अजी कौनसा सिद्धांत, आप तो विस्‍तार के लड्डू खाइए

गिरीश उपाध्‍याय

मोदी मंत्रिमंडल के विस्‍तार पर दिल्‍ली और बाकी राज्‍यों से ज्‍यादा मध्‍यप्रदेश के नेताओं की नजर थी। यह नजर भी इस बात पर नहीं थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्‍यप्रदेश से किसको मंत्रिमंडल में ले रहे हैं। नए मंत्री बनाए जाने वाले ज्‍यादातर लोगों के नाम तो देर रात तक वाट्स एप के ‘खोजी वीर’ दुनिया जहान को बता चुके थे। यहां तो उत्‍सुकता इस बात की थी कि 75 साल के फार्मूले का नई दिल्‍ली में क्‍या असर होता है।

यही वजह थी कि विस्‍तार हो जाने के बाद परंपरानुसार मोदीजी के प्रति आभार प्रकट करने के लिए जब मध्‍यप्रदेश भाजपा अध्‍यक्ष ने मीडिया वालों को बुलाया तो उनसे ज्‍यादातर लोगों ने यही सवाल पूछा कि 75 साल की उम्र वाले जिस फार्मूले के तहत मध्‍यप्रदेश मंत्रिमंडल के विस्‍तार में बाबूलाल गौर और सरताजसिंह से इस्‍तीफा ले लिया गया वह फार्मूला नजमा हेपतुल्‍ला और कलराज मिश्र पर दिल्‍ली में लागू क्‍यों नहीं हुआ? इस पर अध्‍यक्षजी ने बहुत मासूम जवाब दिया। वैसे भी अध्‍यक्षजी दो ही तरीके से जवाब देते हैं, या तो मासूम जवाब या पत्‍थरमार जवाब। तो इस बार मासूम जवाब आया- मेरी जानकारी के हिसाब से इन दोनों नेताओं की उम्र अभी 75 साल नहीं हुई है।

जब मुझे इस जवाब की जानकारी लगी तो चौंका। खुद को दुरुस्‍त करने के लिए लोकसभा और राज्‍यसभा की आधिकारिक वेबसाइट देखी। उसमें कलराज मिश्र की जन्‍म तारीख एक जुलाई 1941 और नजमा हेपतुल्‍ला की 13 अप्रैल 1940 लिखी है। यानी दोनों 75 साल के हो चुके हैं।

कोशिश की कि संसद की वेबसाइट पर दर्ज ये तारीखें बताकर अध्‍यक्षजी या भाजपा के किसी ओहदेदार से बात करूं लेकिन ऐसा हो पाना इन दिनों हम जैसे परंपरागत पत्रकारों के लिए बड़ा मुश्किल है। तो सोचा कि कल्‍पना ही कर ली जाए कि अपनी भाजपा के किसी आला नेता से बात हो रही है। उस बातचीत में सवाल तो वही होता जो अध्‍यक्षजी से पूछा गया था, लेकिन जवाब शायद कुछ इस तरह का मिलता-

भई आप भी गजब करते हैं। अव्‍वल तो आप एक महिला मंत्री को उम्र के आधार पर मंत्रिमंडल से निकालने का सवाल उठा रहे हैं। महिलाओं की उम्र आज तक किसने पूछी है, और कभी पूछी है तो किसे उसका जवाब मिला है और यदि जवाब भी मिला है, तो कौन कह सकता है कि वह सही ही है… उम्र के मामले में महिलाओं को हमेशा संदेह का लाभ दिया जाता रहा है। तो भाजपा ने यदि एक महिला मंत्री को उम्र के इस झंझट से मुक्ति दे दी तो बाकी लोगों के पेट में क्‍यों दर्द उठ रहा है। इसे महिलाओं के प्रति सकारात्‍मक दृष्टिकोण मानने या इसे महिला सशक्तिकरण के लिहाज से देखना तो दूर, आप लोग इसकी आलोचना में लग गए हैं।

और कलराज मिश्र की तो आप बात ही मत करिए। बेचारे कलराज जी की तो भाई लोग ‘गोल्‍डन जुबली’ के समय से ही ‘प्‍लेटिनम जुबली’ मनाने लगे थे। वे मंत्रिमंडल में आए भी नहीं थे कि लोगों ने उन पर ‘आडवाणी-जोशी’ फार्मूला लागू करने की कोशिश शुरू कर दी थी। उन्‍हें जाने कितने समय से 75 साल का बूढ़ा बताया जा रहा है। जबकि वे अभी ठीक सात दिन पहले तक मंत्री बने रहने लायक जवान थे। वे पिछली एक जुलाई को ही 75 साल के हुए हैं। तो क्‍या उन्‍हें साल छह माह का ग्रेस नहीं दिया जा सकता। हमारे यहां तो सब्‍जी वाला भी चार आठ आने का धनिया मिर्ची सब्‍जी के साथ यूं ही पटक देता है। जिस व्‍यक्ति ने राजनीति की इतनी लंबी पारी खेली हो, उसके लिए पार्टी का कुछ फर्ज बनता है या नहीं। और ऐसे समय जब उत्‍तरप्रदेश जैसे राज्‍य में चुनाव सिर पर हों और जहां मुस्लिम और ब्राह्मण दोनों वर्गों को साधने की जरूरत हो वहां पार्टी को क्‍या किसी पागल कुत्‍ते ने काटा है जो नजमा और कलराज को मंत्रिमंडल से बाहर करे। कलराज जैसे लोगों के पास वो कल होती है जिससे कोई भी बंद दरवाजा खोला जा सके। ऐसे लोगों के लिए तो पार्टी के हजार सिद्धांत कुर्बान। और वैसे भी प्रश्‍न जब जीत का हो तो फिर सिद्धांत विद्धांत कुछ मायने नहीं रखते। सिद्धांत कौन बनाता है, पार्टी ही ना। यदि पार्टी के हित में सिद्धांत को थोड़ा किनारे कर दिया तो इसमें इतनी हायतौबा मचाने की क्‍या जरूरत है। वैसे भी यह हमारी पार्टी का अंदरूनी मामला है। आप पूछने वाले कौन होते हैं कि हम कौनसा सिद्धांत बनाएं और कौनसा नहीं, और बना भी लें तो किस पर अमल करें और किस पर नहीं।

जहां तक गौर साहब और सरताज सिंह का सवाल है उन्‍हें भी तो ग्रेस पीरियड दिया गया था। जो लोग इतना हल्‍ला मचा रहे हैं वे यह क्‍यों भूल गए कि 75 साल की उम्र तो गौर साहब 12 साल पहले और सरताज सिंह साल भर पहले ही पार कर चुके थे, फिर भी पार्टी ने उन्‍हें टिकट देकर मंत्री बनाया कि नहीं… इस 75 साला फार्मूले को न तो पार्टी के माथे पर चिपकाने की जरूरत है और न ही अपनी छाती से। आप तो विस्‍तार के लड्डू खाइए।

इतने लंबे जवाब के बाद और कुछ पूछने की हिम्‍मत बाकी नहीं रहती। मैं यह सोचते हुए लौट आता, शायद इन्‍हें ही ‘अच्‍छे दिन’ कहते हैं….

 

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