डॉ. भागवत के कथन में गलत क्‍या है?

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक मोहन भागवत का अपने स्‍वयंसेवकों के बीच का एक संबोधन क्‍या सामने आया, लग रहा है जैसे देश का एक धड़ा उबल उठा है। उबले भी क्‍यों न, संविधान ने अपने मौलिक अधिकार में वाक की स्‍वतंत्रता जो सभी को प्रदान की है। किंतु इस उबलतेपन में एक बात समझ नहीं आ रही, वह यह है कि डॉ. भागवत ने कोई नई बात तो कही नहीं है। संघ तो राष्‍ट्र सेवा के लिए परतंत्र भारत के समय से ही अपने कार्यों में व्‍यस्‍त है। देश में बनी स्‍वतंत्र भारत की पहली सरकार हो या अब की सरकार सभी ने सार्वजनिक रूप से निरंतर संघ के सेवा कार्यों और देश के लिए उसके स्‍वयंसेवकों के बलिदान हो जाने के जज्‍बे को नमन किया है।

अव्‍वल तो भागवतजी के इस वक्‍तव्‍य के बाद से जहां भी उनके भाषण का विरोध हो रहा है और जो कर रहे हैं, उन्‍हें पहले उनका पूरा उद्बोधन ध्‍यानपूर्वक सुनना चाहिए,फिर उस पर कोई प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार होना चाहिए था, फिर भी यदि उन्‍हें नहीं मालूम है तो वे यह जान लें कि आखिर सरसंघ चालक भागवतजी ने कहा क्‍या है। वस्‍तुत: उन्‍होंने कहा है कि उनके स्वयंसेवक देश की रक्षा के लिए तैयार हैं। देश को जरूरत पड़ी और संविधान इजाजत दे, तो तीन दिनों में ही वे सेना के रूप में मातृभूमि की रक्षा के लिए तैयार हो जाएंगे।

भारत-चीन युद्ध का हवाला देते हुए आगे उन्‍होंने यह भी कहा कि सिक्किम सीमा क्षेत्र में तेजपुर में पुलिस थाने से सिपाहियों का पलायन हो गया था। उस समय सीमा पर सेना के जवानों के आने तक संघ के स्वयंसेवक डटे रहे थे। स्वयंसेवकों ने नागरिकों का हौसला बंधाया, ताकि लोग वहां से भागें नहीं। स्वयंसेवकों को जब भी, जो भी जिम्मेदारी मिली, उन्होंने पूरी तत्परता से उसका निर्वाह किया है। अब बताइये इसमें गलत क्‍या कहा है? इतिहास का ये एक सच है, जिसे मोहन भागवत ने अपने स्‍वयंसेवकों के बीच व्‍यक्‍त किया है।

आज क्‍या कोई सरसंघ चालक की इस बात से इंकार कर सकता है कि संघ की शाखा में नौजवानों को खेलकूद, शारीरिक प्रशिक्षण से लेकर अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित होने का संस्कार मिलता है। भारतीय जीवन मूल्यों की समझ बढ़ती है। जब वे कहते हैं कि सामाजिक समरसता का माहौल सिर्फ बातों से नहीं बल्कि, व्यवहार से पैदा होगा। स्वयंसेवकों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने आचरण से वो कर दिखाएं जिससे सामाजिक समरसता का वातावरण बने।

संघ एक परिवार है, जहां सभी का उनकी योग्यता के अनुसार स्नेह एवं सम्मान है, लेकिन भारत माता के लिए सभी बराबर हैं। भारत देश की विशेषता, विविधता में एकता है। हमारे देश में तमाम बोली व भाषाएं हैं। विविध संस्कृति वाले अपने देश में अनेकता में एकता हमारी पहचान है। इसे बनाए रखने के लिए देश की एकता व अखंडता जरूरी है। इसके लिए स्वयंसेवकों को समर्पित भाव से काम करना होगा। इसमें वह क्‍या गलत कह गए?

अब बात करते हैं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस और उन सभी की जो सरसंघ चालक के इस उद्बोधन का विरोध यह कहते हुए कर रहे हैं कि संघ ने सेना से अपनी तुलना क्‍यों की? वस्‍तुत: जो इस वक्‍त संघ के विरोध में खड़ा है, उसे एक बार अवश्‍य ही संघ के त्‍याग और देशप्रेम, सेवा से जुड़े इतिहास को पढ़ना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि आखिर संघ क्‍या है। यदि वास्‍तव में इसके बाद भी राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ समझ न आए तो कुछ दिन शाखा स्‍थान पर जाकर उसमें सम्‍मलित अवश्‍य होना चाहिए। उसके बाद वह यह उचित ढंग से समझ सकेगा कि आखिर संघ किस तरह से अपने स्‍वयंसेवकों को देशप्रेम का पाठ सहजता के साथ पढ़ा देता है।

वास्‍वत में आप कहीं भी चले जाइये, जहां संघ का कोई शिविर लगा हो, सुबह सूर्य की लालिमा पड़ते ही संघ स्‍थान का समय होने के पूर्व कानों में चहुँदिशा से एक ही स्‍वर सुनाई देगा, वह है भारत भक्‍ति का, भारत माता की जय का। किसी शिविर में गीत गूंज रहा होगा, ‘’हम करें राष्‍ट्र आराधन, तन से मन से धन से, तन मन धन जीवन से, हम करें राष्‍ट्र का अर्चन।‘’

इसी प्रकार किसी शिविर से ये स्‍वर निकलते सुनाई देंगे, देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें। …जननी जन्‍म भूमि तू मेरी प्राणों से भी प्‍यारी है, मेरा रोम रोम हे माता तेरा ही आभारी है। या कहीं से स्‍वर सुनाई देते हैं, माँ तेरी पावन पूजा में हम इतना केवल कर पाएं, युग युग से चरणों में तेरे चढ़ते आए पुष्‍प घनेरे, हमने उनसे सीखा केवल अपना पुष्‍प चढ़ा पायें अथवा यह कि देश मेरा, धरा मेरी, गगन मेरा, इसके लिए बलिदान हो प्रत्‍येक कण मेरा…

वस्‍तुत: इन जैसे अनेक गीत हैं जो संघ की प्रत्‍येक शाखा में नियमित गाए जाते हैं और स्‍वयंसेवकों को यह प्रेरणा दी जाती है कि वह गीत में बोले गए बोल की तरह ही जीवन में आचरण करें। इसलिए कांग्रेस जब संघ का विरोध करती है या राहुल गांधी यह कहते हैं कि “आरएसएस प्रमुख का यह बयान हर भारतीय का अपमान है, क्योंकि उन्होंने देश के लिए जान देने वालों का असम्मान किया है। यह देश के झंडे का भी अपमान है, क्योंकि तिरंगे को सलाम करने वाले सैनिकों का अपमान किया गया है। भागवत को सेना और शहीदों का अपमान करने के लिए शर्म आनी चाहिए।” तो उन्‍हें अवश्‍य ही यह सोचना चाहिए कि कांग्रेस जैसी प्रतिष्ठित राजनीतिक पार्टी के वे आज कोई आम कार्यकर्ता न होकर उसके राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष हैं, वह बिना संघ को जाने इस प्रकार का गंभीर आरोप संघ पर कैसे लगा सकते हैं?

जहां तक सेना के साथ समानता का प्रश्‍न है तो यह सर्वविदित है कि संघ के स्‍वयंसेवकों का संकट की घड़ी में जब भी आह्वान हुआ है, वह सदैव अपना जीवन उत्‍सर्ग करने, बिना इस चिंता के कि मेरे बाद मेरे परिवार का क्‍या होगा, ठीक उस सैनिक की तरह जो सीमा पर डटा है और दुश्‍मनों से मुकाबला कर रहा है या किसी संकट की घड़ी में सेवा कार्य में रत है, की तरह ही हर बार उठ खड़े हुए हैं। चाहे तो कोई इस बात के प्रमाण इतिहास से प्राप्‍त कर सकता है। देश के विकास में अपना विकास और देश के बुरे दौर में अपने को मर मिटाने के लिए तैयार कर चुका हर स्‍वयंसेवक आखिर देश का एक सैनिक ही तो है, इसमें भला संदेह कैसा?

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