गोदी मीडिया के प्रपंच से बचें मोदी जी

राकेश अचल

पिछले सवा पांच साल में भारतीय मीडिया का बुरी तरह ‘गोदीकरण’ कर सत्तारूढ़ भाजपा भले ही खुश हो ले, लेकिन अब यही ‘गोदी मीडिया’ भारतीय जन मानस को टीवी और अखबारों से दूर करता जा रहा है। जो दर्शक भक्तिभाव के कारण टीवी देखते भी हैं वे भी अब ‘गोदी मीडिया’ की ‘एक-धुन’ सुनकर हताश होने लगे हैं। और स्थिति ये हो गयी है कि मीडिया का गोदीकरण मोदी जी को ही परेशान करने लगा है। हाल के चंद्रयान प्रकरण में जो हुआ वो सबके सामने है।

इसरो की विफलता या सफलता कभी आलोचना का विषय नहीं रही। इसरो के वैज्ञानिकों ने हमेशा इतिहास ही रचा है, चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण और उसका 95 प्रतिशत सफल होना भी एक इतिहास ही है, लेकिन जिस तरह से उसे ‘गोदी मीडिया’ ने नाटकीय बनाया उससे न सिर्फ इसरो के वैज्ञानिकों के सामने हास्यास्पद स्थितियां बनीं बल्कि माननीय प्रधानमंत्री जी को असहज और अप्रत्याशित प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। ‘गोदी मीडिया’ ने इस ऐतिहासिक घटनाक्रम को अति मोदी प्रेम में इतना हास्यास्पद बना दिया कि लज्जा आती है। अंतरिक्ष यात्रियों की पोशाकें पहनकर ऐंकरिंग करने वाले टीवी पत्रकारों ने जो विदूषक भूमिका निभाई वो अकल्पनीय है।

‘गोदी मीडिया’ के प्रोमो देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि उन्हें हमारे वैज्ञानिकों के चंद्रयान-2 की कामयाबी से ज्यादा चन्द्रमा पर मोदी-मोदी की अनुगूंज की फ़िक्र थी, फ़िक्र होना स्वाभाविक भी है क्योंकि ‘गोदी मीडिया’ अपने मूल चरित्र को तो कब का भुला चुका है। मीडिया भी कथित नव-राष्ट्रवाद की चपेट में आ गया है। आज ऐसा लगता है कि देश में भाजपा के सत्तारूढ़ होने से पहले सभी गद्दार और राष्ट्रद्रोही ही इस देश में रहते थे या शासन करते थे, जबकि ये सच नहीं है। राष्ट्रवाद को नारा उन लोगों ने बनाया है जो सत्ता की बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं।

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अब भारत में ‘गोदी मीडिया’ ने जन सरोकारों से जुड़ी सूचनाओं और समाचारों को ‘फटाफट’ खबरों की श्रेणी में डाल दिया है। गोदी मीडिया का अधिकांश ‘हिस्सा ‘बे-सिर-पैर’ की बहसों और राष्ट्र नायकों के चरित्र हनन में जाया हो रहा है। देश जब महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मनाने जा रहा है तब ‘गोदी मीडिया’ गांधी के सत्य के प्रयोगों को ऐसे दिखा रहा है जैसे महात्मा गांधी देश के सबसे बड़े ‘दुराचारी’ थे। मुझे लगता है कि सत्ता की अंधभक्ति के इस युग में यदि गांधी ज़िंदा होते तो वे भी आस्को-पास्को के तहत किसी जेल की हवा खा रहे होते! दुनिया में कौन सा देश है जो अपने राष्ट्र नायकों के चरित्र हनन की इतनी बेशर्म कोशिश करता है?

बहरहाल बात बढ़ेगी तो कहीं से कहीं जाएगी। आज जरूरत ये है कि गोदी मीडिया सत्ता के प्रति अपना भक्ति भाव त्यागे और भारतीय जन मानस को, लोकतंत्र को अपना आराध्य बनाये ताकि सचमुच लोकतंत्र ज़िंदा रह सके। दुनिया में जब-जब मीडिया सत्ता की गोदी में जाकर बैठता है तब-तब ऐसी ही हास्यास्पद स्थितियां बनती हैं जैसी कि आज भारत में हैं। आज दुर्भाग्य से देश का समूचा मीडिया (अपवाद छोड़कर) सत्ता की लोरियां सुनने-सुनाने का अभ्यस्त हो गया है। सत्ता के लिए ये लाभदायक और सुविधाजनक स्थिति हो सकती है, किन्तु लोकतंत्र के लिए नहीं।

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने और चंद्रयान-2 तक के मामले में जिस तरह से राष्ट्रवाद को ‘सैंडविच’ बनाया गया है उससे हालात बनने के बजाय और बिगड़े हैं। गोदी मीडिया को ये स्वीकार करना होगा कि देश में देशद्रोही कोई नहीं है। सत्ता के प्रति असहमति जताना अंग्रेजों के जमाने में देशद्रोह होता था, किन्तु आज हमारे देश में हमारी सरकार है, उससे सवाल-जबाब करना देशद्रोह कैसे हो सकता है?

मेरा मानना है (सबका नहीं हो सकता) कि आने वाले शेष साढ़े चार साल में सत्ता और मीडिया की दुरभि संधि टूटना चाहिए, अन्यथा देश में जो हालात बनेंगे वे न सिर्फ अकल्पनीय होंगे बल्कि नुकसानदेह भी होंगे। हमारे संवेदनशील प्रधानमंत्री को ही इस दिशा में पहल करना होगी। वे मीडिया से नियमित संवाद करें, लेकिन कैमरों को ओढ़ने-बिछाने की अपनी आदत में थोड़ी तब्दीली लाएं, यही देशहित होगा और यही राष्ट्रवाद। टीवी पर टसुए बहाते हमारे राष्ट्रीय हीरो और वैज्ञानिक शोभा नहीं देते, उन्हें इन्हें छुपाना चाहिए। ‘दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा, फ़रयाद न कर।’

(लेखक की फेसबुक वॉल से साभार)

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