एक्‍शन तो तन्‍वी सेठ और मीडिया पर भी होना चाहिए

मैं जानता हूं कि आज जिस विषय पर लिखने जा रहा हूं उसे लेकर मुख्‍य मीडिया और सोशल मीडिया में अच्‍छी खासी बहस चल रही है। मैं इस बात से भी अनभिज्ञ नहीं हूं कि इस मुद्दे को अब हिन्‍दू-मुस्लिम नजरिये से देखा जा रहा है। मुझे यह भी पता है कि मैं जो लिखूंगा उसे भी इसी तरह के खांचों में बांटकर देखा जाएगा… लेकिन फिर भी लिखना जरूरी है…

लिखना इसलिए जरूरी है क्‍योंकि यह न तो हिन्‍दू–मुस्लिम मामला है और न ही यह किसी संगठन से जुड़ा है। इसके पीछे जो आशंका छिपी है वह यह है कि मीडिया और राजनीति मिलकर देश में जैसा वातावरण निर्माण कर रहे हैं उसका जायज या नाजायज फायदा उठाने की प्रवृत्ति अब आम लोगों में घर करती जा रही है।

मामला लखनऊ के पासपोर्ट सेवा केंद्र से जुड़ा है जहां तन्‍वी सेठ नाम की एक महिला ने कार्यालय के एक अधिकारी विकास मिश्रा पर आरोप लगाया कि उन्‍होंने उन्‍हें (तन्‍वी को) धर्म के नाम पर अपमानित किया। तन्वी अपने पति और 6 साल की बच्ची के साथ पासपोर्ट बनवाने गई थीं।

तन्‍वी ने 2007 में मोहम्‍मद अनस सिद्दीकी से शादी की थी। उनका आरोप है कि विकास मिश्र ने दस्तावेज देखने के बाद मुसलमान से शादी के बारे में सवाल-जवाब शुरू कर दिए। इससे नाराज तन्वी ने ट्विटर पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से शिकायत की। जिसके बाद उस अधिकारी का तबादला करते हुए अनस और तन्वी को पासपोर्ट मुहैया करवा दिए गए।

अब जरा उन विकास मिश्रा का पक्ष भी सुन लीजिए जो इस घटना के मुख्‍य ‘विलेन’ हैं। उन्‍होंने मीडिया से कहा- ‘’तन्वी सेठ के निकाहनामे पर उनका नाम ‘शादिया अनस’ लिखा हुआ था। मैंने उसी के मुताबिक नाम लिखने को कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया।’

मिश्रा का कहना है कि उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए गहन जांच करनी होती है कि कोई व्यक्ति पासपोर्ट के लिए अपना नाम तो नहीं बदल रहा है। दूसरे, तन्वी ने अपने आवेदन में लिखा था कि वह 12 साल से नोएडा में रह रही हैं। ऐसा है तो फिर उन्होंने पासपोर्ट के लिए लखनऊ में क्यों आवेदन किया? वैसे तो उनका आवेदन इसी आधार पर रद्द हो जाना चाहिए था।

खैर, पासपोर्ट कार्यालय में जो हुआ वह अंदर की बात थी लेकिन तन्‍वी उर्फ शादिया के ट्वीट से यह मामला मीडिया मसाला बन गया। और गुरुवार को पूरे दिन चैनल वाले इसी पर चीखते रहे। बात निकली तो वह जाने कहां कहां तक पहुंच गई।

कहा गया कि तन्‍वी से पूछा गया उसका मंगलसूत्र कहां है, तुमने मुसलमान से शादी क्‍यों कर ली, विवाह हिन्‍दू रीति से किया कि नहीं… इसी तरह तन्‍वी के पति के हवाले से बताया गया कि अफसर ने उससे भी कहा कि तुम अपना धर्म बदल लो, फेरे लेकर दुबारा शादी करो वगैरह…

अब जरा वो ट्वीट देख लीजिए जो तन्‍वी उर्फ शादिया ने विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज को किए-

“hello ma’am I type this tweet with immense faith in justice and in you and ironically with a lot of anger / hurt and agony in my heart because of the way I was treated at the Lucknow passport office at Ratan Square by Mr. Vikas Mishra the reason because I married a Muslim and not changed my name ever. He spoke to me very rudely and was loud enough for others to hear while discussing my case. I have never felt so harassed ever before. The other workers at the office acknowledge his rude demeanour.”

इसमें ट्वीट में ज्‍यादा शिकायत उस अधिकारी के व्‍यवहार और बोलचाल के लहजे को लेकर प्रतीत होती है। और शायद हुआ भी ऐसा ही होगा। निश्चित रूप से किसी भी सरकारी दफ्तर में किसी भी अधिकारी और कर्मचारी का यह कर्तव्‍य है कि वह वहां आने वालों से शिष्‍टाचार से पेश आए। कोई कारण नहीं बनता कि उससे बदतमीजी की जाए।

पर गंभीर बात यह है कि तन्‍वी सेठ ने इस मामले को हिन्‍दू मुस्लिम प्‍लेटफार्म पर चढ़ाकर प्रस्‍तुत किया। और लपकू मीडिया ने उसे और नमक मिर्च लगाकर ऐसे हल्‍ला मचाया मानो केंद्र सरकार और उसका विदेश मंत्रालय लोगों की हिन्‍दू मुस्लिम पहचान देखने के बाद ही उनका काम कर रहे हों। इधर मीडिया ने चीखें मारीं और उधर ‘आत्‍मप्रचार’ के मारे विदेश मंत्रालय ने आनन फानन में अपने अफसर पर कार्रवाई भी कर डाली।

अब सोशल मीडिया पर एक खेमा तन्‍वी की तरफदारी में है तो दूसरा उससे कहीं अधिक लाउड होकर सवाल उठा रहा है कि पासपोर्ट कार्यालय के उस अफसर ने कानून कायदे से आवेदन की जांच करके क्‍या गलती की? लोग ट्वीट कर रहे हैं कि भारत में पासपोर्ट चाहिए तो मुस्लिम बनकर चले आओ। दूसरी तरफ यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्‍या इस देश में एक हिन्‍दू अफसर को कायदे से काम करने पर भी सजा भुगतनी पड़ेगी?

दरअसल हमने, जिसमें सबसे ज्‍यादा मीडिया शामिल है, देश में ऐसा माहौल बना दिया है कि जब सीधी तरह से या मनमुताबिक बात न बने तो मामले को या तो हिन्‍दू मुस्लिम बना दो या फिर सवर्ण और दलित। खुद की गलती होने पर भी ऐसा हल्‍ला मचाओ या रोना धोना करो कि आपकी गलती बताने वाला खुद अपने आपको ही गलत समझने लगे।

राजनीति तो यह काम कर ही रही है, उसकी पूर्णाहुति की सुपारी मीडिया ने उठा ली है। आंखें चढ़ाकर या होठ बिचका कर कैमरे के सामने मटकने वाले एंकर बैठाए ही इसलिए गए हैं कि कब कोई चिंदी हाथ लगे और कब वे उसे थान में बदल दें। उनके हाथ में तथ्‍यों का कागज नहीं बल्कि मिर्च मसाले का डिब्‍बा होता है जिसे वह हर वाक्‍य पर छिड़कते चलते हैं।

यदि यह मामला हिन्‍दू मुस्लिम एंगल वाला न बनाया जाता तो यह रूटीन प्रक्रिया का ही मामला होता। लेकिन आज पूरा देश ऐसे बांटने वाले जुमलों से डरा दिया गया है। और जब भारत सरकार या उसकी विदेश मंत्री भी एक ट्वीट से इतना डरने लगे कि बिना पुख्‍ता जांच कराए अपने अफसर पर कार्रवाई कर डालें तो सोचिए हालात कहां जा रहे हैं।

उस अफसर पर तो आपने कार्रवाई कर दी, लेकिन जो सवाल उसने उठाए हैं उनके मु‍ताबिक क्‍या कार्रवाई तन्‍वी सेठ पर भी नहीं होनी चाहिए कि उसने पासपोर्ट कार्यालय को गुमराह करने की कोशिश क्‍यों की? आखिर कैसे आनन फानन में ट्वीट के दबाव में आकर समारोहपूर्वक उन लोगों को पासपोर्ट थमा दिए गए? आप खुद अपने अफसरों का मनोबल इस तरह तोड़ते हैं तभी तन्‍वी सेठ चिल्‍लाकर अपना पासपोर्ट झटक लेती हैं और नीरव मोदी छ: छ: पासपोर्ट बनवा कर फुर्र हो जाते हैं। एक महिला के ट्वीट पर तो आपने कार्रवाई कर दी और अब ये जो हजारों ट्वीट उसके खिलाफ हो रहे हैं उस पर आप क्‍या करेंगे…

पुनश्‍च– घटना को लेकर मुझे किसी ने एक वीडियो भेजा है जो बिलकुल अलग कहानी कहता है। इसकी लिंक है-

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