नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक हर्मन हेस का एक विश्वप्रसिद्ध उपन्यास है ‘सिद्धार्थ’। अगर मैं कहूं, उस एक पुस्तक का मुझ पर लाइफ चेंजिंग प्रभाव हुआ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब मैंने उस उपन्यास को पहली बार पढ़ा था तो उन्नीस वर्ष का था। पतली सी पुस्तक है, बहुत सरल सी कहानी। सिद्धार्थ नाम का एक बालक है जो बहुत ही प्रतिभाशाली है। वह बहुत अच्छा विद्यार्थी है, और उसके पिता उसे बहुत सी विद्याएं सिखाते हैं। वह एक स्पॉन्ज की तरह सब कुछ सोख लेता है, कठिन से कठिन श्लोक उसे एक बार में याद हो जाते हैं, उनके अर्थ वह फटाफट समझ लेता है। उसके पिता को उस पर गर्व है कि वह एक दिन बहुत ज्ञानी पंडित बनेगा। लेकिन बालक सिद्धार्थ एक दिन एकाएक निर्णय लेता है कि उसे ज्ञानी और पंडित नहीं बनना।

वह अपने पिता के पास जाता है और कहता है कि उसे वन में जाकर तपस्या करनी है। उसके पिता का संसार जैसे ढह जाता है। उनका विलक्षण बेटा जिससे उन्हें इतनी अपेक्षाएं थीं, वह विद्वान नहीं बनना चाहता? वह अपनी शिक्षा अधूरी छोड़कर वन में जाना चाहता है… उसके पिता पहले तो यह अनुरोध अस्वीकार कर देते हैं। फिर सिद्धार्थ की दृढ़ता के आगे उन्हें झुकना पड़ता है।

सिद्धार्थ वन में जाता है, तपस्वियों के संसर्ग में रहकर तपस्या करता है। वह अतिशीघ्र बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कर लेता है। उसकी बहुत प्रसिद्धि हो जाती है और सबको अपेक्षा है कि वह बहुत ही सिद्ध तपस्वी बनेगा। लेकिन कुछ वर्षों के बाद एक दिन युवा सिद्धार्थ निर्णय लेता है कि उसे तपस्वी नहीं बनना। उसने सुना है कि कोई बहुत सिद्ध महात्मा हैं जिनके उपदेश सुनने सभी उमड़े पड़ रहे हैं। यह महात्मा बुद्ध हैं। सिद्धार्थ निर्णय लेता है कि वह वन से निकल कर नगर जायेगा और बुद्ध के उपदेश सुनेगा।

इस पूरी यात्रा में उसका एक और मित्र है, गौतम। गौतम बचपन से सिद्धार्थ का मित्र है। वह उसके साथ गुरुकुल में पढ़ा, फिर उसके साथ वन में तपस्या करने आ गया। जब उसने सुना कि सिद्धार्थ महात्मा बुद्ध के पास जा रहा है तो वह भी उसके साथ चल पड़ा। दोनों मित्र अगले दिन महात्मा बुद्ध के आश्रम में पहुंचे और दोनों ने बुद्ध का प्रवचन मंत्रमुग्ध होकर सुना। प्रवचन सुनने के बाद बुद्ध ने सिद्धार्थ से बात की और उसे दीक्षा लेने को कहा। सिद्धार्थ ने जो उत्तर दिया, वह मेरी दृष्टि में हिन्दू धर्म की आत्मा है। सिद्धार्थ ने कहा- हे प्रभु, आपका दर्शन उत्तम है। आपका ज्ञान अद्भुत है। लेकिन वह आपका ज्ञान है। वह मेरे लिए शिक्षा हो सकता है, लेकिन मेरा ज्ञान नहीं हो सकता। मैं आपका शिष्य बन कर वह कभी नहीं जान पाऊंगा जो जानकर आप बुद्ध बने। एक व्यक्ति का ज्ञान दूसरे का नहीं होता।

बुद्ध ने सिद्धार्थ को आशीर्वाद दिया और ध्यानमग्न हो गए। सिद्धार्थ के अब तक के अभिन्न मित्र गौतम ने कहा कि उसे आखिर में उत्तम शिक्षा मिली है, सर्वश्रेष्ठ गुरु मिल गए हैं। वह दीक्षा लेगा और शेष जीवन यहीं रहेगा। सिद्धार्थ को पता नहीं क्या चाहिए… सिद्धार्थ ने अपने मित्र से विदा ली और चल पड़ा। उसे पता नहीं क्या चाहिए। वह नगर में चला जाता है। रास्ते में उसे एक सुंदरी दिखाई देती है जो नगर की सबसे प्रसिद्ध गणिका है। उसके मन में उसकी कामना जागती है। उसे पाने के लिए उसे धनोपार्जन करना है। वह नगर के सबसे बड़े व्यापारी के पास जाता है और उसके साथ काम करने लगता है। वह एक धनी व्यापारी बन जाता है और उस गणिका के साथ रहने लगता है…

विद्यार्थी से सन्यासी फिर व्यापारी और गृहस्थ बनने की इस यात्रा को सिद्धार्थ उसी भाव से तय करता है जिस भाव से कोई सन्यासी ध्यानमग्न होता है। एक दिन वह एक नाविक के साथ काम करने लगता है, और उस नाविक से नदी के स्वरों में परमात्मा की वाणी को सुनना सीखता है…

इस छोटी सी पुस्तक ने मुझे इतना ऑब्सेस किया कि मैंने इसे दर्जनों बार पढ़ा। मैंने 19 वर्ष की उम्र में तय कर लिया था कि जब मेरा बेटा होगा तो उसका नाम सिद्धार्थ रखूंगा। व्यक्तित्व पर नाम का प्रभाव होता है। बचपन से सिद्धार्थ का स्वभाव ऐसा रहा कि लोग मुझसे कहते थे कि यह उसके नाम का असर है। उसे मैं कोई भी बात यह कहकर नहीं मनवा सकता कि मैं कह रहा हूं, मानना पड़ेगा।

मैं उसे अपनी समझ से हिंदू धर्म का मूल जितना समझा सकता था, समझाने का प्रयास किया। जिस किसी से मुझे उम्मीद हुई कि वे मुझसे अधिक प्रामाणिकता से समझा सकेंगे, उनके पास उसे बैठाने का प्रयास किया। लेकिन कहीं से काम का कुछ नहीं मिला। उन कथावाचक विद्वानों से भी नहीं। जब कभी भी उसे धक्के मार कर हिन्दू बनाने का प्रयास किया, मुझे समझ में आया कि उसे दूर ही धकेल रहा हूं। जितना अधिक जबरदस्ती करता था, हिन्दू धर्म इस्लाम और ईसाइयत की पैरोडी जैसा दिखाई पड़ता था जो समझ में आए न आए, मानना ही पड़ेगा।

सौभाग्य से मैंने याद रखा कि उसका नाम आखिर सिद्धार्थ क्यों है। मुझे विश्वास रहा कि वह अपनी राह खुद ही खोजेगा। पिछले कुछ वर्षों में यूनिवर्सिटी में उसके पढ़ने का दायरा बहुत विस्तृत हुआ। पहले मैं उसे किताबें सजेस्ट करता था, पिछले दो तीन वर्षों से मैं उसकी सजेस्ट की हुई किताबें पढ़ रहा हूं। पिछले कुछ वर्षों में उसकी रुचि धर्म और अध्यात्म के बारे में पढ़ने में हुई और उसने मेडिटेशन शुरू किया। उसने वही पढ़ा जो अंग्रेजी में उपलब्ध है। और उसके सोर्सेज जो पाश्चात्य लेखक थे, वे हिन्दू भी नहीं हैं। उनमें सैम हैरिस और एलेन वाट्स जैसे जाने माने नाम भी हैं जिन्होंने भारत आकर बहुत समय बिताया है। उनकी किताबें पढ़कर उसने पहली बार समझा कि मैं उसे आत्मा और परमात्मा की एकात्मता के बारे में क्या कहता था।

उसने कहा कि वह यह सब समझने के लिए बहुत छोटा था, और बिना समझे सिर्फ मान लेने का उसे कोई अर्थ नहीं समझ में आता था, जैसे कोई तीसरी क्लास के बच्चे को कैलकुलस पढ़ा रहा हो। जब उसे सैम हैरिस ने तार्किक भाषा में वही फिर से समझाया जो मैं पहले से कहता था तो वह उस बात से जुड़ सका। मेरे लिए तो सैम हैरिस ही वह ऋषि मुनि हुए जो मेरे बच्चे को वापस हिंदुत्व की वैचारिक धारा में लेकर आए। और जो खुद आया है उसके खोने का कभी कोई खतरा भी नहीं है।

जिनके बच्चे बड़े हो रहे हैं और जो अपने बच्चों से संवाद कर रहे हैं वे सच्चाई से स्थिति का परीक्षण करेंगे तो यह संघर्ष हर जगह दिखाई देगा। आप अगर अपने बच्चे को धकेल के हिन्दू बनाने का प्रयास करेंगे तो बच्चा और दूर जायेगा। बल्कि लाखों बच्चे दूर जा रहे हैं, क्योंकि उनके साथ या तो संवाद नहीं हो रहा या संवाद की क्वालिटी बहुत खराब है। जो लोग यहां धर्म पर प्रवचन दे रहे हैं, उनके अपने बच्चे भी उनकी नहीं सुन रहे। आपको लगता होगा कि वे आपकी बात मान रहे हैं, पर अक्सर वे सिर्फ आपकी बात खत्म होने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

जिसे हम गूढ़ ज्ञान कहते हैं, अक्सर वह कुछ ज्यादा ही गूढ़ हो जाता है। और जिस भाषा में बच्चों को समझ में आए, जिससे बच्चे रिलेट कर सकें उस भाषा में सुलभ नहीं है। भाषा का अर्थ सिर्फ सरल हिंदी या अंग्रेजी ही नहीं है, यहां भाषा से मेरा अर्थ बच्चों के तर्क की भाषा से है। ज्ञान से भयभीत होने की आवश्यकता भी नहीं है। जो भी ज्ञान तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है वह हिंदू धर्म में स्वीकृत है। अक्सर यह डर भी लगता है कि बच्चा अगर नहीं समझे या गलत बात समझ जाए तो क्या हो? पर इसका खतरा तब ज्यादा है जब उसकी तर्क की अपनी क्षमता कम हो… तब कोई अभी आकर समझा जायेगा।

मैं यह नहीं कह रहा कि इस तरह से प्राप्त ज्ञान, परम्परा से प्राप्त ज्ञान से श्रेष्ठ है। लेकिन हर कोई अपने बच्चे को आईआईटी और आईआईएम की तैयारी छुड़ा कर उसे धर्म की शिक्षा परम्परा से लेने के लिए गुरुकुल भी नहीं भेज सकता। बल्कि किसी ने भेजा हो तो बताएं, जानना चाहूंगा। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि बच्चों को धर्म की कोई शिक्षा दी ही न जाए। ना ही यह, कि यह सिर्फ कुछ लोगों का विशेषाधिकार हो, क्योंकि वे स्पष्टतः यह कार्य कर नहीं रहे। उनके ज्ञान का दावा जितना भी बड़ा हो…किसी के काम आता नहीं दिख रहा।

हो सकता हो, आपके साथ यह बात न लागू हो। हो सकता है आपका बच्चा बहुत आज्ञाकारी हो और आपकी हर बात अक्षरशः मानता हो। हो सकता है आपका ज्ञान उच्च कोटि का हो और आपको अपने बच्चे को उचित दिशा देने में कोई परेशानी नहीं हुई हो। तो यह आलेख सिम्पली आपके लिए नहीं है। लेकिन अधिकांश लोगों के साथ यह परेशानी है। हर बच्चा गौतम नहीं होता कि उसे बुद्ध मिल जायेंगे और वह उनकी शिक्षा से संतुष्ट हो जायेगा। कुछ सिद्धार्थ भी होते हैं जिन्हें अपना रास्ता खुद खोजना होता है। आपका बच्चा जिस रास्ते से धर्म से जुड़ रहा है आप खुशी से जोड़ें। पर दूसरों के रास्ते बंद ना करें।
(सोशल मीडिया से साभार)
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(मध्यमत)
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