ये घटनाएं छोटी नहीं, बहुत मोटी हैं, यह बात समझिए

मध्‍यप्रदेश में हरदा जिले की टिमरनी तहसील में बुधवार को हुई एक घटना ने सहसा ध्‍यान खींचा। नोटबंदी के घमासान के बीच वह घटना ज्‍यादा नोटिस में नहीं आई लेकिन उसके संकेतों को समझना जरूरी है। घटना यह है कि इलाके के विधायक डॉ. रामकिशोर दोगने का भारतीय किसान संघ ने सम्‍मान/ अभिनंदन किया। …वैसे जब तक और खुलासा न किया जाए तब तक आपको इस वाक्‍य में भी कोई असामान्‍य बात दिखाई नहीं देगी। लेकिन जैसे ही आपको यह बताया जाए कि डॉ. रामकिशोर दोगने कांग्रेस के विधायक हैं और उनका अभिनंदन/सम्‍मान करने वाला संगठन -भारतीय किसान संघ- राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ से वास्‍ता रखता है, तो आपके भी कान खड़े हो जाएंगे।

इसीलिए मैंने कहा कि इस खबर ने मेरा ध्‍यान खींचा। टिमरनी से जो खबर आई उसके मुताबिक भारतीय किसान संघ ने डॉ. दोगने का सम्‍मान इसलिए किया क्‍योंकि उन्‍होंने विधानसभा के हाल ही में संपन्‍न शीतकालीन सत्र में, फसल की लागत के आधार पर उपज का लाभकारी मूल्‍य किसानों को देने का मुद्दा उठाया था। संघ के नेता रेवाशंकर पटेल के मुताबिक डॉ. दोगने के अभिनंदन का फैसला तहसील कार्यकारिणी ने किया था और कार्यक्रम में राज्‍यस्‍तरीय पदाधिकारी भी मौजूद थे।

संगठन की विचारधारा के उलट कांग्रेसी विधायक का स्वागत किए जाने पर संघ नेताओं ने कहा कि हम वोट बैंक की राजनीति नहीं करते। जो किसानों की बात करेगा, हम उसी के साथ हैं। इतना ही नहीं पटेल ने तो यहां तक कह दिया कि यदि इस आयोजन को लेकर अनुसाशनहीनता की कोई कार्रवाई होती है तो वे उसका सामना करने को भी तैयार हैं।

उधर संघ के मंच से अपना स्‍वागत होने पर डॉ. दोगने ने कहा कि राजनीतिक दल किसानों को संगठित नहीं होने देना चाहते। कांग्रेस की सरकार होती तो भी वे किसानों के हित की लड़ाई लड़ते। जहां भी किसानों के हक की बात आएगी वे हमेशा उनके साथ रहेंगे। हालांकि इस आयोजन को क्षेत्र की जातिगत राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन कुल मिलाकर इसके संकेत समझने की जरूरत है।

मध्‍यप्रदेश ने खेती के मामले में पिछले कुछ सालों के दौरान अच्‍छी खासी तरक्‍की की है और यहां की कृषि विकास दर ने खेती किसानी में सालों से ऊपरी पायदान पर जमे रहने वाले देश के कई राज्‍यों को पीछे छोड़ दिया है। मध्‍यप्रदेश को लगातार कृषि कर्मण अवार्ड देकर केंद्र सरकार ने भी उसकी इस उपलब्धि को सार्वजनिक मान्‍यता दी है। लेकिन सरकारी आंकड़ों की किताब में कृषि की उच्‍च विकास दर के दर्ज होने और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पुरस्‍कृत होने की घटनाओं और जमीनी सच्‍चाई में मेल नहीं होने से कई बार यह संदेह पैदा होने लगता है कि आखिर सच क्‍या है?

ऐसा नहीं है कि भारतीय किसान संघ ने प्रदेश के किसानों की मांगों को लेकर पहली बार विरोधी रुख जताया हो। संघ पहले भी किसानों की मांगों को लेकर सरकार से दो-दो हाथ कर चुका है। एक बार तो संघ के किसानों ने अचानक रातों रात राजधानी पर धावा बोलकर मुख्‍यमंत्री आवास के पास ही डेरा डाल कर सरकार की सांसें फुला दी थीं।

टिमरनी का आयोजन भले ही राजनीतिक भव्‍यता या वैसी सरगर्मी लिए हुए न हो, लेकिन यह बताता है कि गांव और किसानों के बीच यह धारणा बन रही है कि सरकार के स्‍तर पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही। क्‍या टिमरनी का एक संकेत यह नहीं लिया जाना चाहिए कि भाजपा की ही विचारधारा से जुड़ा एक संगठन यह मान रहा है कि पार्टी के विधायक किसानों की समस्‍या को ठीक से सदन में नहीं उठा रहे। शायद इसीलिए उन्‍होंने अपनी बात उठाने वाले व्‍यक्ति का सार्वजनिक सम्‍मान कर डाला, यह जानते हुए कि वह विरोधी पार्टी का जन प्रतिनिधि है।

किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्‍य न मिल पाने का मुद्दा काफी पुराना है। मध्‍यप्रदेश में जब भी खेती को लाभ का धंधा बनाने की बात हुई है किसानों और उनके संगठनों की ओर से कहा गया है कि इसका सबसे बेहतर रास्‍ता उनकी फसल के मूल्‍य को लागत मूल्‍य से जोड़कर देखने का है। किसान लागत मूल्‍य को आधार बनाकर उस पर एक निश्चित प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ अपनी उपज का मूल्‍य चाहते हैं। जबकि वर्तमान व्‍यवस्‍था में लागत मूल्‍य को उस तरह से आधार नहीं बनाया जा रहा।

मध्‍यप्रदेश में ही सीहोर जिले के शेरपुर में इसी साल 18 फरवरी को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई फसल बीमा योजना की घोषणा की थी तब भी भारतीय किसान संघ का यही मत सामने आया था कि बीमा योजना आदि सिर्फ दिखावटी बातें हैं। यदि सरकार किसानों का भला ही चाहती है तो उनकी असली समस्‍या पर ध्‍यान दे। कृषि की लगातार बढ़ती लागत से खेती लाभ का नहीं बल्कि घाटे का सौदा होती जा रही है और इस घाटे की भरपाई के लिए किसान लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है। जब यह कर्ज उसकी चुकाने की क्षमता से बाहर हो जाता है, उसे अपनी जान देने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं सूझता और इस तरह किसानों की आत्‍महत्‍याओं का ग्राफ हर साल बढ़ता जाता है।

टिमरनी जैसी छोटी मोटी लगने वाली घटनाओं के राजनीतिक फलितार्थ सत्‍तारूढ़ दल के लिए गंभीर हो सकते हैं। उम्‍मीद की जानी चाहिए कि सरकार और सत्‍तारूढ़ दल इस बात को समझने के लिए भी थोडा समय निकालेंगे।

 

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