बलात्कारी को मिले मृत्युदण्ड – मुख्यमंत्री

भोपाल, जनवरी 2013/ मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, उत्पीड़न और बलात्कार, हत्या तथा अन्य जघन्य हिंसात्मक कृत्य में अपराधियों को मृत्युदण्ड देने की सिफारिश की है। उन्होंने बलात्कार पीड़ित महिला के अधिकारों के संरक्षण के लिये भी महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं। मुख्यमंत्री ने न्यायमूर्ति जे.एस.वर्मा समिति, नई दिल्ली को राज्य सरकार की ओर से कानूनी प्रावधानों में सुधार की अनुशंसाएँ की हैं।

मुख्यमंत्री ने ज्यादती की घटना की विशेष परिस्थितियों की चर्चा करते हुये कहा कि जिन प्रकरणों में ज्यादती की शिकार महिला की हत्या कर दी जाती है, उसे प्राकृतिक और सामान्य जीवन जीने में अक्षम बना दिया जाता है, वह एचआईव्ही या यौन संक्रमण से संक्रमित हो जाती है, ज्यादती की शिकार महिला घटना के एक वर्ष के भीतर आत्महत्या कर ले या उसकी मृत्यु हो जाये, ऐसे प्रकरणों में अपराधी को मृत्युदण्ड मिलना चाहिये।

भारतीय दण्ड संहिता धारा 376 (1) और (2) में उल्लेखित दण्डात्मक प्रावधानों को बढ़ाने के संबंध में मुख्यमंत्री ने जस्टिस वर्मा कमेटी को लिखा है कि इस धारा में अधिकतम सात वर्ष की सजा को बढ़ाकर 14 वर्ष किया जाना चाहिये और इसमें मृत्युदण्ड का प्रावधान भी शामिल किया जाना चाहिये। उन्होंने कहा कि धारा 376 (2) में उल्लेखित 10 वर्ष की सजा को भी बढ़ाकर 14 वर्ष की जाना चाहिये। मुख्यमंत्री ने कहा कि केन्द्र द्वारा प्रस्तुत आपराधिक कानून संशोधन विधेयक 2012 में मृत्युदण्ड का प्रावधान नहीं किया गया है। इस विधेयक पर पुन: विचार होना चाहिये।

श्री चौहान ने विश्वासघात के प्रकरणों में यौन हिंसा की घटना को अत्यंत गंभीरता से लेने का सुझाव दिया है। मुख्यमंत्री ने बताया है कि आपराधिक कानून संशोधन विधेयक में शिक्षक और विद्यार्थी के संबंधों में परस्पर विश्वास की स्थिति को शामिल नहीं किया गया है। कई प्रकरणों में इस स्थिति की भी अवहेलना होती है। उन्होने कहा कि ड्रायवर या सह-चालक को भी बराबर जिम्मेदार माना जाना चाहिये और उन्हें कड़ी सजा मिलना चाहिये। ऐसे प्रकरणों में जहाँ तीसरे पक्ष को ज्यादती में शामिल होने या ज्यादती की घटना देखने के लिये बाध्य किया जाता है इसे अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिये और संबंधितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होना चाहिये।

श्री चौहान ने कहा कि ज्यादती के प्रकरणों में निर्णय सुनाये जाते समय दोषी को सुनवाई का मौका दिया जाता है लेकिन ज्यादती की शिकार या उसके परिवार को ऐसा अवसर नहीं दिया जाता। इस प्रावधान को बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि ज्यादती के प्रकरणों में जमानत एक संवेदनशील मामला है। जमानत पर छूटकर दोषी व्यक्ति पीड़िता के परिवार को डरा-धमका सकता है, आतंकित कर सकता है। इसलिये ऐसे प्रकरणों में जमानत तब तक नहीं देनी चाहिये जब तक अदालत को यह विश्वास न हो जाये कि दोषी जमानत के दौरान इस प्रकार का कोई कृत्य नहीं करेगा।

मुख्यमंत्री ने बताया कि मध्यप्रदेश विधानसभा द्वारा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354(अ) के माध्यम से दंडात्मक कार्रवाई की पहल की गई है। इसके अनुसार यदि किसी महिला पर ज्यादती होती है और उसकी गरिमा को धूमिल करने का बलपूर्वक प्रयास किया जाता है और सार्वजनिक स्थान पर उसे वस्त्रहीन करने का घिनौना कृत्य किया जाता है, ऐसे प्रकरणों में न्यूनतम एक वर्ष से 10 साल की सजा होगी। उन्होंने कहा कि इसे पूरे देश में लागू किया जाना चाहिये।

मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि ज्यादती करने वाले अपराधियों के संबंध में राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला स्तर पर रिकार्ड रखा जाना चाहिये। ऐसे अपराधियों का ऑनलाइन डेटा भी होना चाहिये ताकि उन्हें राज्य की ओर से मिलने वाली सहायता और सुविधाओं से वंचित किया जा सके।

श्री चौहान ने कहा कि कई प्रकरणों में ज्यादती की शिकार महिलायें असामान्य स्थिति में त्वरित रूप से एफआईआर नहीं लिखा पातीं। इस स्थिति में आपराधिक दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 में यह भी शामिल किया जाना चाहिये कि ज्यादती की घटना होने और एफआईआर लिखवाने के बीच विलम्ब का अदालतें संज्ञान न लें। उन्होंने कहा कि कुछ दलीलों को भी खारिज कर दिया जाना चाहिये जैसे कि दोषी व्यक्ति यह कहे कि पीड़िता बालिग थी। यह दलील भी खारिज की जाना चाहिये कि दोषी नशे में था।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पीड़िता के लिये क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 357 (अ) के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति योजना में पीड़ित सहायता की योजना राज्य सरकारों को बनाना चाहिये। संबंधित न्यायालय क्षतिपूर्ति के लिये जिला विधिक सेवा अथॉरटी और राज्य विधिक सेवा अथॉरटी को अनुशंसा करेगा। वर्तमान में पीड़ित को या तो वित्तीय मदद या प्राथमिक उपचार के रूप में ही सहायता मिलती है जबकि ज्यादती केवल शारीरिक हिंसा मात्र नहीं है। इस संबंध में मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है कि पीड़ित महिला को तत्काल उच्च स्तरीय कानूनी सहायता मिलना चाहिये। यह कानूनी सहायता पुलिस स्टेशन द्वारा उपलब्ध करवायी जाना चाहिये क्योंकि पीड़िता अवसाद की स्थिति में पुलिस स्टेशन आती है। इसके साथ ही पुलिस को पीड़िता के अधिकार बताना अनिवार्य होना चाहिये। पुलिस स्टेशन में कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के इच्छुक वकीलों की सूची अनिवार्य रूप से उपलब्ध होना चाहिये। ज्यादती की शिकार महिला को कुछ समय अपना रोजगार छोड़ना पड़ता है इसलिये क्षतिपूर्ति योजना में इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये। सभी राज्यों में हेल्प लाइन स्थापित होना चाहिये। पीड़िता को चिकित्सीय, मनोवैज्ञानिक परामर्श देना अनिवार्य बनाया जाना चाहिये।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस और चिकित्साधिकारियों को महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकने संबंधी और पीड़िता के अधिकारों के बारे में राष्ट्रीय स्तर पर दिशा निर्देश जारी होना चाहिये। पीड़िता के अधिकारों भी विधिवत घोषित किया जाना चाहिये। इनमें पूर्वाग्रह मुक्त व्यवहार, पीड़िता की निजता की रक्षा, अपने अधिकारों की रक्षा के लिये उपलब्ध कानूनी उपायों की जानकारी, अभियोजक को अपना बयान दर्ज कराने का अधिकार, दोषी और स्वयं के एचआईव्ही टेस्ट कराने का अधिकार आदि। श्री चौहान ने कहा कि पीड़िता को नि:शुल्क चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराने के लिये भी कानूनी प्रावधान जरूरी है। जैसा कि कई विकसित देश अपना रहे हैं।

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