क्‍या मीडिया कौंसिल जैसी संस्‍था पर विचार नहीं होना चाहिए?

भारतीय जनता पार्टी की सरकार में इस बात को लेकर नाराजी है कि नोटबंदी जैसे क्रांतिकारी और देश की अर्थव्‍यवस्‍था के काले मिजाज को बदल देने वाले उसके फैसले को लेकर भी मीडिया उसके विरोध में पिला पड़ा है। भाजपा के शीर्ष नेताओं से लेकर प्रादेशिक नेताओं तक के सुर और बयानों में इस बात को बहुत शिद्दत से देखा और महसूस किया जा सकता है।

हम कह सकते हैं कि अटलजी के जमाने से लेकर अब तक भाजपा में काफी पानी बह गया है। विचारों और नीतियों में निरंतरता की जगह बदलाव की आंधी चल रही है। 1998 में पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में मीडिया को लेकर कहा था कि-

THE BJP believes that, a healthy polity and democracy can not survive without the support of an extra-political moral order which the democratic political order cannot itself impose on its citizens.

(भाजपा का विश्‍वास है कि स्‍वस्‍थ राजनीति और लोकतंत्र, राजनीति से इतर नैतिक व्‍यवस्‍था के समर्थन के बिना नहीं चल सकते। ऐसी नैतिक व्‍यवस्‍था, जो कोई भी लोकतांत्रिक या राजनीतिक प्रणाली अपने दम पर नागरिकों पर नहीं थोप सकती।)

भाजपा ने उस समय यह भी भरोसा दिलाया था कि-

Freedom of the Press shall be ensured and protected at all costs.

(प्रेस की आजादी को किसी भी कीमत पर सुनिश्चित और सुरक्षित रखा जाएगा)

लेकिन आज मीडिया और सरकार दोनों के ही सुर बदले हुए हैं। जिस नैतिकता की बात उस समय एक राजनीतिक दल ने की थी, वह नैतिकता आज न तो राजनीति में बची है और न ही मीडिया में दिखाई देती है। एक राजनीतिक दल ने तो चुनावी घोषणा पत्र में ही सही, अभिव्‍यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार को सम्‍मान देते हुए, हर कीमत पर प्रेस की आजादी की रक्षा करने का वायदा किया था। लेकिन क्‍या आज मीडिया ऐसा कोई घोषणा पत्र जारी करने की स्थिति में है कि वह सिर्फ और सिर्फ देशहित और लोककल्‍याण को ही केंद्र में रखकर काम करेगा और किसी भी कीमत पर… (मैं दोहराना चाहूंगा)… किसी भी कीमत पर इन मूल्‍यों की रक्षा करेगा।

पिछले 18 सालों में देश की नालियों में बहुत गंदगी बह चली है। बीते कुछ सालों में मीडिया और राज्‍य व्‍यवस्‍था के बीच रिश्‍तों और रवैये में बहुत बदलाव आया है। मीडिया ने जहां निरंकुश होने की कोशिश की है, वहीं राज्‍य व्‍यवस्‍था ने अपने अंकुश को और अधिक तीखा बनाने के लिए लगातार सान पर चढ़ाया है। इसलिये आज के सूचना और प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू यदि संचार और मीडिया नीति बनाने की बात करते हैं तो बहुत सारे प्रश्‍न और बहुत सारी शंकाएं एक साथ उठ खड़ी होती हैं।

आज का मीडिया गुणवत्‍ता के आधार पर परिभाषित किए जाने के बजाय उसे चलाने वाले घरानों या व्‍यक्तियों की आर्थिक क्षमता और रसूख के आधार पर परिभाषित किया जा रहा है। इसीलिए गुणवत्‍तापूर्ण काम करने के बावजूद कोई अखबार छोटा है और अगुणवत्‍तापूर्ण या छिछोरा होने के बावजूद कोई अखबारबड़ा। बड़े और छोटे के मायने चूंकि अखबार के रसूख और जेब की ताकत से जुड़े हैं, इसलिए बाजार हो या सरकार, दोनों का प्रश्रय भी ऐसे ही प्रकाशनों या प्रसारणों को मिलता है।

दुख की बात तो यह है कि मीडिया से जिम्‍मेदार और निष्‍पक्ष रहने की अपेक्षा रखने वाला समाज भी गुणवत्‍तापूर्ण मीडिया को संरक्षण नहीं दे रहा।

भारतीय समाज में लोकसेवा और लोककल्‍याण के अनेक उपक्रम बगैर राज्‍याश्रय के चलते रहे हैं। ऐसे उपक्रमों को समाज ने आगे बढ़कर सहयोग भी किया है और उन्‍हें संरक्षित और सुरक्षित भी रखा है। लेकिन दुर्भाग्‍य से मीडिया को ऐसा कोई संरक्षण नहीं मिल रहा। बाजार ने ऐसी स्थितियां निर्मित कर दी हैं कि जीवन मूल्‍यों की बात करने वाले मूल्‍यहीन हैं और बाजार मूल्‍य वाले अनमोल हुए जा रहे हैं। यहां कलेक्‍टर गाइडलाइन जैसी कोई व्‍यवस्‍था नहीं है कि इससे कम कीमत पर चीज नहीं बिकेगी…

लेकिन इसके बावजूद मेरा मानना है कि बदली हुई परिस्थितियों में संचार और मीडिया नीति पर खुलकर बात होनी चाहिए। अकसर यह बात उठती रही है कि वर्तमान प्रेस कौंसिल नखदंत विहीन संस्‍था है। उसे और अधिकार संपन्‍न एवं प्रभावी बनाया जाना चाहिए। हालांकि मैं इस विचार से कतई सहमत नहीं हूं कि किसी भी लोकतांत्रिक संस्‍था को फाड़कर खा जाने वाला जंतु बना दिया जाए। मेरे विचार में जब हम ऐसी संस्‍थाओं को नखदंत युक्‍त बनाने की बात करते हैं तो, कहें या न कहें, लेकिन सोच ऐसा ही रहे होते हैं कि उस संस्‍था में लोगों को फाड़कर खा जाने वाली ताकत होनी चाहिए।

प्रेस कौंसिल का जब गठन किया गया था तो उस समय मुख्‍यत: अखबार और पत्र-पत्रिकाएं ही हुआ करती थीं। अब चूंकि मीडिया का स्‍वरूप बदल गया है और उसमें इलेक्‍ट्रॉनिक से लेकर सोशल/डिजिटल, हर तरह का मीडिया शामिल हो गया है इसलिए बेहतर होगा कि प्रेस कौंसिल की जगह मीडिया कौंसिल का गठन हो, जिसके पास खबरों की दुनिया से वास्‍ता रखने वाले हर क्षेत्र पर निर्णय लेने का अधिकार हो।

आगे बात करेंगे मीडिया कौंसिल और उससे जुड़े मुद्दों की…

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