शिक्षा में निजीकरण के खिलाफ संघर्ष हो

भोपाल, दिसंबर 2012/ अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअम) ने छत्तीसगढ़ में हड़ताल कर रहे करीब डेढ़ लाख स्कूली शिक्षकों के आंदोलन का समर्थन करते हुए समान वेतन की उनकी मांग को जायज बताया है। उसका कहना है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति पंचायती राज संस्थाओं द्वारा किए जाने का बहाना बनाकर छग सरकार संवैधानिक जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही है। मंच ने आंदोलनरत शिक्षकों के खिलाफ बल-प्रयोग की निंदा की है।

भोपाल में जारी बयान में मंच के अध्‍यक्ष मंडल ने कहा है कि स्कूली शिक्षकों के साथ हो रहे अन्याय की जड़ में वे नव-उदारवादी नीतियां हैं जिन्हें छत्तीसगढ़ सहित केंद्र व अन्य राज्‍य सरकारें देश में जबरन लागू कर रही हैं। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं द्वारा थोपी गईं इन नीतियों के चलते सरकारी स्कूल व्यवस्था में गिरावट लाकर उनकी विश्वसनीयता नष्ट करने की साजिश हो रही है। इसका एकमात्र उद्देश्य शिक्षा में बाजारीकरण और मुनाफाखोरी के रास्ते खोलना है। नियमित शिक्षकों के पदों में लगातार कटौती करते हुए उनकी जगह पैरा-टीचर, संविदा-शिक्षक, अतिथि-शिक्षक व इसी तरह की अन्य श्रेणियों में कम वेतन और अनियमित तौर पर शिक्षकों की नियुक्ति इसी साजिश का हिस्‍सा है।

मंच ने कहा है कि शिक्षकों का यह संघर्ष, आर्थिक मांगों से आगे बढ़ते हुए स्कूल व्यवस्था में जनता के हितों के अनुरूप बदलाव की लड़ाई बनना चाहिए। आज सरकार को शिक्षकों के अधिकार और लाखों बच्चों की पढ़ाई में हो रहे नुकसान की कोई परवाह नहीं है क्योंकि सरकारी स्कूलों में नेताओं-मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों या उच्च तबके के बच्चे नही पढ़ते।

जानेमाने शिक्षाविदों और शिक्षक संगठनों के नेताओं प्रो.अनिल सदगोपाल, डॉ. मेहर इंजीनियर, प्रो. वसी अहमद, प्रो. जी. हरगोपाल, प्रभाकर अराडे, प्रो. मधु प्रसाद, केदारनाथ पांडे और श्री सुनील के हस्‍ताक्षरों से जारी बयान में छत्तीसगढ़ सहित सभी राज्‍यों के शिक्षक संगठनों से अपील की गई है कि वे इस संघर्ष को व्यापक बनाते हुए शिक्षा में पी.पी.पी. सहित हर तरह के बाजारीकरण का विरोध करें। और समाज के सभी तबकों के लिये मुफ्त व राज्य-वित्त पोषित समान स्कूल व्यवस्था की लड़ाई शुरु करें। इसकी शुरुआत प्रत्येक सरकारी स्कूल को केंद्रीय विद्यालयों के अनुरूप सक्षम बनाने की मांग से की जा सकती है।

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