रवीश बहुत डरे हुए हैं बेचारेे, सच्चाई से!

विनय जोशी

एक समय था जब पत्रकारों की निडरता की मिसालें दी जाती थी। उनकी लेखनी से सरकारें तक हिल जाया करती थीं। वे न किसी से डरते थे न किसी के पक्षधर थे। निडरता से खबरें लिखना उनका व्यवसाय नहीं उनका जुनून था। यहां तक कि वे कभी कुख्यात अपराधियों की धमकियों से भी नहीं डरे। बस अपने पाठकों तक सच्ची और निष्पक्ष खबर पहुँचाना जैसे उनका रोज का काम था।

फिर आए हमारे रवीश जी जैसे पत्रकार। लेखनी अच्छी, विषय का अच्छा ज्ञान, भाषा पर पकड़ और संयम के साथ अपनी बात पहुँचाने की कला सब कुछ तो है उनमें। लेकिप इन सभी कलाओं के पीछे अपनी राजनीतिक विचारधारा को छुपाने कला शायद नहीं सीखी। निष्पक्षता से कोई नाता नहीं।

पहले टीवी का माध्यम एक तरफा था, आप बस बोलते जाइये प्रतिक्रिया के यंत्र की कमी के कारण आपका झूठ कभी पकड़ा ही नहीं जाएगा। फिर आए फेसबुक और ट्विटर। अब समय था आपके झूठ और तथाकथित निष्पक्षता की पोल खोलने का। इसलिए आज इन्हें डर लगने लगा है। किनसे? सरकार से नहीं। अपराधियों से भी नहीं। आम जनता के सवालों से। हाँ हैं कुछ भटके लोग जो फेसबुक-ट्विटर पर गलियां देते हैं। लेकिन उनकी आड़ के पीछे खड़े हो कर रविश जी निशाना तो उनके झूठ को उजागर करने वाले आम नागरिक को ही बना रहे हैं। पत्र जो उन्होंने एम.जे. अकबर को लिखा है, साफ बतलाता है कि डर किस चीज का है।

डर है पकड़े जाने का, सच्चाई सामने आने का। मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? जानने के लिए उनके 2014 के चुनाव के कवरेज का वीडियो ढूंढ लीजिये आपको पता चलेगा किस तरह लोगों की जात पूछ पूछ कर अंदाजा लगाते थे कि कौन किसे वोट देगा। चुनाव के नतीजे तो हमारे सामने हैं ही खैर। इसलिए बौखला गए हैं। डरे रहने का ढोंग करते हैं। असहिष्णुता का हवाला दे कर टीवी पर काली स्क्रीन चलाकर हीरो बनते हैं।

बहुत डरे हुए हैं बेचारे। सच्चाई से!

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(विनय जोशी, पढाई से इंजीनियर, पेशे से सेल्समेन और प्रकृति से विद्यार्थी हैं। शौकिया लिखते हैं और कभी-कभी दुनिया को अपने नजरिये से कैमरे में कैद करते हैं।)

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