कोटा का यह सच और भयावह है

रमेश सर्राफ धमोरा

कोटा शहर के हर चौक-चौराहे पर छात्रों की सफलता से अटे पड़े बड़े-बड़े होर्डिंग्स बताते हैं कि कोटा में कोचिंग ही सब कुछ है। ये हकीकत है कि कोटा में सफलता का स्ट्राइक रेट तीस परसेंट से उपर रहता है और देश के इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप टेन में कम से पांच छात्र कोटा के ही रहते हैं। लेकिन कोटा का और सच भी है जो भयावह है। एक बड़ी संख्या उन छात्रों की भी है जो असफल हो जाते हैं और उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी असफलता बर्दाश्त नहीं कर पाते।

कोटा में छोटे-बड़े मिलाकर करीब डेढ़ सौ कोचिंग सेन्टर हैं। यहां तक कि दिल्ली, मुंबई के साथ ही कई विदेशी कोचिंग संस्थाएं भी कोटा में अपना सेंटर खोल रही हैं। सफलता की बड़ी वजह यहां के शिक्षक हैं। आईआईटी और एम्स जैसे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढऩे वाले छात्र बड़ी-बड़ी कम्पनियों और अस्पतालों की नौकरियां छोडक़र यहां कोचिंग संस्थाओं में पढ़ाने आ रहे हैं क्योंकि यहां तनख्वाह कहीं ज्यादा है। अकेले कोटा शहर में 70 से ज्यादा आईआईटी स्टूडेंट छात्रों को पढ़ा रहे हैं। कोटा के एलन कोचिंग का नाम तो लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में है। इसमें अकेले एक लाख छात्र पढ़ते हैं, इतने छात्र तो किसी यूनिवर्सिटी में भी नहीं पढ़ते।

हाल ही में बच्‍चों पर पढ़ाई के दबाव और तनाव को दूर करनेके लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक मोबाइल पोर्टल और ऐप लाने का इरादा जताया है, ताकि इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए कोचिंग की मजबूरी खत्म की जा सके। चूंकि इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम, आयु,  अवसर और परीक्षा का ढांचा कुछ ऐसा है कि विद्यार्थियों के सामने कम अवधि में कामयाब होने की कोशिश एक बाध्यता होती है इसलिए वे सीधे-सीधे कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं।

ऐसे में मोबाइल पोर्टल और ऐप की सुविधा उपलब्ध हो जाने से इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी के लिए विद्यार्थियों के सामने कोचिंग के मुकाबले बेहतर विकल्प खुलेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की पहल कोचिंग संस्थानों के वर्चस्व को तोडऩे में सहायक साबित होगी। जिन्‍होंने बच्‍चों में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भविष्य बनाने के प्रति बढ़ते आकर्षण को देखते हुए इसकी तैयारी को पूरी तरह बाजार आधारित बना डाला है।

आत्महत्याओं की घटना में बढ़ोतरी को देखते हुए कोटा हॉस्टल एसोसिएशन ने भी कुछ जरूरी कदम उठाने का फैसला किया है। इस फैसले के मुताबिक अब हॉस्टल के सभी कमरों में एक स्प्रिंग उपकरण और एक सायरन कमरे में लगे पंखों के साथ जोड़ा जाएगा। गौरतलब है कि निराशा और डिप्रेशन के चलते ज्य़ादातर छात्र आसान तरीका अपनाते हुए हॉस्टल रूम के पंखे से लटककर ही आत्महत्या करते हैं।

कोटा हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष नवीन मित्तल के मुताबिक, हॉस्टल रूम के पंखे में सीक्रेट स्प्रिंग उपकरण और सायरन सेंसर लगाने से ऐसी आत्‍महत्‍याओं में कमी आएगी। ये सीक्रेट स्प्रिंग उपकरण 20 किलो से ज़्यादा वजन उठाने में सक्षम नहीं होगा, 20 किलो से ज्यादा वजनी चीज का इस्तेमाल होने पर ये अपने आप नीचे गिर जाएगा। इसके अलावा पंखे में मौजूद सीक्रेट सेंसर भी एक्टिव हो जाएंगे जिससे प्रशासन को फौरन खबर लग जाएगी।

कोटा की पूरी अर्थव्यवस्था कोचिंग पर ही टिकी है। इस शहर की एक तिहाई आबादी कोचिंग से जुड़ी हैं। ऐसे में कोचिंग सिटी के सुसाइड सिटी में बदलने से यहां के लोगों में भी घबराहट है, कि कहीं छात्र कोटा से मुंह न मोड़ लें। इसे देखते हुए प्रशासन, कोचिंग संस्थाएं और आम शहरी इस कोशिश में लग गए हैं कि आखिर छात्रों की आत्महत्याओं को कैसे रोका जाए। यदि कोटा में पढऩे वाले छात्रों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं पर शीघ्र ही रोक नहीं लगी तो यहां का एक बार फिर वही हाल होगा जो कुछ साल पहले यहां के कल-कारखानों में तालाबन्दी होने के चलते आए आर्थिक संकट के कारण हुआ था।

ऐसी नौबत न आने देने के लिए जहां प्रशासन ने कायदे कानून बनाना शुरू किया है, वहीं कोचिंग संस्थाएं भी अपने यहां छात्रों के लिए मनोरंजन के साधनों की व्यवस्था के अलावा हेल्प लाइन भी शुरू कर रही हैं।

 

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