पता तो चले कि समर्थन या विरोध कर कौन रहा है?

पत्रकारिता या मीडियाकारिता (इसी तर्ज पर पत्रकार के बजाय मीडियाकार शब्‍द का इस्‍तेमाल भी हो सकता है) में गुणवत्‍ता को लेकर बहुत सवाल उठाए जाते रहे हैं। इसलिए मीडिया कौंसिल को भी ऐसी इकाई के रूप में गठित किया जाए जैसी बार कौंसिल या मेडिकल कौंसिल हैं। मीडिया कौंसिल की ओर से ही मीडियाकारों को मीडियाकारिता की सनद मिले या कि उनका इस काम के लिए पंजीयन हो। जिस तरह कदाचरण पर बार कौंसिल या मेडिकल कौंसिल अपने सदस्‍यों को संबंधित काम करने से प्रतिबंधित या निलंबित कर सकती हैं, वैसे ही मीडिया के मामले में भी किया जा सकता है। मीडिया कौंसिल राष्‍ट्रीय स्‍तर पर तो हो ही लेकिन इसका विकेंद्रीकरण करते हुए राज्‍य स्‍तर पर भी इसकी इकाइयां गठित की जाएं।

चूंकि ऐसी संस्‍थाओं का गठन संसद की सहमति से ही हो सकता है इसलिए इस सबंध में सभी दलों से विचार विमर्श कर विस्‍तृत बिल ससंद में पेश किया जाए। उस बिल में अनिवार्य रूप से यह व्‍यवस्‍था हो कि मीडिया कौंसिल के गठन में सरकार का हस्‍तक्षेप कम से कम रहेगा और समाज व मीडिया जगत का अधिक। इसमें आनुपातिक प्रतिनिधित्‍व जैसी व्‍यवस्‍था की जा सकती है। मान्‍य पत्रकार संगठनों के प्रतिनिधियों के अलावा कुछ स्‍थान इसमें जनता की राय से नामांकित किए जाने वाले मीडियाकारों अथवा मीडिया विशेषज्ञों के लिए भी रखे जाएं।

वैसे तो धीरे धीरे यह होने लगा है कि मीडिया में आने वाले लोग उनकी शैक्षिक अथवा कौशलजन्‍य योग्‍यता के आधार पर ही काम पा रहे हैं, लेकिन मीडिया कौंसिल मीडिया क्षेत्र में आने वाले लोगों के लिए न्‍यूनतम शैक्षिक योग्‍यता आदि का भी निर्धारिण करे। जो क्षेत्र समाज को दिशा देने के लिए जिम्‍मेदार माना जाता है, वहां यह विडंबना ही है कि कोई भी व्‍यक्ति, चाहे वह बिलकुल भी पढ़ा लिखा क्‍यों न हो, अखबार निकाल भी सकता है और उसका संपादक भी हो सकता है। इस क्षेत्र के लिए न्‍यूनतम शैक्षिक योग्‍यता अनिवार्य होनी ही चाहिए, फिर भले ही मीडिया में काम करने का मामला हो या फिर मीडिया का कोई उपक्रम आरंभ करने का।

पत्रकारिता विश्‍वविद्यालयों व अन्‍य शिक्षा संस्‍थाओं द्वारा संचालित मीडिया शिक्षण के पाठ्क्रम में भी बुनियादी रूप से एकरूपता सुनिश्चित होनी चाहिए। इसका निर्धारण भी मीडिया कौंसिल के जरिए किया जा सकता है। कौंसिल, मीडिया शिक्षा की गुणवत्‍ता सुनिश्चित करने के लिए समय समय पर मीडिया शिक्षण संस्‍थानों का निरीक्षण भी करे।

एक मुद्दा मीडिया के खिलाफ आने वाली शिकायतों की सुनवाई का है। किसी भी मीडिया संस्‍थान या मीडियाकार द्वारा मान्‍य नैतिक अथवा कानूनी प्रावधानों के उल्‍लंघन पर जब भी विवाद होता है, स्‍वनिर्धारित आचार संहिता की बात होती है। लेकिन इसके बजाय यह काम मीडिया कौंसिल जैसी किसी संस्‍था के पास ही होना चाहिए। इस बात का कोई अर्थ नहीं कि मीडिया चोर भी हो और थानेदार भी, वही मुद्दई हो और मुंसिफ भी।

इन दिनों सबसे बड़ा और विवादास्‍पद क्षेत्र है डिजिटल अथवा मोबाइल मीडिया का। समाज की व्‍यापक भागीदारी के चलते शुरुआती दौर में इसे सोशल मीडियानाम दे दिया गया था, लेकिन अब यह उस मायने में सोशल नहीं रह गया है। इसकी सबसे बड़ी कमी, कमजोरी या बुराई यह है कि इसमें शिखंडियों की भरमार होती जा रही है। लोग अपनी सही पहचान को छुपाकर समाज की शांति, सौहार्द, सद्भाव, सहिष्‍णुता और एकता को खंडित करने वाली गतिविधियां चला रहे हैं। ऐसे लोगों का बेनकाब होना बहुत जरूरी है।

मेरे विचार में किसी कानूनी संशोधन के जरिए यह व्‍यवस्‍था होनी ही चाहिए कि जो भी व्‍यक्ति कथित सोशल मीडिया पर नमूदार हो रहा है, चाहे वह फेसबुक पर हो, ट्विटर पर या वाट्सएप आदि पर, उसे उसकी वास्‍तविक पहचान बतानी ही होगी। इस पहचान को सुनिश्चित करने के लिए आधार नंबर या ऐसे ही किसी और दस्‍तावेज का सहारा लिया जा सकता है। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि जब तब संबंधित एजेंसी उस व्‍यक्ति की वास्‍तविक पहचान या उसके अस्तित्‍व की पुष्टि न कर ले उसे ऐसे किसी डिजिटल मीडिया पर रजिस्‍टर न होने दिया जाए।

इसी तरह कथित सोशल या डिजिटल मीडिया पर यदि कोई व्‍यक्ति लगातार अपराध की श्रेणी में आने वाली या समाज को हानि पहुंचाने वाली गतिविधि में लिप्‍त पाया जाता है तो उसे आरंभिक तौर पर सांकेतिक दंड देने के बाद, उसके न सुधरने की दशा में, उसे ऐसे सभी प्‍लेटफार्म पर आजीवन प्रतिबंधित किया जा सकता है। इस तरह की निगरानी और दंड का अधिकार भी मीडिया कौंसिल को दिया जा सकता है।

ये निगरानी इसलिए आवश्‍यक है ताकि लोग ऐसे सामाजिक मंचों पर चुपचाप पेट्रोल बम फेंककर भाग खड़े न हो सकें। किसी भी मुद्दे पर उनका समर्थन या विरोध वास्‍तविक है या फर्जी यह पता चलना ही चाहिए। कोई यदि नोटबंदी फैसले से सहमत है या असहमत तो दुनिया को पता तो चले वह व्‍यक्ति है कौन और क्‍या है? ऐसा किए जाने पर बिना वजह हवा बनाने और हवा बिगाड़ने वाले दोनों ही समाज के सामने बेनकाब होंगे। उधर समाज, सरकार और नीतिकारों को भी यह जानने और समझने में सुविधा रहेगी कि जो बात कही जा रही है वह कितनी यथार्थ है और कितनी फर्जी। इससे बात का असर भी अपेक्षाकृत अधिक होगा, जो सोशल मीडिया के लिए फायदेमंद भी है और शायद उसका अभीष्‍ट भी।

आगे बात करेंगे मीडिया की नैतिकता/अनैकिता और नीति की… 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here