परिवार की ‘बेरोजगारी’ दूर करने का सिद्धू फंडा!

अजय बोकिल

पंजाब के नगरीय प्रशासन मंत्री, जाने-माने पूर्व क्रिकेटर और टीवी कॉमेडी शो के ठहाकेबाज नवजोत‍ सिंह सिद्धू ने राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव में उस वक्त सत्तारूढ़ बादल परिवार की इसलिए खूब आलोचना की थी कि उन्होंने ज्यादातर अपनों को ही उपकृत किया। अब खुद सत्ता में आने के बाद नवजोत भी घर के लोगों को ही रेवडि़यां बांट रहे हैं। हाल में उन्होंने अपने बेटे करनवीर‍ सिद्धू को राज्य का सहायक महाधिवक्ता (एएजी) बनवा दिया। हालांकि यह नियुक्ति राज्य में 26 लॉ आफिसरों के साथ हुई है।

सिद्धू की डॉक्‍टर पत्नी और पूर्व विधायक नवजोत कौर सिद्धू पहले ही पंजाब वेयर हाउस कारपोरेशन की चेयरपर्सन बनाई जा चुकी हैं। खबर यह भी है कि परिवार की चौथी सदस्य बेटी राबिया के लिए भी कोई ‘ठीक जगह’ तलाशी जा रही है। परिवार में चार सदस्य हैं। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और बादल सरकार में मंत्री रहे अनिल जोशी ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जहां पंजाब में लोग एक-एक नौकरी के लिए चप्पलें घिस रहे हैं, वहीं सिद्धू अपने परिजनों को उच्च पदों पर धड़ल्ले से तैनाती करवा रहे हैं। यानी घर में ही नौकरियां बांटी जा रही हैं।

विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने हर घर में एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन वादे का हश्र इस रूप में होगा, यह शायद ही किसी ने सोचा हो। यह राज्य की जनता के साथ धोखा है।

नवजोत सिंह सिद्धू भारतीय क्रिकेट, मनोरंजन उद्योग और राजनीति का अनोखा चरित्र इस मायने में हैं कि उन्होंने अपनी 55 साल की जिंदगी में कई किरदार और मुखौटे बदले। वो जब राष्ट्रीय क्रिकेट में आए तो शुरूआती परफार्मेंस को देखकर क्रिकेट टिप्पणीकार राजन बाला ने उन्हें ‘स्ट्रोकलेस वंडर’ कहा था। हालांकि सिद्धू ने बाद में अपना प्रदर्शन काफी सुधारा। फिर भी वो टॉप क्रिकेटरों की सूची में नहीं आ पाए।

क्रिकेट से ज्यादा शोहरत उन्हें क्रिकेट कमेंट्री की ‘सिद्धू शैली’ और ‍टीवी के कॉमेडी रियलिटी शो में बात-बेबात ठहाके लगाते लोट-पोट हो जाने के कारण मिली। इसी लोकप्रियता को उन्होंने सियासत में भी भुनाया और 2004 में भाजपा में शामिल हो गए। बेशक सिद्धू का हिंदी और अंग्रेजी पर अच्छा अधिकार है। ऐसे में वो राजनीतिक भाषण भी प्रवचन की तरह देते हैं। यह उनकी अपनी अदा है।

सिद्धू पंजाब की राजनीति में अलग मुकाम बनाना चाहते थे, लेकिन भाजपा का यह ‘पगड़ीधारी सरदार’ पंजाब की सियासत में अपना डेरा अलग जमाए, यह भाजपा की सहयोगी अकाली दल को मंजूर नहीं था। पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज सिद्धू ने पिछले विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया और कल तक जिसके गुण गाते रहे, उसी भाजपा की ठुकाई शुरू कर दी। वे चुनाव जीते और कांग्रेस सरकार में वरिष्ठ मंत्री भी बन गए।

सिद्धू की बोल्डनेस ने लगता है कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी प्रभावित किया है। इसीलिए कांग्रेस के 84 वें प्लेनरी सत्र में सिद्धू को भी धड़ल्ले से बोलने का मौका‍ मिला। आलाकमान से नजदीकी को सिद्धू पंजाब में स्वहित में खूब भुना रहे हैं और कांग्रेस में कोई कुछ बोल नहीं पा रहा। आलोचकों का साफ कहना है कि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने हर घर में एक नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन यहां तो एक ही घर में कई नौकरियां बंट रही हैं।

अगर बेरोजगारी की बात की जाए तो केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2015-16 के सर्वे में देश में पंजाब का नंबर 14 वां है। विधानसभा चुनाव के दौरान खुद कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि राज्य में 75 लाख बेरोजगार हैं और यह संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। यहां तक कि कुछ दिन पहले सिद्धू से राज्य के बेरोजगार हो चुके अध्यापक नौकरी के लिए मिले थे। उन्हें सिद्धू ने आश्वासन दिया था कि  सरकार कुछ करेगी।

लेकिन खबर उनके बेटे के सरकारी वकील बनने की आई। सिद्धू का स्वजनों को रोजगार देने का यह प्रेम तब है कि जब खुद उनके पास 45 करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टी है। यह बात अलग है कि पिछले दिनों 50 लाख की आयकर चोरी के आरोप में उनके दो बैंक खाते सीज कर दिए गए थे।

इस देश में नेताओं द्वारा अपनों को रेवडि़यां बांटना नई बात नहीं है। इस हमाम में सभी नंगे हैं। क्षे‍त्रीय पार्टियां तो परिवारवाद के आदर्श पर ही चल रही हैं तो कांग्रेस की सियासत शुरू ही यहीं से होती है। यह बुराई अब भाजपा में भी घर करने लगी है। लेकिन फर्क इतना है ‍कि ज्यादातर मामलों में कोई सत्ता में रहता है तो कोई संगठन में या फिर जनप्रतिनिधि बन जाता है।

लेकिन ‘सिद्धूइज्म’ इस मामले में भी दूसरों से अलग है। वे पूरे खानदान के साथ राज्य की ‘सेवा’ में लगे हैं। उनकी इसी अदा का कांग्रेस आलाकमान भी कायल है। माना तो यह भी जा रहा है कि सिद्धू पंजाब में कांग्रेस का भविष्य का चेहरा हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उनका देश भर में स्टार प्रचारक के रूप उपयोग कर सकती है।

यहां मुद्दा सिर्फ इतना है कि सार्वजनिक रूप से नैतिकता की बातें करने वाले असल जिंदगी में क्या आचरण करते हैं, यह सिद्धू स्टाइल पॉलिटिक्स से समझा जा सकता है। चर्चा यह भी है कि विदेश पढ़कर जल्द लौटने वाली उनकी बिटिया के लिए भी ‘नौकरी’ की तलाश अभी से शुरू हो गई है। लोकसभा चुनाव तक शायद उसका भी ‘पुनर्वास’ हो जाए।

सिद्धू परिवार मिल जुल कर राज्य की सेवा किस तरह करेगा, पता नहीं, लेकिन केवल अपना ही घर भरने की इस अदा का कांग्रेस कैसे बचाव करेगी, समझना मुश्किल है। सिद्धू खुद भी नैतिकता की बातें हवा में मुट्ठियां लहरा लहरा कर करते हैं, लेकिन इसका व्यावहारिक मतलब अगर अपनों को रेवडि़यां बांटना ही है तो ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।

(सुबह सवेरे से साभार)

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