इस संगीत में ढूंढिए जाते और आते साल का अंतर

आपको याद होगा कुछ समय पहले मैंने एक संगीत रचना को लेकर पंडित भीमसेन जोशी और लता मंगेशकर के गायन पर कुछ लिखने की कोशिश की थी। आज नए साल पर यूं ही कुछ ‘क्‍लासिकल’ ढूंढते ढूंढते पंडित जसराज की एक रचना सामने आई। जिस तरह पुराने प्रसंग में लता जी ने पंडित भीमसेन जोशी के साथ बाजे रे मुरलिया गाया था, उसी तरह इस रचना में पंडित जसराज के साथ फिल्‍म जगत की चर्चित गायिका कविता कृष्‍णमूर्ति मंच पर सुमिरन कर ले मेरे मना गा रही हैं। यह ठीक 14 साल पुरानी रचना है।

पंडित जसराज जी के बारे में लिखना मेरे बूते की बात नहीं। अगर मैं कोशिश भी करूं तो यह वैसा ही होगा जैसे कोई तृणमूल, हिमालय की सबसे ऊंची चोटी के बारे में बोलने का दुस्‍साहस करे। मैंने ऊपर कहा कि ‘’नए साल पर यूं ही कुछ क्‍लासिकल ढूंढते ढूंढते पंडित जसराज की एक रचना सामने आई..’’ मैं खुद को करेक्‍ट करता हूं, ‘रचना’ शब्‍द का इस्‍तेमाल यहां अनंत आकाश के लिए रजकण की संज्ञा जैसा है। दरअसल पंडित जसराज गाते नहीं संगीत की सृष्टि करते हैं। इस लिहाज से यह उनकी रचना नहीं बल्कि सृष्टि है।

यह संगीत सुनते समय अचानक मुझे लगा जैसे यह गत और आगत के बीच का संवाद है। ऐसा संवाद जिसमें प्रत्‍यक्ष कुछ नहीं सबकुछ प्रतीकों में है। आमतौर पर हम नए वर्ष के आगमन के समय आगत के स्‍वागत में विगत को भुला देते हैं और वह भी किसी तथागत की तरह चुपचाप प्रस्‍थान कर जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है, विगत के पास जो अनुभव और पीड़ा है उसी की आगत को संभवत: सबसे ज्‍यादा जरूरत होती है। संगीत में रियाज बहुत जरूरी है और विगत के पास रियाज की वह पूंजी है जिसे सहेजने की आगत को अभी शुरुआत करनी है।

पंडित जसराज और कविता कृष्‍णमूर्ति की इस प्रस्‍तुति को सुनें तो लगता है जैसे जाता हुआ वर्ष आने वाले वर्ष को बड़े प्‍यार से बुलाकर अपने पास बैठा कर समझाता है कि उसे जीवन का संगीत किस तरह रचना चाहिए। जैसे संगीत की सबसे बड़ी ताकत उसका ठहराव और सुरों का गांभीर्य है, उसी तरह जीवन में भी इन दोनों बातों की महती आवश्‍यकता है। जैसे संगीत को साधने के लिए साधना जरूरी है उसी तरह आते और जाते समय को साधने के लिए एक साधक जैसा ही धैर्य और तप चाहिए…

और हां, जैसे जीवन में संगत की श्रेष्‍ठता का महत्‍व है उसी तरह इस प्रस्‍तुति में आप वायलिन पर डॉ. एल. सुब्रमण्‍यम की संगत को इस प्रस्‍तुति की उदात्‍तता से अलग कर ही नहीं सकते।

नए वर्ष के अवसर पर आप भी इस रचना को सुनिए और कोशिश करिए उन अर्थों को समझने की जो यह संगीत समय के सुरों पर बताने की कोशिश कर रहा है…

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