इसीलिए ‘नजर लागी राजा सरकारी बंगले पे…!’

अजय बोकिल

ब्लैक एंड व्हाइट जमाने की फिल्म ‘काला पानी’ का मशहूर गीत है- ‘नजर लागी राजा तोरे बंगले पे।‘ इसका एक अंतरा है- ‘जो मैं होती राजा चंपा चमेलिया लिपट रहती राजा तोरे बंगले पे।‘ देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है। एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी पूर्व मुख्यिमं‍त्रियों से विशाल सरकारी बंगले खाली कराने के आदेश दे दिए हैं।

इसके बाद शरमा शरमी में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्रियों ने तो बंगले खाली कर दिए हैं, लेकिन विपक्षी समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता मुलायमसिंह, उनके बेटे अखिलेश सिंह और बहनजी मायावती बंगला बचाने के लिए जी जान एक किए दे रहे हैं। इस भाव से कि ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो…मगर मुझको लौटा दो मेरा बंगला…।

जबकि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में साफ कहा है कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद नेता को बंगला अपने पास रखने का नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है। वैसे बंगलों को इन नेताओं के पास ही रहने देने के लिए राज्य सरकार ने कानून भी बनाया, लेकिन सर्वोच्च अदालत ने उसे भी गैर कानूनी ठहराया। उधर इन तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगलों में रहने की ऐसी आदत पड़ गई है कि छूटे नहीं छूटती।

मायावती ने बंगला बचाने के लिए रातों रात बंगले पर ‘मान्यवर कांशीराम यादगार विश्राम स्थल’ का बोर्ड लगवाकर साबित करना चाहा कि ये कोई रिहायशी बंगला नहीं, एक महान नेता का स्मारक है। इस बंगले के आउट हाउस में ही बहनजी रहती हैं। यानी वे केवल स्वर्गीय नेता की स्मृतियों की रखवाली भर करती हैं। ऐसे में उनसे बंगला खाली कराना मान्यवरजी का अपमान है।

उधर मुलायम और अखिलेश के पास स्मारक जैसा कोई विकल्प नहीं होने से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अर्ज की कि उन्हें बंगला खाली कराने के लिए ‘‍उचित समय’ यानी मात्र दो साल की मोहलत दी जाए। यानी एक सामान रोज हटाने की मुद्दत। इसके पहले वे दोनों राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिले। लेकिन वे भी कुछ नहीं कर पाए।

नेताओं के बंगला प्रेम की यह नई कहानी नहीं है। यह उसी बंगला कथा का विस्तार भर है, जो देश की राजधानी नई दिल्ली से लेकर लखनऊ और भोपाल तक लिखी जा चुकी है। दिल्ली में तो बंगलों की मारामारी इस हद तक है कि जो एक बार किसी भी तरीके से बंगले में घुस गया, वह सीधे तरीके से बंगला शायद ही छोड़ता हो। कुछ बंगलों में स्व. नेताओं के स्मारक ही बन गए हैं।

अपना बंगला बचाने के लिए रालोद नेता अजीत सिंह ने अपने स्व. पिता चौधरी चरण सिंह के नाम पर स्मारक बनवा डाला था। यह बात अलग है कि मोदी सरकार ने उसे तवज्जो नहीं दी और चौधरी का स्मारक उनके गृह क्षेत्र मेरठ में बनाने का ऐलान किया। यही टोटका मायावती भी आजमा रही हैं।

दरअसल नेताओं के लिए कुर्सी से भी ज्यादा प्यारी कोई चीज है तो वह बंगला है। किसी जमाने में राजा महाराजाओं को अपने महलों से प्यार होता था, वैसा ही आजकल नेताओं को बंगलों से होता है। इस सूची को आला अफसरों और कुछ दूसरे लोगों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

सरकारी बंगले इसीलिए दिए जाते हैं कि सम्बन्धित व्यक्ति को रहने की परेशानी न हो, वह अपना वैधानिक काम बिना किसी दबाव के कर सके। उसके पद की गरिमा भी कायम रहे। नेताओं के संदर्भ में बंगलों का महत्व यह है कि जनप्रतिनिधि होने के नाते उनसे तमाम लोग मिलते रहते हैं, इस एक्टिविटी के लिए भी प्रशस्त आवास चाहिए। लेकिन यह सब तभी जायज है, जब आप पद पर हों। बंगले हमेशा चंपा चमेलिया बन लिपट कर रहने के लिए नहीं है।

सवाल यह है कि जनप्रतिनिधि कुर्सी जाने पर भी बंगला खाली करना क्यों नही चाहते? क्या उनके पास वैकल्पिक आवास नहीं होते या फिर वे ऐसा करने में अपनी हेठी समझते हैं? क्या बंगला खाली करना कुर्सी खाली करने से ज्यादा तकलीफदेह है? इन सवालों के कई जवाब हैं। पहला तो यह है कि सरकारी बंगले सरकारी खर्च पर मेंटेंन होते हैं। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आता है।

अगर दिल्ली के लुटियंस बंगले की बात करें तो वह सांसदों को मात्र 4 हजार रुपए प्रतिमाह के किराए पर मिलता है। ऐसा ही कोई निजी बंगला किराए से लेने पर गांठ से 15 से 20 लाख रुपए महीना देना होगा। और फिर सरकारी होने की जो ठसक है वो प्रायवेट बंगले में नहीं आ सकती। न ही उसमें दरबारी होने का रौब भी आ सकता। और फिर ‘सरकारी’ को भारतीय मानस बपौती मानता है।

इसका एक मानवीय पक्ष भी है। मध्य प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने पहली बार प्रदेश के ही एक पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाशचंद सेठी को सरकारी बंगला इसलिए अलॉट किया था ‍क्योंकि सेठीजी के पास बुढ़ापे में रहने के लिए अपना कोई घर नहीं था। वे पुराने जमाने के कांग्रेसी थे, ज्यादा कुछ जोड़ नहीं पाए।

यह प्रदेश के लिए भी शर्मनाक था कि उसका एक पूर्व मुख्यमंत्री किसी किराए के मकान में अपने अंतिम दिन काटे। लेकिन यह मानवीयता बाद में पूर्व मुख्यमंत्रियों के अधिकार में बदल गई। अब जिन मुख्यमंत्रियों से बंगले खाली कराए जा रहे हैं, उनके पास अपने खुद के मकान पहले से हैं। लेकिन ‘न्यारे’ सरकारी बंगले की बात ही कुछ और है।

उधर बीजेपी विपक्ष के इस बंगला प्रेम को भी राजनीतिक रूप से भुनाने में जुट गई है। यह बैठे बिठाए की बंगला पॉलिटिक्‍स है। दलील यह है कि विपक्षी नेताओं की रुचि केवल आलीशान बंगलों में रहने की है, आम आदमी की तकलीफों से उनका कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यहां असली मार दूसरी है।

कहते हैं कि प्राचीन काल में एक राक्षस ने अपने प्राण तोते में रख दिए थे ताकि उसे कोई मार न सके। लेकिन एक शातिर व्यक्ति ने तोते की गर्दन ही मरोड़ दी, जिससे राक्षस के प्राण पखेरू भी उड़ गए। भाजपा गेम भी कुछ इसी तरह का है। बंगला छिनेगा तो राजनीतिक रुतबे का बैंड खुद ही बज जाएगा।

आखिर बंगला नेता और दरबारी का भूषण होता है। बिना बंगले की सियासत किसी बेवा द्वारा तीजे का व्रत करने जैसी है। यही डर बंगलाधारी नेताओं को सता रहा है।

(सुबह सवेरे से साभार)

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