सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के फैसले की आलोचना क्‍यों?

डॉ. नीलम महेंद्र
‘’एक बालक को देशभक्त नागरिक बनाना आसान है बनिस्बत एक वयस्क के, क्योंकि बचपन के संस्कार ही हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला- सिनेमा हॉल में हर शो से पहले राष्ट्र गान बजाना अनिवार्य होगा।

हम एक लोकतांत्रिक देश हैं। चूँकि हम अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक हैं और हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल है तो हर मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं। लेकिन कई बार सराहनीय फैसले अथवा वक्तव्य को भी विवाद बना देना हमारे समाज की विशेषता बन गई है। किसी सभ्य समाज को अगर यह महसूस होने लगे कि उसके देश का राष्ट्र गान उस पर थोपा जा रहा है और इसके विरोध में स्वर उठने लगें तो यह उस देश के भविष्य के लिए चिंता का विषय है।

विश्व के हर देश का अपना राष्ट्र गान है और उसके सम्मान से जुड़े कानून। जैसे यूनाइटेड स्टेट्स में राष्ट्रगान बजने पर सावधान की मुद्रा में दायाँ हाथ सीने  पर रखकर ध्वज की ओर मुंह करके खड़ा रहना होता है। राष्ट्रीय ध्वज न हो तो राष्ट्रगान के स्रोत की ओर मुंह करके खड़ा होना आवश्यक है।

थाइलैंड में राष्ट्रीय टेलीविजन पर रोज प्रात: 8 बजे और संध्या 6 बजे राष्ट्रगान का प्रसारण होता है।  स्कूलों में बच्चे सुबह 8 बजे राष्ट्रीय ध्वज के सामने राष्ट्र गान गाते हैं। सरकारी कार्यालयों एवं सिनेमाघरों में भी इसे नियमित रूप से बजाया जाता है। रूस में भी राष्ट्र गान का अनादर करने पर आर्थिक दंड के साथ साथ जेल की सजा का प्रावधान है।

इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए ताकि हम समझें कि जिस देश के नागरिक देश से प्रेम एवं उसका सम्मान नहीं करते वह देश गुलामी की राह पर अग्रसर होने लगता है। हम सभी अपने माता पिता से प्रेम करते हैं, उनका सम्मान करते हैं। हमारी संस्कृति सिखाती है कि दिन की शुरुआत बड़ों का आशीर्वाद लेकर करें। तो फिर हम सबकी शान, हमारे पालनहार देश का आदर, उसके सम्मान के दिन सीमित क्यों हों, केवल कुछ विशेष दिन ही निश्चित क्यों हों?

आज के दौर में कोई भी व्यक्ति फिल्म देखने सप्ताह अथवा महीने में एक बार या अधिक से अधिक दो बार ही जाता होगा, तो सप्ताह अथवा महीने में एक या दो बार भी हमें अपने राष्ट्र गान को सम्मान देने में कठिनाई हो रही है, यह सोच ही दुर्भाग्‍यपूर्ण है। कुछ लोगों का तर्क है कि हम मनोरंजन के लिए फिल्म देखने जाते हैं, ऐसे में राष्ट्रगान और मनोरंजन दोनों मानसिक स्थितियाँ मेल नहीं खातीं, तो एक उदाहरण देना यहाँ उचित होगा।

स्कूल में बच्चे फ्री पीरियड या फिर गेम्स पीरीयड में निश्चिंत होकर खेलते हैं, लेकिन अगर उनके सामने प्राचार्य या कोई अध्यापक आ जाता है तो खेल रोककर उनका अभिवादन करना नहीं भूलते। वे यह नहीं कहते कि अभी तो हम खेल रहे हैं, अभिवादन बाद में करेंगे। तो आप भी मनोरंजन के लिए जाएं लेकिन फिल्म से पहले राष्ट्रगान के रूप में राष्ट्र के गौरव को याद करने एवं उसके प्रति सम्मान का प्रदर्शन करने से आपके मनोरंजन में कोई कमी तो अवश्‍य ही नहीं आएगी। कुछ व्‍यावहारिक परेशानी दिव्‍यांगों को अवश्य हो सकती है, तो उनके बैठने की व्यवस्था अलग से की जाए ताकि राष्ट्रगान के समय न तो उन्‍हें असुविधा हो और न ही उनके खड़े न होने की दशा में कोई अप्रिय स्थिति निर्मित हो।

चीन से युद्ध के बाद भारत के सिनेमाघरों में फिल्म खत्म होने के बाद राष्ट्र गान बजाने की परंपरा थी, लेकिन लोगों के बाहर निकलने की जल्दी में राष्ट्र गान का अनादर होने की स्थिति को देखते हुए वह परम्परा बन्द कर दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट का इस बारे में दिया गया निर्देश निश्चित ही सराहनीय हैं,  न सिर्फ देश के वर्तमान के लिए बल्कि उसके भविष्य के लिए भी। हर बात को विवाद बना देना न तो देश के वर्तमान के लिए अच्छा है न भविष्य के लिए।

 

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