जब वो नहीं बदल रहे तो देश कैसे बदलेगा

डॉ. नीलम महेंद्र

नई उम्मीद एक सपना इस देश की हर आँख में पल रहा है कि “मेरा देश बदल रहा है”… लेकिन सपना टूटा, आँख खुली, तो हर दिल को समझने में देर लगी कि लोग नहीं बदल रहे… जो पहले अपनी परिस्थिती बदलने का इंतजार करते थे आज देश की परिस्थिति बदलने का इंतजार कर रहे हैं…

लेकिन यह इंतजार इतना लंबा क्यों होता है? नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स को तो इस देश का हर नागरिक जानता है लेकिन बैंक के अधिकारी! उनसे से तो यह अपेक्षा नहीं थी!

प्रधानमंत्री ने उनके कन्धों पर देश को बदलने की जिम्‍मेदारी रखी थी और वे ही नींव खोदने लग गए? आम आदमी लाइन में खड़ा 2000 रुपए बदलने का इंतजार करता रहा और उन्‍होंने करोड़ों बदल दिए? आज हर रोज़ छापेमारी में जो नोट जब्त हो रहे हैं, वो किसी के हक के थे?

किसी और के भोग विलास के लिए, आपने किसी जरूरतमंद का गला घोंट दिया! करोड़ों की वो रकम जो मुठ्ठी भर लोगों से जब्त हुई, उससे हजारों लोगों की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती थीं। यही देश का दुर्भाग्य है, कि जिन कन्धों पर देश बदलने की जिम्मेदारी है, वो ही नहीं बदल रहे, ऐसे में देश कैसे बदलेगा?

खबर है कि एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक काले धन को सफेद करने में लिप्त पाए गए। प्रवर्तन निदेशालय ने एक्सिस बैंक के दो मैनेजरों को गिरफ्तार किया जिन पर तकरीबन 40 करोड़ रुपए के काले धन को सफेद करने का आरोप है। देश के अनेक हिस्सों से ऐसी सूचनाएं मिलने के बाद ईडी ने मनी लाँन्ड्रिग के शक में 50 बैंक शाखाओं पर छापेमारी की है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोट बंदी भ्रष्टाचार रोकने के लिए की थी, लेकिन पिछले एक महीने में जितना भ्रष्टाचार हुआ है उतना तो देश के इतिहास में शायद आज तक नहीं हुआ होगा। 8 नवंबर के बाद से 16.48 लाख नए खाते बैंकों में खोले गए, 4.54 लाख जीरो बैलेंस वाले जनधन खातों में नगदी जमा हुई, पंजाब में 150 मनरेगा खातों से खाताधारकों की जानकारी के बिना लेनदेन करने का मामला सामने आया।

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और चोर ही कोतवाल बन जाए तो? आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई भ्रष्टाचार के दानव की भेंट चढ़ाता है, इस सिस्टम से हार जाता है, लड़ नहीं पाता तो प्रतिशोध से भर जाता है। अपने ही देश में अपने ही देशवासियों से लूटे जाने की बेबसी।

क्‍या कभी सरकार ने सोचा है कि जो आदमी समय आने पर देश के लिए अपना सब कुछ लुटा देता है, वो टैक्स की चोरी क्यों करता है? दरअसल वो अपनी मेहनत की कमाई का बहुत बड़ा हिस्‍सा भ्रष्टाचार के दानव को सौंपने के बाद कुछ हिस्सा अपने बच्चों का भविष्य संवारने लिए रखता है। लेकिन काले धन और भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में वही सबसे ज्‍यादा पिस रहा है।

दूसरी ओर सरकार से हर महीने मोटी तनख्वाह लेने के बावजूद, आम आदमी की मेहनत की कमाई से घूस लेकर काला धन बनाने वाले, अपना धन सफेद करके तनाव मुक्त हो घूम रहे हैं।

प्रधानमंत्री को देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले काले धन का तो पता था लेकिन शायद वे सरकार में बैठे कालेधन के संरक्षकों की संख्या और उनकी ‘योग्यता’ का अंदाजा नहीं लगा पाए। वे यह बात भूल गए कि जिन लोगों के सहारे भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध का आग़ाज़ कर रहे हैं, वे स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिनके हाथों में तिजोरी की चाबी है, वे ही तिजोरी खाली करने के आदी हैं। यही वजह है कि जो आम आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सरकार के साथ खड़ा था, आज उसके सब्र का बांध टूटने लगा है।

अगर सरकार भ्रष्टाचार और काला धन खत्म करना ही चाहती है तो सबसे पहले आम आदमी को भरोसा दिलाना होगा कि देश के साथ गद्दारी करने वाले किसी भी कीमत पर बक्शे नहीं जायेंगे। और यह काम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बैंकों के उन अधिकारियों को सख्‍त सज़ा मिलनी चाहिए जिनकी वजह से, पर्याप्त मात्रा में नई मुद्रा होने के बावजूद, आम आदमी एक महीना बीत जाने के बाद भी नई मुद्रा की किल्‍लत से जूझ रहा है।

जिन लोगों ने अमानत में खयानत की है उन्हें ऐसी सजा दी जाए कि “सब चलता है” वाली मानसिकता दोबारा सिर न उठा सके। आम आदमी देश बदलने का इन्तजार कर रहा है। ऐसे में ‘ख़ास’ लोगों को यह समझाना जरूरी है कि देश बदल चुका है। जिस कानून को उन्‍होंने खेल समझा था वे अब उसके शिकंजे में फंस सकते हैं। कहीं सूद के चक्कर में मूल भी न चला जाए…

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