा देते हैं।

कह सकते हैं कि यह भी शायद इसलिए संभव हो सका कि उस जमाने में सरकारें विधवा पेंशन नहीं दिया करती थीं। सीतापुर मामले में तो जिंदा सत्यवान अपना जीवित प्रमाण पत्र लेकर यह बताने की कोशिश कर रहा है कि मेरी पत्नी की विधवा पेंशन रोको, लेकिन व्यवस्था के यमराज उस पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। पुराण कथा में सत्यवान का मरना नियति था तो यहां फर्जीवाड़ा ही नियति मान लिया गया है। इस ‘आधुनिक सत्यवान’ का दर्द समझा जा सकता है कि आखिर कोई पति अपनी पत्नी को विधवा मानकर उसके बैंक खाते में 5 सौ रुपल्ली जमा होते देख कर कैसे खुश हो सकता है?

सावित्री ने पति के प्राणों के बदले यम के सौ पुत्रों के वरदान को भी ठुकरा दिया था। लेकिन यहां तो ‍सत्यवान बैंक में जमा रकम वापस लौटाने की स्थिति में भी नहीं है। वैसे इस बात का खुलासा अभी नहीं हुआ है कि इस अयाचित विधवा पेंशन को पाने के बाद इन ‘सावित्रियों’ की मन:स्थिति क्या है? इस राशि को लेकर उनकी क्या प्रतिक्रिया है? यकीनन पतिव्रता हिंदू पत्नियां यह ‘सुहाग के बदले पेंशन’ की सरकारी रकम लेकर खुश तो नहीं ही होंगी।

अब सवाल यह है कि यह फर्जी विधवा पेंशन राशि सधवा महिलाओं के खातों में कैसे पहुंची? किसके कहने पर पहुंची? इसके पीछे क्या खेल है? इस फर्जीवाड़े का लाभ किस की जेब में जा रहा है? और भी कई सवाल हैं, जो इस पेंशन घोटाले से उठ रहे हैं। जाहिर है कि दलालों और सरकारी अफसरों की मिलीभगत के बिना यह संभव ही नहीं है। यह ‘सत्यकथा’ उन दावों की पोल खोलने वाली भी है, जिनमें ‘राम राज’ में भ्रष्टाचार समाप्त होने की बातें कही गई हैं।

हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार कम तो हुआ नहीं है, बल्कि उसके नए क्षेत्र और रास्ते खुल गए हैं। इस दृष्टि से घोटालेबाजों की हिम्मत और हिकमत की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने जीवित पतियों को ‘स्वर्गवासी’ ठहरा कर उनकी पत्नियों को पेंशन का यह अनचाहा ‘तोहफा’‍ दिया है और खुद भी इसमें तगड़ा हाथ साफ किया है। कायदे से यमराज को अब ‘सत्यवानों’ को छोड़ ऐसे पतित घोटालेबाजों को अपने फंदे में बांधकर नर्क में डंप करना चाहिए, लेकिन व्यवहार में ऐसा कुछ भी होने की संभावना नहीं है। क्योंकि देश के कर्णधारों की प्राथमिकताएं और रुचियां दूसरी हैं।

इस ‘न्यू इंडिया’ में तो सावित्रियों को पता ही नहीं चल रहा कि उनके ‘सत्यवान’ सरकारी खातो में स्वर्गवासी हो चुके हैं। उनके मंगलसूत्र के मणि सरकारी दस्तावेज में तार-तार हो चुके हैं। यमराज भी इसे क्रॉसचेक इसलिए नहीं कर सकते क्‍योंकि उनके पाप-पुण्य के हिसाब की वेबसाइट पहले ही हैक हो चुकी है। जैसा कि दस्तूर है इस विधवा पेंशन फर्जीवाड़े की भी जांच होगी, रिपोर्ट बनेगी, दो-चार पर शायद कार्रवाइयां भी हों, लेकिन दलालों और करप्ट सरकारी मशीनरी का तंत्र बदस्तूर चलता रहेगा। क्योंकि आस्थाओं के मंदिर में जीवन के हर क्षेत्र में शुचिता का कोई आग्रह नहीं है। ‘सावित्रियां’ अपने किस्मत को कोसें तो भी किसको पड़ी है कि उनकी चिंता करे।

( ‘सुबह सवेरे’ से साभार)

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