अब बस हम सावधानी और विवेक न खोएं

पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के बाद से ही देश को जिस खबर का इंतजार था वह खबर उस घटना के 12 दिन बाद आ गई। पुलवामा के घाव के बाद देश का जो भाव था उसका केंद्रीय तत्‍व यही था कि आखिर कब तक हम इस तरह अपने जवानों को और नागरिकों को आतंकी घटनाओं में गंवाते रहेंगे। कभी तो कुछ ऐसा हो जिससे लगे कि हम भी मुंह तोड़ने का माद्दा रखते हैं।

ऐसा नहीं है कि भारत में क्षमता नहीं है। भारत की क्षमता पर तो कभी कोई संदेह रहा ही नहीं, दुविधा हमेशा इस बात की रही कि हमने पहले युद्ध न करने या हमलावर न कहलाने का जो स्‍टैण्‍ड ले रखा है उसका क्‍या करें? सरकार जो भी रही हो, देश के मामले में कभी कोई कमजोर नहीं रही, हरेक सरकार ने देश की रक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को अहमियत दी, अंतर रहा तो सिर्फ कार्यशैली का।

26 फरवरी 2019 को जो हुआ उसने हमलावर न कहलाने के भारत के स्‍टैण्‍ड को तो कायम रखा है, बस कार्यशैली में थोड़ा बदलाव किया है। ताजा घटनाक्रम इस बात की पुष्टि है कि भारत अब अपने घर में घुस आने वाले आतंकियों पर ही कार्रवाई नहीं करेगा बल्कि वह आतंकियों को उनके घर में घुसकर मारेगा। और इस नई रणनीति की पहली बानगी जो सामने आई है उसके लिए भारतीय सेना के जांबाजों को पूरे देश का सलाम।

भारतीय वायुसेना ने आतंकियों को जिस अंदाज में जवाब दिया है वह इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है कि हमने बगैर किसी नागरिक नुकसान के और खुद को भी कोई नुकसान न होने देते हुए इस मिशन को पूरा किया। यह हमारी अचूक मारक क्षमता और कुशल व्‍यूहरचना की भी मिसाल है। इससे पहले उरी में हुए हमले के बाद भी हमने इसी अंदाज में सर्जिकल स्‍ट्राइक की थी। यानी हमारे दोनों एक्‍शन कोई तुक्‍का नहीं थे बल्कि सुनियोजित और पुख्‍ता रणनीति का परिणाम थे।

सवाल उठता है कि इसके बाद अब क्‍या? पहली नजर तो इस बात पर है कि हाल के वर्षों में इस तरह की सबसे तगड़ी कार्रवाई से चोट खाया पाकिस्‍तान अब क्‍या करेगा? क्‍या उसकी तरफ से कोई जवाबी कार्रवाई होगी? यदि हुई तो उसका दायरा कितना बड़ा और कितना गंभीर होगा? उस कार्रवाई का दोनों देशों के भविष्‍य पर क्‍या असर पड़ेगा?

पाकिस्‍तान की ओर से की जा सकने वाली किसी भी कार्रवाई पर बात करने से पहले कुछ बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी है। पहली बात तो यह साफ होनी चाहिए (और खासतौर से देश के भीतर उन्‍मादी तत्‍वों को ठांस कर समझा दी जानी चाहिए) कि यह भारत की ओर से पाकिस्‍तान पर किया गया हमला नहीं है। हमने अंतर्राष्‍ट्रीय नियमों का कहीं कोई उल्‍लंघन नहीं किया है बल्कि हम पर हमला करने वालों के खिलाफ आत्‍मसुरक्षा में यह कार्रवाई की है।

पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम देखें तो साफ हो जाएगा कि इस कार्रवाई को लेकर भारत ने विश्‍व के लगभग सभी प्रमुख देशों को या तो अवगत करा दिया था या उन्‍हें विश्‍वास में ले लिया था। तभी ज्‍यादातर देशों ने न सिर्फ पुलवामा कांड की निंदा की बल्कि पाकिस्‍तान पर भी आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का दबाव बनाया। हमारे कूटनीतिक प्रयासों ने हमें अंतराष्‍ट्रीय समुदाय के बीच वह ताकत दी कि हम बिना किसी हिचक के इतनी बड़ी सर्जिकल स्‍ट्राइक कर सके।

भारत ऐसा कुछ करने जा रहा है इस बात की पुष्टि उसी दिन हो गई थी जब अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने अपनी मीडिया ब्रीफिंग में कहा था कि पुलवामा घटना के बाद भारत पाकिस्‍तान के रिश्‍ते बेहद खतरनाक स्थिति में हैं और भारत कुछ बहुत सख्‍त और बहुत बड़ा करने जा रहा है। यानी दुनिया की चौधराहट करने वाले अमेरिका को भी भारत की ओर से इस बारे में ब्रीफ कर दिया गया था।

ऐसे में अब, इस कार्रवाई के बाद, एक तो अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय की ओर से भारत का विरोध होने की संभावना नगण्‍य है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्‍तान पर दबाव और बढ़ गया है। उस पर यह दबाव घरेलू और वैदेशिक दोनों मोर्चों पर है। घरेलू मोर्चे पर इमरान खान सरकार को सख्‍त आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। वहां की संसद में सरकार के खिलाफ शेम शेम के नारे तक लग रहे हैं।

उधर सीमा पर स्थिति यह है कि पाकिस्‍तान ने यदि कोई कदम उठाया तो उसे हमलावर देश माना जाएगा। क्‍योंकि भारत के पास तो अपनी कार्रवाई का औचित्‍य बताने के लिए पुलवामा की घटना एक पुख्‍ता कारण है। लेकिन पाकिस्‍तान के पास ऐसा कोई कारण नहीं है कि वह भारत पर सैन्‍य कार्रवाई करे और विश्‍व समुदाय से उसके लिए समर्थन भी हासिल कर ले।

इन हालात में ज्‍यादातर आशंका इस बात की ही है कि अब सीमा पर दोनों देशों के बीच गोलीबारी की घटनाओं में बहुत ज्‍यादा इजाफा होगा। हो सकता है उस गोलीबारी में हमारे जवानों के साथ साथ हमें नागरिक क्षति भी उठानी पड़े। लेकिन ऐसा एकतरफा नहीं होगा, इस तरह की क्षति दोनों ही देशों को उठानी पड़ेगी। चूंकि दोनों देश ये बात जानते हैं इसलिए दोनों ही इस क्षति को कम से कम करने के उपाय भी कर रहे हैं।

बड़ी जरूरत इस बात की है कि हम भारत में इस घटना को लेकर अपनी सैन्‍य क्षमता और अपने सैनिकों के शौर्य पर गर्व तो करें लेकिन अपना विवेक न खोएं। अकसर ऐसे हालात में हम अपना आपा खो बैठते हैं और उसी में ऐसी हरकतों को अंजाम दे देते हैं जो देश के सामाजिक ताने बाने को जोखिम में डाल देती हैं।

दूसरा खतरा यह है कि सीमा या सैन्‍य मोर्चे पर मार खाने से बौखलाया पाकिस्‍तान आतंकी गतिविधियों और छद्म युद्ध को बढ़ावा देगा। देश में मौजूद आतंकी नेटवर्क के स्‍लीपिंग सेल सक्रिय किए जाएंगे। ऐसे में सेना के साथ साथ नागरिकों को भी सतर्क और सक्रिय रहने की जरूरत है ताकि किसी भी आतंकी गतिविधि को होने से रोका जा सके। सीमा पर तो सुरक्षा के लिए सेना मौजूद है, हमारी सुरक्षा सावधानी और विवेक को कायम रखने में है।

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