तो फिर ‘दशावतार’ थ्योरी भी खारिज कर दें सत्यपाल जी!

अजय बोकिल

मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, पूर्व आईपीएस अधिकारी और विज्ञान के पूर्व छात्र डॉ. सत्यपाल सिंह ने करीब डेढ़ सौ वर्षों से स्थापित डार्विन के विकासवाद (क्रम विकास) के सिद्धांत को खारिज करते हुए बयान दिया कि डार्विन गलत थे, क्योंकि आज तक किसी ने बंदर को इंसान में बदलते नहीं देखा। यह सिद्धांत वैज्ञानिक तौर पर गलत है। डॉ. सत्यपालसिंह ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत स्कूलों व कॉलेजों में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए। जब से इस धरती पर इंसान आया है, तब से वह मानव रूप में ही है। अर्थात मनुष्य, मनुष्य रूप में ही इस धरती पर आया है।

डॉ. सत्यपाल ने यह ज्ञान ऑल इंडिया वैदिक सम्मेलन में दिया। तर्क था कि हमारे किसी भी पूर्वज ने लिखित या मौखिक रूप से बंदर के मनुष्य में रूपांतरण का न तो जिक्र किया है न पुष्टि की है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसा कोई सीसीटीवी कैमरा बतौर प्रमाण मौजूद नहीं है, जो यह साबित करे कि बंदर इंसान में बदला या बदल रहा है।

अंगरेज वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने प्राणियों के विकासवाद का सिद्धांत तब दिया था, जब भारत में लोग ट्रेन में बैठने से भी डरते थे। अपने सुदीर्घ वैज्ञानिक अध्ययन के बाद डार्विन ने दो मुख्‍य स्थापनाएं दीं। पहला तो विश्व के समस्त प्राणी अपने पूर्वजों के माध्यम से एक दूसरे से संबधित हैं तथा प्राणियों का क्रमश: जैविक विकास होता रहता है। दूसरे, इस विकास की एक प्रक्रिया होती है, जिसे प्राकृतिक वरण (नेचुरल सिलेक्शन) कहते हैं।

अर्थात विकसित प्राणियों में भी प्रकृति में वही टिक पाता है, जो सर्वाधिक सक्षम होता है। जो खुद को प्रकृति की चुनौतियों के अनुरूप नहीं ढाल पाता,वह खत्म हो जाता है। नए रूपों और गुणों के लिहाज से प्राणियों का विकास पर्यावरणीय अनुकूलनों के अनुसार होता है। एक प्रजाति दूसरी प्रजाति में बदल जाती है। इसी हिसाब से मनुष्य का विकास बंदरों से हुआ है। डार्विन के सिद्धांत पर तब भी सवाल उठे थे। इनमें यह भी था कि इस विकासवाद की प्रक्रिया क्या है? यह होता कैसे है? अगर यह होता है तो सारे बंदर अभी भी बंदर ही क्यों हैं? मनुष्य क्यों नहीं बन गए? वगैरह।

डार्विन के सिद्धांत को लेकर इन शंकाओं के जवाब बाद में कुछ वैज्ञानिकों ने देने की कोशिश की है। इनमें प्रमुख हैं हेनरी बर्गसन। बर्गसन ने यह स्थापित किया कि जीवों में यह उत्परिवर्तन जैविक धक्के (वाइटल इम्पल्स) के कारण होता है। इसके लिए बर्गसन को नोबल पुरस्कार भी मिला था। हालांकि अनुवांशिकी विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्राणियों को मनमाफिक तरीके से बनाया जा सकता है। यह प्राणियों के गुणसूत्र में छेड़छाड़ से संभव है और किया भी जा रहा है।

वैसे डार्विन ने खुद भी माना था कि उनका सिद्धांत अका्ट्य नहीं है। विज्ञान में कुछ भी अंतिम नहीं होता। इसीलिए वहां शोध और संशोधन की गुंजाइश सदा रहती है। अब मंत्री सत्यपाल ने जो कहा, वह उन्होंने इसके पहले भी कभी कहा था या नहीं पता नहीं, क्योंकि वे केमे‍स्ट्री में एमफिल भी हैं। एक सामान्य ज्ञान के व्यक्ति को उनकी यह बात आकर्षित कर सकती है कि दुनिया में मनुष्य, मनुष्य के रूप में ही आया।

धर्म-दर्शन की भाषा में कहें तो ईश्वर ने ही मनुष्‍य को अपना प्रतिनिधि बनाकर धरती पर भेजा। बाद में वह कई खटकरम करने लगा, यह अलग बात है। अर्थात मनुष्य ईश्वर का ही कमतर संस्करण या करप्ट फाइल है। वह अपने इस वजूद से भी खुश नहीं है और सदा ईश्वर जैसा होने की कोशिश में लगा रहता है। इस काम में उसकी मदद धर्म-अध्यात्म सदियों से करते आ रहे हैं। फिर भी इस सवाल का उत्तर बाकी है कि मनुष्य या ईश्वर से भी पहले क्या था? कौन से प्राणी थे, थे या नहीं, थे तो कहां से आए थे? उन्हें ईश्वर ने बनाया तो ईश्वर को किसने और क्यों बनाया? अगर वह स्वयंभू है तो स्वयंभू बनने की भी कोई प्रक्रिया होगी।

दरअसल यही सत्य की खोज है और उसी को खोजने में विज्ञान के साथ-साथ धर्म दर्शन और ज्ञान की दूसरी शाखाएं सदियों से लगी हैं। हमारे यहां यह जिम्मा अब राजनीति ने ले लिया है। सत्यपाल के बयान से लगता है कि उन्हें भी यह ‘ब्रह्म ज्ञान’ राजनीति में आने के बाद ही हुआ है। थोड़ी देर के लिए सत्यपाल के ‘सत्य’ को स्वीकार भी कर लें, तो हमें अपने ही पौराणिक ज्ञान को भी खारिज करना होगा।

भागवत पुराण में विष्णु का दशावतार आख्यान भी प्रकारांतर से डार्विन के सिद्धांत की पौराणिक व्याख्या ही है। ऋषि हमें बताते हैं कि जीवन की उत्पत्ति जल से हुई। जल में जीवन का बीज पड़ा तो मछली यानी मत्स्य अवतार आया। फिर जल-थलचारी कच्छप, फिर स्तनधारी वराह, फिर पशु और मनुष्य का मिश्रित रूप नरसिंह, फिर ब्राह्मण परशुराम, फिर क्षत्रिय मर्यादा पुरुषोत्तम राम, फिर यादव लीला पुरुषोत्तम कृष्ण और फिर बुद्धि के उपासक बुद्ध आए।

यह भी प्राणियों और मनुष्य का क्रमिक विकास ही तो है। फर्क इतना है कि डार्विन का निष्कर्ष प्रयोग और अवलोकन पर आधारित है और ऋषियों का आख्यान अपनी दिव्य दृष्टि से निकला है। यानी दशावतार को मानें तो मनुष्य का उद्भव और विकास जलीय प्राणियों से हुआ न कि सीधे ईश्वर ने उसे धरती पर पोस्ट किया। हमारे पुराणों में 84 लाख योनियों का जिक्र है और मनुष्य जन्म को पूर्व जन्म के पुण्यों का सर्वश्रेष्ठ फल माना गया है। अर्थात मनुष्य बनना सबसे कठिन और 84 लाख योनियों से गुजरने के बाद मिलने वाला बेस्ट गिफ्ट है।

अब सवाल यह है कि क्या सत्यपाल पुराणों से भी अनभिज्ञ हैं? बंदर से मनुष्य को बनते किसने देखा, यह सवाल कुछ उसी तरह का है कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा? अगर बंदर के मनुष्य में बदलने की कोई मायावी ‍ट्रिक है, तो हो सकता है कि उसका कोई जादूगर या दर्शक भी होता। प्राणियों का विकास बहुत धीमी प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल हैं। डार्विन के सिद्धांत में कुछ खामियां हैं, यह विज्ञान भी मानता है। लेकिन उसकी नीयत में ही खोट थी, यह कोई नहीं मानता।

और फिर सत्यपाल को यह सवाल अभी क्यों सूझा? इसका जवाब यही है कि डार्विन को खारिज करना भी राजनीतिक एजेंडे का ही हिस्सा है। यह एजेंडा अवैज्ञानिकता को हमारी संस्कृति मनवाने का एजेंडा भी है। यह सोच हमारे प्राचीन वैज्ञानिक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टि से रचे गए पौराणिक आख्‍यानों को भी नकारने वाली है।

(सुबह सवेरे से साभार)

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