पाँच हेक्टेयर से कम क्षेत्र के गौण खनिज पट्टों पर पर्यावरणीय अनुमति

भोपाल, जनवरी 2013/ राज्य शासन ने गौण खनिज नियम-1996 में उल्लेखित अनुसूची-1 के क्रमांक-6 में उल्लेखित ‘यांत्रिकी क्रिया द्वारा गिट्टी बनाने के लिये पत्थर’ खनिज को भी बी-2 श्रेणी में शामिल किये जाने का अनुरोध राज्य पर्यावरण प्रभाव प्राधिकरण (सिया) से किया है। शासन ने इस संबंध में प्राधिकरण के सदस्य सचिव को पत्र लिखा है। पत्र में 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्र के गौण खनिज के उत्खनन पट्टों पर पूर्व पर्यावरणीय अनुमति के लिये आवश्यक समय-सीमा निर्धारित करने का अनुरोध भी किया गया है।

सचिव, खनिज साधन अजातशत्रु श्रीवास्तव ने सिया को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों में गौण खनिज की नितांत आवश्यकता होती है। विशेष रूप से अनुसूची-1 के क्रमांक-6 में उल्लेखित यांत्रिकी क्रिया द्वारा गिट्टी बनाने के लिये पत्थर खनिज मुख्य है। राज्य पर्यावरण प्रभाव निर्धारण प्राधिकरण की 107वीं बैठक में यह तथ्य सामने आया था कि सिया में प्राप्त आवेदन में से करीब 60 प्रतिशत आवेदन बोल्डर (पत्थर) खनिज के हैं। इस खनिज को भी बी-1 श्रेणी में कर देने से ऐसी खदानों को पर्यावरणीय अनुमति प्रदान करने में समय लग रहा है। इससे खनिज की उपलब्धता बाजार से कम हो गई है। यह खनिज अत्यधिक महँगे हो गये हैं, जिससे विकास कार्य व्यापक रूप से प्रभावित हो रहा है।

सचिव, खनिज साधन ने कहा है कि अनुसूची-1 में उल्लेखित खनिज की लीज अवधि 10 वर्ष अवश्य हो परन्तु लेकिन ऐसे खनिजों को यदि बी-2 श्रेणी में मान्य करते हुए पर्यावरणीय अनुमति अधिकतम दो वर्ष के लिये दे दी जाये। इससे इन खनिजों की उपलब्धता सुगमता से हो सकेगी तथा विकास कार्य त्वरित गति से चल सकेंगे एवं शासकीय परियोजना लागत भी नियंत्रित रहेगी।

श्री अजातशत्रु ने सिया को भेजे पत्र में उल्लेख किया है कि मुख्यमंत्री तथा मुख्य सचिव ने भी भारत सरकार से यह अनुरोध किया है कि गौण खनिजों को पर्यावरणीय अनुमति से मुक्त रखा जाये, क्योंकि इससे प्रदेश के विकास एवं निर्माण कार्य अत्यधिक प्रभावित हो रहे हैं। राज्य शासन को प्राप्त होने वाला राजस्व भी प्रभावित हो रहा है तथा गौण खनिज की कमी होने से खनिज के अवैध उत्खनन, परिवहन में वृद्धि भी संभावित है।

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