‘ईंट’ और ‘नेमप्‍लेट’ : दो लघु कथाएं

ईंट
सड़क किनारे खड़े होकर बच्चों को कतारबद्ध स्कूल जाते देखना उसका प्रिय शग़ल है।लाल- लाल यूनिफार्म और सफ़ेद जूते पहने ये बच्चे उसे भट्ठे से निकली ताज़ा ईंटों की तरह दिखाई देते हैं।मंत्रीजी की रैली में कल उसने सुना भी था कि”हमारे देश का एक एक नौनिहाल एक-एक ईंट की तरह है जो मज़बूत राष्ट्र का निर्माण करेगा “सुनते ही उसकी आँखों के सामने बड़ी सी चमचमाती इमारत घूम गई थी।
उसकी उम्र यूँ तो ग्यारह साल है,लेकिन पूछते ही तपाक से पंद्रह बताता है।पता नहीं क्यों?लेकिन पिता ने ऐसा ही कहने के लिए कहा है।
“कहाँ मर गया मरदूद,ईंट भट्ठे पर काम करने तेरा बाप जायेगा क्या? “कान के पर्दे चीरती माँ की आवाज़ सुनते ही वह नंगे पांव ईंट भट्ठे की तरफ़ दौड़ पड़ा।

नेमप्लेट

मृत पत्नी की छाती पर सिर रखे वे रह- रह कर बड़बड़ा रहे थे।बेटी ने जैसे ही कंधे पर हाथ रखा,ग़ुबार बह निकला-“अजीब थी तेरी मां, न क्रोध ,न घबराहट,न अधीरता,न बेचैनी।मेरी हर सुविधा का ध्यान रखना और हर हरकत प्यार और सहानुभूति से सुधारने की ज़िद।उसने मेरे लिए न जाने कितने तीज और चौथ के व्रत रखे ।मैंने तो ख़ूब जिया अपना जीवन लेकिन बच्चों और परिवार में खटने के लिए अकेला छोड़ दिया उसे।तुझे पता है,जब तू पैदा हुई थी,मैं  ऑफिस के काम का बहाना कर दोस्तों के साथ पहाड़ों पर चला गया था।आज जब वह मुझे अकेला छोड़ गई,पलट कर देखता हूँ तो मैं अब भी वैसा ही हूँ,सारे अधिकार और सुविधाओं का आकांक्षी।शायद…शायद मैं उसकी असुरक्षा समझ रहा था, उसकी मंशा जानता भी था,इसीलिए छुप -छुप कर उसकी डायरी पढ़ा करता था,और डायरी की सतरों में  केवल अपना ही नाम पाकर गर्व और आश्वस्ति महसूस करता रहा।मेरा व्यवहार और प्राथमिकताएं मेरी इच्छा और सुविधा के अनुसार बदलती रहीं,साथ-साथ बदलती रही वह भी।बस एक मैं ही नहीं समझ पाया कि उसने जीवन में मुझसे क्या चाहा?”

“माँ…माँ तो बस इतना चाहती थी कि घर की नेमप्लेट पर आपके साथ उनका भी नाम हो पापा।” बेटी ने रुंधे गले से कहा।
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रक्षा दुबे चौबे 

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