बैंक लिंचिंग के वक्‍त मॉब लिचिंग याद क्‍यों नहीं आई?

मैं यह खबरें पढ़कर हैरान हूं कि देश को हजारों करोड़ रुपए का चूना लगाकर विदेश भाग जाने वाले लुटेरे अपनी भारत वापसी और यहां कानून का सामना करने के लिए भी शर्तें रख रहे हैं। किसी को यहां के लोगों पर भरोसा नहीं है, तो किसी को भारत की जेलों में उपलब्‍ध ‘सुविधाएं’ कम लगती हैं।

आपको याद होगा 13000 करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले में शामिल एक भगोड़े मेहुल चोकसी ने अभी कुछ दिन पहले मुंबई कोर्ट को एक पत्र लिखा था जिसमें उसने कहा था कि यदि वह घोटाले की जांच में सहयोग के लिए भारत आया तो यहां ‘मॉब लिंचिंग’ का शिकार हो सकता है।

यह आशंका उसे इसलिए है क्‍योंकि उसकी कंपनी के खाते फ्रीज कर दिए गए हैं और जिन लोगों ने उससे जेवरात खरीदे थे वे जब्‍त कर लिए गए हैं। कर्मचारियों को भी वेतन नहीं दिया जा सका है लिहाजा ये सारे गुस्‍साए लोग उसे मार सकते हैं।

मेहुल के वकील ने अदालत को यह पत्र सौंपते हुए, एक आवेदन भी प्रस्‍तुत किया जिसमें इसी आधार पर उसके खिलाफ जारी गैर जमानती वारंट रद्द करने की मांग की गई। इस समय कैरेबियाई देश एंटीगुआ में शरण लिए मेहुल ने यह आशंका भी जताई कि जांच एजेंसियां उसे थर्ड डिग्री टॉर्चर कर सकती हैं। यदि उसे जेल में रखा जाता है तो भारत की जेलों की स्थिति भी बहुत खराब है। वहां उसे साथी कैदियों से जान का खतरा तो रहेगा ही साथ ही उससे फिरौती की मांग भी की जा सकती है।

भारत की घटनाओं और जेलों की स्थिति को आधार बनाकर बचने की कोशिश सिर्फ मेहुल ने ही नहीं की। इससे पहले 9000 करोड़ का भगोड़ा विजय माल्‍या भी ऐसी ही बातें कर चुका है। पिछले साल दिसंबर में ब्रिटेन में अपने खिलाफ चल रहे प्रत्‍यर्पण मामले में माल्‍या की ओर से कहा गया था कि भारतीय जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होते हैं और उनमें साफ-सफाई भी ठीक नहीं होती है।

माल्‍या के वकीलों ने यह आशंका जताई थी कि उनके मुवक्किल को मुंबई की आर्थर रोड जेल के 12वें बैरक में रखा जा सकता है और वहां के हालात ठीक नहीं हैं। वहां कैदियों के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की सुविधाओं का अभाव है। माल्‍या की इस दलील पर मुंबई जेल अधिकारियों ने गृह मंत्रालय के जरिये लंदन की अदालत में यह जवाब पेश किया था कि जेल की हालत ठीक है, वहां माल्‍या के लिए मेडिकल सुविधाएं मौजूद रहेंगी।

मंगलवार को इसी मामले की सुनवाई करते हुए लंदन की वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भारत सरकार को उस जेल का वीडियो मुहैया कराने का आदेश दिया है जिसमें प्रत्‍यर्पण के बाद माल्‍या को रखा जाएगा। अदालत ने भारतीय अधिकारियों से यह भी कहा कि जेल की वीडियोग्राफी दिन के उजाले में होनी चाहिए। इसी के साथ अदालत ने माल्‍या को फौरी तौर पर राहत देते हुए जमानत भी दे दी।

सवाल यह है कि ये माल्‍या और मेहुल चोकसी जैसे लोग इस देश के अपराधी हैं या दामाद!! इन्‍हें जेल में भी फाइव स्‍टार होटल जैसी सुविधाएं चाहिए? वे जिस ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं वैसा ही वातावरण उन्‍हें जेल में भी लाजमी लगता है। मानो वे भारत आकर इस देश पर कोई अहसान कर रहे हों।

और हमारी स्थिति देखिए कि महान भारत की सरकार असहाय सी यह वचन देने को मजबूर है कि जनाब इन माननीय लुटेरों की जेल में पूरी आवभगत की जाएगी, उन्‍हें सारी सुख सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। यदि ऐसा ही है तो फिर अगले बजट में केंद्र व सभी राज्‍य सरकारों को अपने बजट में कुछ फाइव स्‍टार जेल बनाने का भी अलग से प्रावधान कर उसके लिए राशि तय कर देनी चाहिए।

वैसे भी ऐसी जेलें जितनी जल्‍दी बन जाएं उतना अच्‍छा है क्‍योंकि पता नहीं कब, देश के किसी करोड़पति के अपराधी होने का पता चले और जब कोर्ट में उसका मुकदमा पेश हो तो वह दलील दे दे कि जनाब देश की जेलें मेरे रहने लायक नहीं हैं इसलिए मैं वहां नहीं जा सकता।

ये सर्वसुविधायुक्‍त जेल कम होटल बनाने का सुझाव मैं इसलिए भी दे रहा हूं क्‍योंकि जो आसार दिख रहे हैं उनके चलते यह अनुमान लगाना ज्‍यादा कठिन नहीं हैं कि आने वाले दिनों में सैकड़ों की संख्‍या में ऐसे चोर और लुटेरे सामने आ सकते हैं जो देश की अर्थव्‍यवस्‍था को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

सरकार कहती है कि उसे किसान और मजदूर की तरह उद्योगपति के साथ खड़े रहने में भी कोई झिझक नहीं है। होनी भी नहीं चाहिए। चाहे अमीर हो या गरीब, वह कुदाल चलाता हो या फैक्‍ट्री, खेत जोतता हो या देश में इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर का जाल बिछाता हो, सभी इस देश के नागरिक हैं और अपने नागरिकों के साथ खड़े होने में कैसी शर्म?

लेकिन शर्म उस समय आती है जब देश का करोड़ों रुपया बटोर कर भाग जाने वाले लोग उसी देश की व्‍यवस्‍था पर सवाल उठाते हैं जिस देश के लोगों और अर्थव्‍यवस्‍था का खून चूसकर वे मुटियाए हैं।

जब बैंकों को चूना लगाया जा रहा था, जब सरकारी मशीनरी के लोगों से मिलीभगत कर करोड़ों अरबों की धोखाधड़ी के जाल बुने जा रहे थे तब यह खयाल क्‍यों नहीं आया कि इसके लिए एक दिन जेल भी जाना पड़ सकता है। आज ‘मॉब लिंचिंग’ का डर सता रहा है, जब ‘बैंक लिंचिंग’ कर रहे थे तब यह डर सताया था क्‍या?

और फिर यदि ऐसी सुविधाएं देने या उन्‍हें मुहैया कराने का किसी विदेशी अदालत को वचन देने का ऐसा ही बंधन है तो भाई बाकी लोगों ने क्‍या बिगाड़ा है। पेट भरने के लिए रोटी चुराने वाला तो उसी सड़ी हुई व्‍यवस्‍था वाली जेल में रहकर सजा काटने को मजबूर हो और अरबों रुपये के लुटेरे राजसी ठाटबाट के साथ वहां दिन बिताएं.. मानो सजा काटने नहीं जेल पर्यटन पर आए हों।

क्‍या यही न्‍याय है… क्‍या इसी को हम समतामूलक समाज कहेंगे…?

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