आज की कविता- ‘मौसम की बात’ 

मौसम की बात
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भटक गया था कोई बादल, बरस गया
मुंह में डाल गया गंगाजल, बरस गया
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चटक रहा था गला प्यास से धरती का
तरस खा गया थोड़ा सा कल बरस गया
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इंद्रजीत की अजब सियासत है साहिब
धोखे से ही उसका कुछ छल बरस गया
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कल फिर बरसेगा इसकी क्या गारंटी
आज भिगोकर सबका आँचल, बरस गया
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खुशनसीब या बदनसीब है पता नहीं
लेकिन जैसे-तैसे कुछ पल बरस गया
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धन्यवाद दूँ या फिर लिखूं कशीदे मैंं
बेझिझक ही पागल, अविरल बरस गया
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@ राकेश अचल की फेेेसबुक वॉल से साभार 

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