प्रमोद शर्मा

ये गुलाम नबी का नया रंग है, जो उनकी नई भगवा पगड़ी से साफ झलक रहा है और कह रहा है कि संभल जाओ पलाश फूलने के दिन आ चुके हैं और पलाश जब फूलता है तो ऐसा लगता है मानो जंगल में आग लगी हो। कांग्रेस के जंगल सुलग उठे हैं और दावानल बनने की ओर बढ़ती इस आग से अब कौन सुरक्षित रहेगा, कौन दूसरा जंगल तलाशेगा और  कौन खाक होगा, यह वक्त तय करेगा? यदि आग बुझा भी दी गई तो भी उसके निशान लंबे समय तक मिटाए नहीं जा सकेंगे।

कांग्रेस में सिर फुटव्वल की ये नौबत नबी के नए रंग के कारण ही आई है। करीब चार दशक तक विभिन्न राजनीतिक पदों का भरपूर उपभोग करने के बाद राज्यसभा से ‘आजाद‘ हुए ‘गुलाम‘ को एकाएक वैराग्य उत्पन्न हो गया है और अब उन्होंने एक ‘नई‘ राजनीतिक पारी खेलने के लिए अपने डैने खोल दिए हैं। उन्होंने अब बुजुर्ग हो चुके बाज की तरह ही कांग्रेस रूपी चट्टान पर अपनी चोंच मारनी शुरू कर दी है। अब इसमें चट्टान टूटे या चोंच दोनों ही स्थितियों में नफा तो ‘नबी‘ को ही होना है।

यदि चट्टान टूट गई, जो कि तमाम तरह के झंझावत झेलने के बाद जर्जर अवस्था को प्राप्त हो चुकी है, तब ‘नबी‘ उस टूटी चट्टान को बटोर कर अपना नया संसार बसाएंगे और उसके खुद मुख्तार और हाकिम होंगे। वे उस मलबे को आसानी से बटोर कर उस पर अपने सपनों का महल खड़ा कर सकेंगे। वे कांग्रेस में छटपटाहट महसूस कर रहे महत्वाकांक्षा के ज्वर से पीड़ित नेताओं को संभावनाओं के आकाश कुसुम का सपना दिखाकर उन्हें आसानी से अपना ‘गुलाम‘ बना लेंगे।

इसके विपरीत यदि उनके इस प्रयास में चोंच टूट गई तब भी उन्हें भरोसा है कि उनकी नई चोंच उग आएंगी, जिससे वे अपने पुराने पड़ चुके पंखों को खुद ही तोड़कर फेंक सकेंगे और उनके शरीर पर बाज की भांति जल्द ही दोबारा नए पंख उग आएंगे या आरोपित कर दिए जाएंगे। इसके बाद वे एक बार फिर राजनीतिक आसमान में किसी किशोर और युवा बाज की तरह उड़ान भर सकेंगे। इसी महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने एक बार फिर राजनीतिक आसमान में नई उड़ान भरने का सपना संजोकर पहली चोट कर दी है।

वैसे, राजनीति के शातिर और चतुर खिलाड़ी ‘आजाद‘ जानते हैं कि अब कांग्रेस रूपी तिल्‍ली में तेल नहीं बचा है। वह पूरी तरह से भूसी हो चुकी है। अब उस तिल्‍ली को घानी में डालकर पिराई करने से भी कुछ होना नहीं है। अब तो बस उसके चारों ओर चक्कर लगाने वाले बैलों का ही पसीना बहना है। दिनभर घानी के चक्कर काटने के बाद बैल के हिस्से भी कुछ नहीं आना है। शाम को वह खुद को वहीं खड़ा हुआ पाएगा, जिस स्थान से उसने चलना शुरू किया था। अनुभव के इस निचोड़ के बाद ही गुलाम के लब आजाद होने के लिए बेकरार हो उठे और उनके स्वर सुनने के बाद कांग्रेस में घुटन महसूस कर रहे अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी इस बात का भान हो गया कि कांग्रेस कमजोर हो चुकी है।

जैसे ही नेताओं के ज्ञान चक्षु खुले वे सीधे ‘धरती के स्वर्ग‘ की ओर प्रस्थान कर गए, ताकि कमजोर हो चुकी कांग्रेस को और मजबूत बनाया जा सके। ऐसी जनश्रुति है कि बांस का अंकुरण अन्य वनस्पतियों से थोड़ा अलग प्रकार से होता है। भीषण गर्मी के बाद जेठ के महीने में जब बादल गरजते हैं और बारिश की पहली बूंद जमीन पर पड़ती है तो जमीन से एकदम से बांस का अंकुर फूटता है और एक ही बार में एक से दो फुट का हो जाता है।

ठीक उसी प्रकार राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रूपी मेघ से भावनाओं की जो बूंदें ‘आजाद‘ होते ‘नबी‘ के दिल की जमीन पर पड़ीं, वे उनके ‘गुलाम‘ हो गए। उनके हृदय से महत्वाकांक्षा का अंकुर बांस के अंकुर की ही तरह फूट पड़ा। ये अंकुर अकेला नहीं फूटा, उसने अपनी सुरक्षा और ताकत बढ़ाने के लिए कुनबा भी जुटा लिया है। राज्यसभा से रिटायर होने के बाद अचानक आजाद को यह भान हुआ कि पिछले दस साल में कांग्रेस कमजोर हो गई है।

अब यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर उन्हें यह भान पिछले दस साल में क्यों नहीं हुआ और अंगुलिमाल की तरह एकाएक हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? वैसे, राज्यसभा से तो इसके पहले भी दर्जनों नेता रिटायर हुए, लेकिन ऐसी भावनात्मक विदाई इसके पहले किसी की हुई हो, इसकी मिसाल नहीं मिलती। कयास तो यह भी लगाए जा रहे हैं कि इसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। राज्यसभा में तो केवल उसका वाचन मात्र ही हुआ।

हालांकि यह तो पटकथा की शुरुआत है। इसका असल सीन तो अभी सामने आना बाकी है। वैसे भी, हमारे ग्रामीण अंचल के किसान इतने समझदार होते हैं कि वे उसी तरफ तिवाव (फसल को भूसे से अलग करने का एक देहाती उपकरण, जिस पर खड़े होकर किसान उड़ावनी करते हैं।) लगाते हैं, जिस तरफ हवा का रुख होता है। सो, आजाद ने भी अपने तिवाव की दिशा बदल ली तो इसमें अचंभा कैसा?(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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