कौन ले डूबा तोगडि़या के कॅरियर का जहाज

अजय बोकिल

इधर राजस्थान सरकार ने विवादास्पद हिंदू नेता प्रवीण तोगडि़या पर दर्ज आपराधिक प्रकरण ताबड़तोड़ ढंग से वापस लिए, उधर विश्‍व हिंदू परिषद ने अपने ही अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का एक झटके में पत्ता साफ कर दिया। विहिप मार्गदर्शक मंडल के सदस्य स्वामी चिन्मयानंद ने ‘कौन तोगडिया’ जैसे प्रश्नवाचक भाव से कहा कि तोगडि़या का विश्व‍ हिंदू परिषद से अब कोई सम्बन्ध नहीं है। संघ और विहिप में अनुशासनहीनता अक्षम्य है। तोगडिया जैसे खुद को घोर हिंदूवादी मानने वाले नेता के लिए यह बहुत बड़ा झटका है। उनकी उड़ती पंतग बीच में ही काट दी गई।

स्वामी चिन्मयानंद के बयान के बाद फायर ब्रांड तोगडिया की कोई टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन वो उन्माद, उत्तेजना और अति महत्वाकांक्षा के अपने ही बिछाए जाल में फंसकर ध्वस्त हो चुके हैं। तोगडिया प्रकरण का लुब्बो-लुआब कुल इतना है कि कोई भी व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं है और जब तक व्यक्ति की उपयोगिता है तभी तक उसका वजूद है।

बासठ वर्षीय तोगडिया का ताजा ड्रामा खुद को बचाने की आखिरी कोशिश थी। इसमें उन्होंने अपने पुराने दोस्त और महत्वाकांक्षाओं के टकराव के चलते बाद में दुश्मन बन चुके नरेन्द्र मोदी पर जिस ढंग से आरोप लगाए और खुद जान बचाकर भागने की नौटंकी की, उससे साफ हो गया था कि उनके दिन अब गिनती के हैं। एक समय था जब प्रवीण तोगडिया विश्व हिंदू परिषद से एकाकार समझे जाते थे। दस वर्ष की उम्र में आरएसएस और फिर विश्व हिंदू परिषद से जुड़े प्रवीण तोगडिया पेशे से डॉक्‍टर हैं। कहा जाता है कि वे विहिप की व्यस्तताओं के बीच भी कुछ समय कैंसर पेशेंट्स को देखने के लिए निकाल लेते थे।

गुजरात दंगों के बाद उन्हें विश्व हिंदू परिषद का महासचिव और सात साल पहले अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। गुजरात में भाजपा की जड़ें मजबूत करने में तोगडिया की भी अपनी भूमिका रही है। उन्होंने हिंदू वोटों की फसल को अपने अंदाज से सींचा। हेट स्पीच के सबसे ज्यादा आरोप तोगडिया के खाते में कहे जाते हैं। माना जाता है कि मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले दोनों में खासी दोस्‍ती थी। तोगडिया के कहने पर उनके दाएं हाथ समझे जाने वाले गोवर्द्धन झडफिया को मोदी ने प्रदेश में गृह राज्य मंत्री बनाया। लेकिन जल्द ही हटा दिया, क्योंकि तोगडिया की प्रशासन में दखलंदाजी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी।

माना जाता है कि यहीं से दोनों के बीच अदावत की गांठ पड़ी। मोदी सरकार को खुद और अकेले चलाने में भरोसा रखते हैं। वहां किन्हीं तोगडियाओं के लिए कोई जगह नहीं है। इसके बाद गुजरात में मोदी सरकार और तोगडिया की विहिप में ठन गई। कहा तो यहां तक जाता है कि हाल के विधानसभा चुनाव में गुजरात में भाजपा की पतली हालत के पीछे तोगडिया की खुली बगावत थी।

एक जमाना था, जब तोगडिया के भड़कीले भाषणों को मीडिया में जस का तस दिखाना या छापना दुस्साहस का काम हुआ करता था। सबसे ज्यादा संपादन उन्हीं के बयानों का होता था। तोगडिया पर नफरत भरे भाषण देने तथा लोगों को भड़काने  के 19 मामले दर्ज हैं। चूंकि तब भाजपा को तोगडिया के भाषणों से ‘फायदा’ हो रहा था, इसलिए उन्हें देश भर में इसी मिशन पर लगाया गया था। इसमें राम मंदिर का समर्थन प्रमुख था। धीरे धीरे तोगडिया की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगी। वे स्वयं को समांतर सत्ता मानने लगे। तीन साल पहले उन्होंने गुजरात में हिंदुओं से पड़ोसी मुसलमानों को मार भगाने की अपील तक कर डाली थी, जिस पर भाजपा प्रवक्ता राम माधव को कहना पड़ा कि कोई स्वयं सेवक ऐसा नहीं कह सकता।

हाल में तोगडि़या द्वारा खुद को मरवाने का षड्यंत्र रचने का आरोप सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगाने से संघ और विहिप भी नाराज हो गए थे। मोदी और तोगडिया में पहले प्रतिद्वंद्विता रही भी होगी, लेकिन अब दोनों के कद में जमीन आसमान का अंतर है। मोदी तोगडिया से कई गुना बड़े हिंदुत्व ब्रांड बन चुके हैं। ऐसे में तोगडिया को खत्म करने से भी उन्हें कौन सा लाभ होना था। हालांकि बहुत से लोग इसे प्रतिशोध की राजनीति का परिणाम भी मानते हैं, जहां विवादी स्वर के लिए गुंजाइश नहीं है। उधर संघ भी तोगडिया को विहिप कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटाना चाहता था, लेकिन तोगडिया उसे ही अपनी ढाल बनाए हुए थे।

अब सवाल यह है कि क्या तोगडिया का हश्र भी गोवा के सुभाष वेलिंगकर जैसा होगा? वेलिंगकर ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत आजमाकर देख ली। थोड़ा नुकसान पहुंचाया। लेकिन वो खुद अब हाशिए पर हैं। तो क्या तोगडिया विपक्ष की राजनीति करेंगे या फिर अपना कोई संगठन खड़ा करेंगे? जो भी करें, लेकिन उन्हें अपने ही मातृ संगठन के खिलाफ खड़ा होना होगा। यह कोई आसान काम नहीं है। आखिर कोई भी संगठन बगावत को बर्दाश्त नहीं करता और न ही व्यक्ति को संगठन से बड़ा होने की इजाजत देता है। संघ जैसा संगठन तो कदापि नहीं।

लेकिन तोगडिया ने यह जानते हुए भी बगावत की राह चुनी तो इसके पीछे कुछ न कुछ कारण होगा। जिस तरह उन्होंने एक पत्रकार वार्ता में जार जार आंसू बहाए, वह उनके आग लगाऊ भाषणों की फितरत के उलट है। खुद सुरक्षा घेरे में रहकर शब्दों के अग्निबाण चलाना आसान है, क्योंकि आप उसकी प्रतिक्रिया से बचे रहते हैं। लेकिन यही बाण जब बूमरेंग होते हैं तो हाल तोगडिया जैसा होता है।

(सुबह सवेरे से साभार)

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